भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

समूहोंके सम्पादनमें कारण होता है, उसी प्रकार चेतन परमात्मा भी अपने सकाशमात्रसे सबके कारण हैं। जिसे आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं है, उसीके लिये तीन आकाशोंकी कल्पना हुई है। उसीको उपदेश देनेके लिये त्रिविध आकाशकी कल्पना की जाती है। जिसे आत्मतत्त्वका बोध हो गया है उसके लिये यह कल्पना नहीं है। आत्मज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें तो सब प्रकारकी कल्पनाओंसे रहित सर्वव्यापी, सर्वरूप एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही नित्य विराजमान हैं। अज्ञानी पुरुषको ही अनेक प्रकारकी वाक्य-रचनासे युक्त द्वैत एवं अद्वैतके भेदोंका निरूपण करते हुए तत्त्वज्ञानका उपदेश दिया जाता है। ज्ञानी पुरुषको किसी तरह भी ऐसा उपदेश नहीं दिया जाता।

निष्पाप श्रीराम ! मन जिस किसीसे भी उत्पन्न हुआ हो और जो कुछ भी उसका स्वरूप हो, उसकी उधेड़बुनमें न पड़कर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह उसे नित्य प्रयत्नपूर्वक अपनी मुक्तिके लिये परमात्मामें लगाये। रघुकुलतिलक ! परमात्मामें लगाया हुआ चित्त वासनारहित एवं शुद्ध हो जाता है। तत्पश्चात् वह कल्पनाशन्य होकर परमात्मभावको प्राप्त हो जाता है।

श्रीराम ! यह सारा चराचर जगत् चित्तके अधीन है। इसलिये बन्धन और मोक्ष भी चित्तके ही अधीन हैं। (अतः मनुष्यको उचित है कि वह मोक्ष-प्राप्तिके लिये चित्तको परमात्मचिन्तनमें लगाये ।)

चिरकालतक चित्तके निरोधकी रक्षा करने और दीर्घकालतक परमात्माका चिन्तन करनेसे अभ्यासवश शून्यताको प्राप्त होकर मन फिर शोक नहीं करता। मनके प्रमादसे नाना प्रकारके दुःख बढ़ते हैं और बढ़कर पर्वत-शिखरके समान हो जाते हैं तथा उसीको वशमें कर लेनेसे ज्ञानका उदय होनेके कारण वे सारे दुःख उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्यके सामने बर्फका ढेर गल जाता है। यदि मन शास्त्रोंके अर्थज्ञानसे उत्पन्न हुई अनिन्द्य वासनासे युक्त हो राग आदिके विषयमें मौन (निरोध) का आश्रय ले जीवनपर्यन्त मुनिकी तरह रमता है तो आगे चलकर पावनको भी पावन बनानेवाले, जन्मरहित, शीतल (शान्तिमय) परिपूर्ण ब्रह्मपदको प्राप्त करके उसीमें स्थित हुआ जीवनमुक्त पुरुष बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंमें पड़नेपर भी कभी शोक नहीं करता।

(सर्ग ९७—९९)


मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति, सबकी ब्रह्मरूपता, मनके संकल्पसे ही सृष्टि-विस्तार तथा वासना एवं मनके नाशसे ही श्रेयकी प्राप्तिका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे जल-जातिका बोध रखनेवाले पुरुषोंकी दृष्टिमें तरङ्ग समुद्रसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार इस लोकमें जिन्हें परमात्मतत्त्वका ज्ञान हो गया है, उनकी दृष्टिमें उनका मन भी परब्रह्म परमात्मा ही है, उनसे भिन्न नहीं। रघुनन्दन ! अज्ञानी पुरुषोंका मन ही संसाररूपी भ्रमका कारण है (अथवा जन्म-मरणरूपी संसारमें भटकानेका हेतु है)—जैसे जो लोग जल-सामान्यपर दृष्टि नहीं रखते, उन्हींको समुद्रके जल और तरङ्गमें भेद प्रतीत होता है। अज्ञानियोंके पक्षमें उन्हें केवल ज्ञानका उपदेश देनेके लिये ही वाच्य-वाचक-सम्बन्धजनित भेदकी कल्पना की जाती है। परब्रह्म परमात्मा सर्वशक्तिमान्, नित्य, परिपूर्ण एवं अविनाशी है, उन सर्वव्यापी परमात्मामें जो न हो, ऐसी किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं है। भगवान् सम्पूर्ण शक्तियोंसे परिपूर्ण हैं। उन्हें जब जो शक्ति रुचती है, तब उसी अनन्त शक्तिको वे सर्वव्यापी परमात्मा प्रकाशित करते हैं (उपयोगमें लाते हैं)। श्रीराम ! प्राणियोंके शरीरोंमें ब्रह्मकी चेतन-शक्ति दिखायी देती है। इसी तरह प्रवह आदि वायुओंमें ब्रह्मकी स्पन्दशक्ति, प्रस्तरमें जड-शक्ति, जलमें द्रव-शक्ति, अग्निमें तेजस्शक्ति, आकाशमें शून्य-शक्ति और जगत्‌की