भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तरङ्ग आदिके रूपमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्माका आश्रय लेकर मन स्वयं ही संसारके रूपमें स्फुरित होता है। अद्वितीय परमात्मामें अज्ञानके कारण भेद और अभेदकी भ्रान्ति हो रही है। इस भ्रमका बाध होनेपर जब यह सब कुछ ब्रह्मतत्त्वके रूपमें ही अवशिष्ट रह जाता है, तब यहाँ कौन बद्ध है और कौन मुक्त होता है ? जबतक ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं होता, तभीतक देह आदिके पीड़ित होनेपर यह पीड़ारहित जीव भी पीड़ासे युक्त-सा प्रतीत होता है। अच्छेद्य होनेपर भी देहके किसी अङ्गके कट जानेपर तमतमा उठता है। परंतु जब परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब ये बातें नहीं होतीं; क्योंकि परमात्मामें भेद, अभेद, विकार और पीड़ा—कुछ भी नहीं हैं।

यह शरीर गिर जाय या उठ खड़ा हो अथवा आकाशके भीतर चला जाय, उससे विलक्षण रूपवाले मुझ आत्माकी क्या हानि है ? श्रीराम ! मन ही सम्पूर्ण जगत्‌का शरीर है। मनकी कारणभूत आद्याशक्ति-रूप चिन्मय परमात्माका कभी नाश नहीं होता। यह वासना इष्ट वस्तुमें राग और अनिष्ट वस्तुमें द्वेषके कारण बन्धनमें डालनेवाली मनकी ही शक्ति है। इसीके द्वारा व्यर्थ भ्रमसे स्वप्नकी भाँति इस जगत्‌की कल्पना हुई है। यह वासना अविद्या है। ज्ञानके बिना इसका अन्त होना बड़ा कठिन है। यह केवल दुःख देनेके लिये ही बढ़ती है। इसके स्वरूपका ज्ञान न होनेसे ही यह इस मिथ्या प्रपञ्चका विस्तार करती है। इस मानसी-शक्ति वासनाने ही इस विशाल जगत्‌को दीर्घकालतक रहनेवाले स्वप्नके समान रचा है। यह है तो असत्, किंतु सत्-सा प्रकट हुआ जान पड़ता है। आरम्भमात्र ही इसका फल है अर्थात् यह निस्सार एवं आपात रमणीय है। मनका नाश ही महान् अभ्युदय—परम पुरुषार्थकी प्राप्ति है और वही समस्त दुःखोंके समूल नाशका उपाय है। निरन्तर सुख-दुःखरूपी वृक्ष-समूहोंसे भरपूर और क्रूर कालरूपी विषैले सर्पके निवास-स्थान इस समस्त संसाररूपी वनमें यह विवेकहीन मन ही बड़ी-बड़ी विपत्तियोंका एकमात्र कारण और प्रभु है।

महर्षि वसिष्ठके इतना उपदेश दे लेनेपर दिन बीत गया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। उस राजसभामें बैठे हुए ऋषि-मुनि तथा अन्य सभासद् सायंकालिक कृत्य (संध्योपासना और अग्निहोत्र आदि) करनेके लिये स्नानके उद्देश्यसे उन महामुनिको नमस्कार करके चले गये तथा रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके साथ ही वे सब सभासद् फिर वहाँ आ गये। (सर्ग १००-१०२)


जगत्‌की चित्स्वरूपता, वासनायुक्त मनके दोष, मनका महान् वैभव तथा उसे वशमें करनेका उपाय

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे सागरसे उसकी बड़ी-बड़ी लहरें उठती हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मासे इस चित्तरूपी तरङ्गका उत्थान हुआ है। यही अपने संकल्पसे विशालताको प्राप्त होकर चारों ओर इस भुवनका विस्तार करता है। सब प्रकारकी वस्तुओंसे सम्पन्न यह जो कुछ भी चराचर जगत् दृष्टिगोचर हो रहा है, सब-का-सब चित्तके संकल्पसे ही प्रकट हुआ है। श्रीराम ! जैसे छोटा बच्चा घरमें कीचड़ या गीली मिट्टीसे विचित्र खिलौने बनाता है, वैसे ही मन अपने संकल्पसे विकल्परूपी जगत्‌की सृष्टि करता है। जैसे ऋतुओंका निर्माण करनेवाला काल विभिन्न ऋतुओंमें वृक्षका कुछ और ही विलक्षण रूप कर देता है, उसी प्रकार चित्त भी इन सब पदार्थोंको विलक्षण-सा बना देता है। जैसे वृक्षसे पल्लव प्रकट होते हैं, उसी प्रकार मनके संकल्पसे व्यामोह, सम्भ्रम, अनर्थ, देश, काल, गमन और आगमन—ये सब-के-सब उत्पन्न होते हैं। जैसे जल ही समुद्र है और उष्णता ही अग्नि है, उसी प्रकार चित्त ही विविध व्यापारोंसे पूर्ण संसार है (क्योंकि वह उसीके संकल्पसे उत्पन्न हुआ है)।