भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की चित्तरूपता, वासनायुक्त मनके दोष * १९९

कर्ता, कर्म और करणके साथ जो यह द्रष्टा, दर्शन और दृश्यसे सम्पन्न संसार प्राप्त हुआ है, वह सब-का-सब चित्त ही है। जैसे सुवर्ण-तत्त्वकी परीक्षा करनेवाला पुरुष बाजूबंद, मुकुट, कड़ा और हार आदि आकारोंसे सुशोभित उसके विविध रूपोंको छोड़कर एकमात्र सुवर्णमें ही बुद्धिको लगानेपर वास्तविक सुवर्णको देख पाता है, उसी प्रकार विवेकी पुरुष भी विभिन्न लोकों, उनके भीतरके भुवनों और उनके भी भीतर फैले हुए वनान्तर आदि समस्त वस्तुओंको त्यागकर जब यह समझ लेता है कि इन सबके रूपोंमें अपने ही स्वरूप-भेदसे—अपने ही संकल्प-विकल्पोंसे चित्त स्वयं ही प्रकट हुआ है, तब यह सारा जगत् उसे चित्तरूप ही दिखायी देता है; फिर चित्तके सिवा दूसरी कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती ।

जैसे बालिका वेतालोंका विस्तार करती है, उसी प्रकार अत्यन्त तुच्छ वासनारूपी सहस्रों दोषोंसे मलिन हुई मनोवृत्ति, जो नहीं है उस दुःखका भी पूर्णरूपसे विस्तार करती है; किंतु जो वासनारूप कलङ्कसे मलिन नहीं हुई है—निष्कलङ्क है, वह मनोवृत्ति महान् दुःख विद्यमान हो तो भी उसे उसी प्रकार क्षणभरमें मिटा देती है, जैसे सूर्यकी प्रभा अन्धकारको । वासनायुक्त अज्ञानी चित्तको जहाँ भय नहीं है, वहाँ भी भय दिखायी देता है। जैसे भ्रममें पड़े पथिकको ठूंठा काठ दूरसे पिशाच-जैसा जान पड़ता है । कलङ्कसे मलिन हुआ मन मित्रमें भी शत्रुभावकी आशङ्का करता है, जैसे नशेमें चूर हुआ प्राणी इस पृथ्वीको घूमती हुई देखता है । मनके व्याकुल होनेपर चन्द्रमासे भी वज्रपात होता जान पड़ता है। विष-बुद्धिसे भक्षण किया गया अमृत भी विषका काम करता है । मनकी उत्कट वासना ही जीवके लिये एकमात्र मोहका कारण है, अतः यत्नपूर्वक उसीकी जड़ काटकर उसे उखाड़ फेंकना चाहिये । मनुष्योंका मनरूपी हिरन संसाररूपी वनकी झाड़ीमें वासनारूपी जालसे आकृष्ट हो बडी विवशताको प्राप्त हो जाता है । जिस विचारसे जीवकी

सं० यो० व० अं० ८—

ज्ञेय-पदार्थसम्बन्धिनी वासना कट जाती है, उसका प्रकाश बादलोंके आवरणसे रहित सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होता है । अतः तुम मनको ही मानव समझो, इस स्थूल देहको नहीं । देह जड है; किंतु इसके भीतर रहनेवाले मनको न जड माना जाता है न अजड । तात ! निष्पाप रघुनन्दन ! मनने जो कर दिया, उसीको किया हुआ समझो और मनने जिसे छोड़ दिया, उसीको छोड़ा हुआ मानो । यह सारा जगत् एकमात्र मन ही है । मन ही सम्पूर्ण भूमण्डल है । मन ही आकाश, मन ही भूमि, मन ही वायु और मन ही महत्तत्त्व है । यदि मन सूर्य आदि पदार्थोंमें प्रकाश आदिरूपसे अपने-आपको योजित न करे तो ये सूर्य आदि भी कभी प्रकाशित न हों । जिसका मन मोहको प्राप्त होता है, वही मूढ कहलाता है; यदि शरीर मोहको प्राप्त हो तो उसके शवको कोई मूढ़ नहीं कहता । मन जब देखता है तब नेत्र बन जाता है, सुनता है तब श्रवण या कान बन जाता है, स्पर्शका अनुभव करनेसे वही त्वगिन्द्रियका रूप ग्रहण करता है, सूँघनेसे घ्राणेन्द्रिय और रसास्वादन करनेसे रसनेन्द्रिय हो जाता है । जैसे नाटकमें एक ही नट अनेक भूमिकाओं (विविध रूपों) में देखा जाता है, उसी प्रकार देहके भीतर इन विचित्र इन्द्रिय-वृत्तियोंमें केवल मनकी ही अनुवृत्ति होती है। मन छोटेको बड़ा बना देता, सत्य पदार्थमें असत्ता स्थापित कर देता, स्वादिष्टको कडुवा बनाता और शत्रुको मित्र बना लेता है ।

यदि भगवत्-स्मरण आदि मनोहर मनोवृत्तिका उदय हो तो रौरव नरकका दुःख भी सुखके रूपमें परिणत हो जाता है। जिसे कल सबेरे राज्य मिलनेका विश्वास है, वह यदि कारागारमे अच्छी तरह बँधा हो तो भी उसका वह बन्धन दुःखद नहीं होता । मनके जीत लिये जानेपर सारी इन्द्रियों स्वतः वशमे हो जाती हैं । श्रीराम ! सर्वत्र विद्यमान, स्वच्छ, निर्विकार, सम, सूक्ष्म, साक्षिरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंमें अनुगत, चेत्य पदार्थोंसे अभिन्न तथा चिन्मात्ररूप जो आत्मसत्ता है, उससे उपलक्षित जो