संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वाग् आदि सब क्रियाओंसे रहित ब्रह्म है, उसे भी यह मन देहके तुल्य और जड बनाकर अन्तःकरणमें काम-संकल्प-रूप भ्रान्तिसे और बाहर पर्वत, नदी, समुद्र, आकाश एवं नगर आदिकी लीलासे युक्त हो व्यर्थ घूमता रहता है।
जिसे चित्तने देखा है, वही वस्तु देखी गयी मानी जाती है। यदि चित्तने नहीं देखा तो सामने रक्खी हुई वस्तु भी नहीं दिखायी देती। जैसे अन्धकारमें नील रूपकी कल्पना की गयी है, उसी तरह मनने अपनेमें ही इन्द्रियोंका निर्माण कर रक्खा है। इन्द्रियोंसे मन साकार होता है और मनसे इन्द्रियाँ। इस प्रकार यद्यपि दोनों समान हैं, तथापि इनमें मन ही उत्कृष्ट है; क्योंकि मनसे इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, इन्द्रियोंसे मन नहीं। इस तरह चित्त और शरीर एक-दूसरेसे अत्यन्त भिन्न होनेपर भी जिनकी दृष्टिमें इन दोनोंकी एकता है अर्थात् जो चित्त और शरीर दोनोंको जड-कोटिमें मानकर उन्हें एक-सा समझते हैं, वे ज्ञेय आत्माके ज्ञाता परम ज्ञानी महात्मा हम सबके लिये वन्दनीय हैं। जब मन अन्यत्र आसक्त होता है—किसी दूसरे काममें उलझा रहता है, तब बड़े यत्नसे कही जाती हुई कथाका क्रम भी टूट जाता है। स्वप्नमें जब मन उल्लासको प्राप्त होता है, तब हृदयके भीतर ही निर्मित हुए नगर एवं पर्वत आदि विस्तृत आकाशमें निर्मित नगर और पर्वत आदिके समान अपने-अपने कार्यको करनेमें समर्थ दिखायी देते हैं। जैसे चञ्चल समुद्र अपने-आपमें ही तरङ्गमालाओंका विस्तार करता है, उसी तरह मन स्वप्नावस्थामें अपनेसे विक्षिप्त हुए हृदयमें ही पर्वत और नगरोंकी श्रेणीको फैला देता है। जैसे समुद्रके भीतर जलसे तरङ्गमालाएँ और छोटी-छोटी लहरें प्रकट होती हैं, उसी तरह देहके भीतर मनसे ही स्वप्नगत पर्वत और नगरोंकी पंक्तियाँ प्रादुर्भूत होती हैं। जैसे पत्र, लता, फूल और फलकी शोभा अङ्कुरका ही स्वरूप है—उससे भिन्न नहीं, उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्नकी विलास-भूमियाँ मनका ही विकास हैं, मनसे भिन्न नहीं। जैसे सुवर्णकी नारी-प्रतिमा सुवर्णसे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्नावस्थाकी क्रिया-लक्ष्मी चित्तसे पृथक् नहीं है। जैसे जलका वैभव ही धारा, जलकण, तरङ्ग और फेन आदिकी शोभाके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार जगत्के विविध पदार्थोंके रूपमें यह चित्तका ही विचित्र वैभवशाली नानात्व प्रकट हुआ है। जैसे नट शृङ्गार आदि रसके आवेशसे विभिन्न भूमिका (वेश-वैचित्र्य) को ग्रहण करता है, उसी प्रकार अपनी चित्त-वृत्ति ही यहाँ रागके आवेशसे जाग्रत् और स्वप्नगत दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें उदित होती है।
सब ओर फैला हुआ वासनारूढ मन विषयोंके मननसे अतिशय मोहको प्राप्त हो अपने संकल्पके अनुसार विभिन्न प्रकारकी योनि (जन्मस्थान), सुख-दुःख तथा भय-अभयको प्राप्त होता है। जैसे तिलमें तेल रहता है, उसी तरह मनमें सुख और दुःख रहते हैं। वे ही देश और कालका प्रभाव पड़नेसे कभी घनभूत हो जाते हैं और कभी अत्यन्त सूक्ष्म। मनःशरीरके संकल्पके सफल होनेपर ही स्थूल-शरीर शान्ति एवं उल्लासको प्राप्त होता है, आता-जाता है और उछलता-कूदता है। वह स्वतन्त्र-रूपसे कुछ नहीं करता। जैसे साध्वी स्त्री अन्तःपुरके आँगनमें ही अपने संकल्पसे उदित विविध एवं विस्तृत उल्लासोंके साथ क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार मन इस देहके भीतर अपने संकल्पोंद्वारा कल्पित अनेक प्रकारके बढ़े हुए उल्लासजनक भावोंसे क्रीडा-विलास करता है। इसलिये जो पुरुष अन्तःकरणमें मनको चपलता (विषय-चिन्तन) के लिये अधिक अवसर नहीं देता, उसका वह मन खंभेमें बँधे हुए हाथीके समान स्थिर होकर लयको प्राप्त हो जाता है। निष्पाप रघुनन्दन ! जिसका मन एक लक्ष्यमें स्थिर होकर अपनी चपलताका त्याग कर चुका है, वह ध्यानके द्वारा सर्वोत्तम पद (परब्रह्म परमात्मा) से संयुक्त हो जाता है। जैसे मन्दराचलके स्थिर हो जानेपर क्षीरसागर शान्त हो गया था, उसी प्रकार मनके संयमसे संसाररूपी भ्रान्तिका शमन हो जाता है।
(सर्ग १०३-११०)