संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह चित्त एक महान् रोग है। इसकी चिकित्साके लिये एक बहुत बड़ी औषध है, जो अभीष्टसाधक, निश्चितरूपसे लाभ पहुँचाने-वाली, परम स्वादिष्ट और अपने ही अधीन है; उसे बताता हूँ, सुनो। रागके विषयभूत बाह्य विषयोंका परित्याग करके परमात्मचिन्तनरूपी अपने ही पुरुषार्थमय प्रयत्नसे चित्तरूपी वेतालपर शीघ्र विजय पायी जाती है। जो अभीष्ट वस्तु (बाह्य विषयभोग) को त्यागकर चित्तके राग आदि रोगोंसे रहित हो स्वस्थ रहता है, उसने अपने मनको उसी प्रकार जीत लिया है, जैसे मजबूत दाँतोंवाला हाथी खराब और कमजोर दाँतवाले हाथीको जीत लेता है। स्वसंवेदन (आत्मा या परमात्माके निरन्तर चिन्तन) रूपी प्रयत्नसे चित्तरूपी बालकका पालन किया जाता है अर्थात् उक्त यत्नसे उसके राग और चपलता आदि रोगोंकी चिकित्सा करके उसे स्वस्थ बनाया जाता है। उसे अवस्तु (मिथ्या अथवा अनात्मवस्तु) से हटाकर वस्तु (सत्य अथवा आत्मतत्त्व) में लगाया जाता है तथा उसे बोधसे सम्पन्न किया जाता है। जैसे बालकको प्यार या भय दिखाकर बिना प्रयत्नके ही इधर-उधर जहाँ चाहे लगाया जा सकता है, उसी प्रकार भावोंसे मनको भी अनायास ही अन्तरात्मामें लगाया जा सकता है। ऐसा करनेमें कठिनाई ही क्या है ?
भविष्यमें अभ्युदयरूपी फलको देनेवाले सत्कर्म (समाधिके अभ्यास) में लगे हुए मनको अपने पुरुषार्थसे ही चेतन परमात्माके साथ संयुक्त करे। जो सर्वथा अपने अधीन और परम हितकर है, वह अभीष्ट वस्तुका त्यागरूपी वैराग्य जिसके लिये कठिन हो गया है, वह मनुष्य नहीं, विषयोंका कीड़ा है। उसे धिक्कार है। जैसे कोई पहलवान किसी बालकको अनायास ही पछाड़ देता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धिसे अशेष विषय-समूहमें परम रमणीय परब्रह्म परमात्माकी भावना करके मनको बिना यत्नके ही जीत लिया जा सकता है। पौरुषरूपी प्रयत्नसे चित्तको शीघ्र ही जीत लिया जाता है। जो चित्तको जीतकर उसके प्रभावसे रहित हो गया है, वह बिना किसी प्रयासके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है। अपने चित्तपर आक्रमण करके उसे वशमें कर लेना-मात्र जो सहजसाध्य और स्वाधीन कार्य है, उसे ही जो लोग नहीं कर सकते, वे पुरुष नहीं, गीदड़ हैं। उन्हें धिक्कार है। एकमात्र अपने पौरुषमें ही सिद्ध होनेवाला जो अभीष्ट वस्तुका त्यागरूपी मनोनिग्रहकर्म है, उसके बिना शुभगति नहीं हो सकती। अभीष्ट बाह्य विषयोंका स्मरण न करना अथवा मनोवाञ्छित मोक्ष-सुखकी प्राप्ति कराना जिसका स्वरूप है, उस मुख्य साधन मनोनिग्रहके बिना गुरुका उपदेश, शास्त्रके अर्थका चिन्तन और मन्त्र आदि सारे साधन या युक्तियाँ तिनकोंके समान व्यर्थ हैं*।
संकल्पोंके परित्यागरूपी शस्त्रसे जब चित्तरूपी वृक्षका समूल उच्छेद हो जाता है, तब साधक सर्व-स्वरूप सर्व-व्यापी शान्त ब्रह्मरूप हो जाता है। श्रीराम ! जैसे दिग्भ्रम होनेपर पूर्वमें पश्चिमकी प्रतीति होने लगती है और वह अनुभवके विपरीत बुद्धि उस समय बिल्कुल स्थिर हो जाती है; परंतु विवेकरूपी पुरुष-प्रयत्नसे उस भ्रान्त बुद्धिका भी शीघ्र ही निवारण किया जा सकता है, उसी तरह मनको भी वैराग्यरूपी पुरुष-प्रयत्नसे शीघ्र ही जीता जा सकता है। मनमें उद्वेगका न होना राज्य आदि सम्पत्तिका मूल कारण है। उद्वेग या उकताहट न होनेसे ही जीवको अपने मनपर विजय प्राप्त होती है, जिससे तीनों लोकोंपर विजय पाना तृणके समान सहज हो जाता है। जो नराधम अपने मनके निग्रहमें भी समर्थ
* यह बात मनोनिग्रहकी प्रशंसाके लिये कही गयी है। गुरुके उपदेश और शास्त्रके अभ्यासको व्यर्थ बताना इसका उद्देश्य नहीं है। सद्गुरुके उपदेश और शास्त्रार्थ-चिन्तन कभी व्यर्थ नहीं जाते।