भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नहीं हैं, वे व्यवहार-दशाओंमें व्यवहारका निर्वाह कैसे कर सकेंगे। मैं पुरुष हूँ, मरा हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ और जी रहा हूँ इत्यादि कुदृष्टियाँ चञ्चल चित्तकी वृत्तियों ही प्रतीत होती हैं, जो बिना हुए ही प्रकट हुई हैं। यहाँ न तो किसीकी मृत्यु होती है और न कोई जन्म ही लेता है। मन स्वयं ही अपने मरणका तथा लोकान्तर-गमनका सङ्कल्पमात्रसे अनुभव करता है। जो नित्य सत्, सबका हितकारी, मायामयी मलिनतासे रहित और सर्व-व्यापी परमात्मा हैं, उनमें चित्तका लय हुए बिना मुक्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। इस बातका ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंमें रहनेवाले तत्त्वदर्शी विद्वानोंने बारंबार विचार किया है और सब-के-सब इसी निश्चयपर पहुँचे हैं कि चित्तकी शान्तिके सिवा मुक्तिका दूसरा कोई उपाय है ही नहीं। ऋत, सत्य, व्यापक और निर्मल ज्ञानका हृदयमें उदय होनेपर मनके लय होनेमात्रसे परम शान्ति प्राप्त हो जाती है। यदि आपातरमणीय विषयोंको तुम-जैसे विद्वानूने अरमणीय वस्तुओंकी कोटिमें समझ लिया है, तब तो मेरा विश्वास है कि तुमने चित्तके सारे अङ्ग काट डाले हैं। यह सामने दिखायी देनेवाला जो वह ( पितासे उत्पन्न ) शरीर है, वह मैं हूँ और यह जो घर, खेत आदि धन है, यह सब मेरा है। यह 'मैं' और 'मेरा' ही मन है। यदि यह मैं और-मेरेपनकी भावना न की जाय तो उससे मन उसी तरह कट जाता है, जैसे हँसियासे तृण। जैसे शरद् ऋतुमें आकाशमें बिखरे हुए बादलोंके टुकड़े वायुद्वारा उड़ा दिये जाते हैं, उसी प्रकार मैं और मेरेपनकी कल्पना या भावना न करनेसे मन भी उड़ा दिया जाता है—नष्ट कर दिया जाता है। इसलिये कोई विज्ञ पुरुष जैसे अपने बालक पुत्रको अच्छे कर्ममें लगाता है, उसी तरह विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको कल्याणमें लगाये। जिसका नाश होना कठिन है तथा जो नूतन या बालक न होकर सयाना और दर्पसे भरा हुआ है, उस मनरूपी सिंहको, जो संसारका विस्तार करनेवाला है, जो लोग मार डालते हैं, वे निर्वाणपदका उपदेश देनेवाले महात्माजन इस संसारमें धन्य हैं। उनकी सदा ही विजय होती है। भले ही प्रलयकालके प्रचण्ड पवन प्रवाहित हों, चारों समुद्र एकमें मिलकर एकार्णव हो जायें और बारहों सूर्य एक साथ तपने लगें; परंतु जिसका मन शान्त हो गया है, उस पुरुषकी कभी कोई हानि नहीं होती।

(सर्ग १११)


मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश, अविद्या-वासनाके दोष तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा

श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे बर्फका रूप शीतलता और काजलका रूप कालिमा है, उसी प्रकार मनका रूप अत्यन्त चञ्चलता है।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! इस अत्यन्त चञ्चल मनके तीव्र वेग या चपलताका बलपूर्वक निवारण कैसे हो सकता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्‌में कहीं भी चपलतासे रहित मन नहीं देखा जाता। जैसे उष्णता अग्निका धर्म है, वैसे ही चञ्चलता मनका। चेतन तत्त्वमें जो यह चञ्चल क्रियाशक्ति विद्यमान है, उसीको तुम जगत्का आडम्बररूप मानसी शक्ति समझो। जैसे स्पन्दन और अस्पन्दनके बिना वायुके अस्तित्वका पता ही नहीं चलता, वैसे ही चञ्चल स्पन्दन ( चेष्टा ) के बिना चित्तका अस्तित्व ही नहीं है। जो मन चञ्चलतासे रहित है, वही मरा हुआ कहलाता है। वही तप है और वही शास्त्रका सिद्धान्तभूत मोक्ष कहलाता है। मनके विनाशमात्रसे सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्ति हो जाती है और मनके संकल्पमात्रसे परम दुःखकी प्राप्ति होती है।