संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण] * मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा * २०३
श्रीराम ! मनकी जो यह चपलता है, वह अविद्यासे उत्पन्न होनेके कारण अविद्या कही जाती है। उस अविद्याका ही दूसरा नाम वासनापद है। उसका विचारके द्वारा नाश कर देना चाहिये। विषय-चिन्तनका त्याग कर देनेसे अविद्या और वासनामयी उस चित्त-सत्ताका अन्तःकरणमें लय हो जाता है और ऐसा होनेसे परम श्रेय (मोक्ष-सुख) की प्राप्ति होती है। पौरुष-प्रयत्नके द्वारा मनको जिस वस्तुमें भी लगाया जाता है, उसीको प्राप्त होकर वह अभ्यासवश तद्रूप हो जाता है।
जो संसार-सागरके वेगमें पड़कर तृणारूपी ग्राहकी दाढ़ोंमें फँस गये हैं और भ्रमरूपी आवर्तोंद्वारा दूर बहाये जा रहे हैं, उनके वहाँसे पार जानेके लिये अपना जीता हुआ मन ही नौकारूप है। जिसने परम बन्धनकारी मनरूपी पाशके अपने (जीते हुए) मनके द्वारा ही काटकर आत्माका उद्धार नहीं कर लिया, उसे दूसरा कोई बन्धनसे नहीं छुड़ा सकता। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि हृदयको वासित करनेवाली जो-जो वासना, जिसका दूसरा नाम मन है, उदित होती है उस-उसका परित्याग करे—उसे मिथ्या समझकर छोड़ दे। इससे (वासनात्मक मनके साथ ही) अविद्याका क्षय हो जाता है। भावनाकी भावना न करना ही वासनाका क्षय है। इसीको मनका नाश एवं अविद्याका नाश भी कहते हैं।
रघुनन्दन ! भ्रमसे दो चन्द्रमाओंकी प्रतीतिके समान यह वासना नित्य असत्य होती हुई ही सत्यके समान उठ खड़ी हुई है। इसलिये इसका त्याग कर देना ही उचित है। यहाँपर तत्त्व (अद्वितीय परब्रह्म) के सिवा न कोई सद् वस्तु है न असद् वस्तु। जैसे तरङ्ग-मालाओंसे परिपूर्ण विशाल महासागरमें जलराशिके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है (उसी तरह संसारमें ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भाव या अभावरूप पदार्थ नहीं है)। यदि कर्मका फल सत्य हो तो कर्म उपादेय (ग्राह्य) होना चाहिये और यदि उसका फल मिथ्या हो तो वह कर्म सर्वथा हेय (त्याज्य) ही होना चाहिये, क्योंकि सब लोग एकमात्र उपादेय वस्तुमें ही आसक्त होते हैं। चूँकि कर्मका फल मिथ्या है, अतः उसमें आसक्त न होना ही उचित है। इन्द्रजालके समान यहाँ सब कुछ मायामय और अवास्तविक है; फिर उसमें क्या आस्था हो सकती है—कैसे हेय और उपादेय दृष्टियाँ हो सकती हैं। रघुकुलतिलक श्रीराम ! संसार-वृक्षकी बीज कणिकारूप जो यह अविद्या है, इसका अस्तित्व नहीं है, तो भी यह सत्तायुक्त वस्तुकी भाँति विस्तारको प्राप्त हुई है।
यह अविद्या मनोराज्यकी भाँति केवल कल्पित आकृति-मात्रसे भासित होती है। सत्यताका इसमें सर्वथा अभाव है। यद्यपि यह सैकड़ों, हजारों शाखाओंसे युक्त जान पड़ती है, तथापि वास्तवमें कुछ भी नहीं है। यह जंगलमें प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णाकी भाँति मिथ्या ही है, तो भी इसने व्यर्थ ही आडम्बर फैला रखा है। जैसे मृगतृष्णा उन भोले-भाले मृगोंको ही धोखेमें डालती है—मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार यह अविद्या अज्ञ पुरुषोंको ही धोखा देती है, विज्ञ पुरुषोंको नहीं। जैसे प्रलयकालकी आँधी भीषण रूप धारणकर धूलराशिसे व्याप्त हो बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त कर लेती है, उसी प्रकार अविद्या भी भयंकर आकार धारणकर विचरती है। रजोगुणके आधिक्यसे वह धूसर जान पड़ती है और हठात् लोक-लोकान्तरोंको पददलित कर देती है। जैसे आकाशमें अकारण ही नीलिमा दिखायी देती है, उसी प्रकार यह अविद्या भी किसी कारणके बिना ही प्रतीतिका विषय होती है। दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति इसकी उत्पत्ति हुई है। यह स्वप्नके समान भ्रम उत्पन्न करती है और जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले लोगोंको तटवर्ती ठूँठ काठमें भी गतिशीलताकी प्रतीति होती है, वैसे ही यहाँ इस अविद्याका उत्थान हुआ है।