संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह अविद्या जब चित्तको दूषित कर देती है, तब इससे व्याकुल हुए लोगोंको दीर्घकालतक संसाररूपी स्वप्नका भ्रम बना रहता है। विषयरूपी रथपर आरूढ हुई यह उद्भूत वासनारूपिणी प्रबल अविद्या मनको उसी तरह शीघ्र आक्रान्त कर लेती है, जैसे जाल पक्षीको फाँस लेता है। जैसे विवेक-बुद्धिसे विषय-बुद्धिका निरोध किया जाता है, उसी तरह प्रयत्नपूर्वक इस वासना-रूपिणी अविद्याका भी शीघ्र निरोध करना चाहिये। जैसे स्रोतोंको रोक देनेसे नदी सूख जाती है, उसी प्रकार अविद्याके निरोधसे यह मनोमयी नदी भी सूखकर नष्ट हो जाती है।
श्रीरामजी बोले—ब्रह्मन् ! यह अविद्या अविद्यमान (असत्) है, अत्यन्त तुच्छ है और मिथ्या भावनारूप है, तो भी इसने कोमलाङ्गी युवतीकी भाँति सारे जगत्को अंधा बना रक्खा है—यह बड़े आश्चर्यकी बात है। इसका न कोई रूप है न आकार। यह सुन्दर चेतनसे भी रहित है और असत् होकर भी नष्ट नहीं हो रही है। इसने सारे जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह कैसा आश्चर्य है ! यह सदा अनन्त दुःखोंसे व्याप्त, मृतकके तुल्य और सज्ञाहीन है; तो भी इसने जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह विचित्र बात है। काम और क्रोध ही इसके सुदृढ अङ्ग हैं। तमोगुणकी अधिकतासे यह वक्र जान पड़ती है और ज्ञानका उदय होनेपर यह शीघ्र ही शरीररहित (नष्ट) हो जाती है; तो भी इसने जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह कैसी अद्भुत बात है। अपने आत्मस्वरूप परमात्माके विषयमें जो अंधे (मूढ़) हैं, वे ही इस अविद्याके आश्रय हैं। यह जड है, जडतासे जीर्ण-शीर्ण है और दुःखसे अत्यन्त प्रलाप करनेवाली है; तो भी इसने जगत्को अंधा बना रक्खा है, यह कितने आश्चर्यकी बात है! प्रभो ! अनन्त दुश्चेष्टारूप विलास करनेवाली, जन्म-मरण आदि सुख-दुःखका भागी बनानेवाली तथा मनरूपी गुहागृहमें बद्ध वासनावाली यह अविद्या, जिसकी कहीं समता नहीं है, किस उपायसे नष्ट होती है ?
( सर्ग ११२-११३ )
अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका, विशुद्ध परमात्मस्वरूपका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अविद्याके प्रभावसे उत्पन्न हुआ जो पुरुषका गहन एवं महान् अंधापन है, उसका निवारण कैसे होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे ओस या पालेकी एक कणिका सूर्यका दर्शन होनेसे क्षणभरमें नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माका साक्षात्कार होनेसे इस अविद्याका तत्काल नाश हो जाता है। यह अविद्या संसाररूपी पर्वतशिखरोंके तटवर्ती स्थानोंमें, जो गहन दुःखरूपी काँटोंसे सुशोभित होते हैं, अपने साथ देहाभिमानी जीवको तभीतक नीचे गिरानेके लिये आन्दोलित करती रहती है, जबतक उसका विनाश करनेवाली और मोहको क्षीण बना देनेवाली परमात्म-साक्षात्कारकी इच्छा स्वयं ही उत्पन्न नहीं हो जाती। जैसे सभी दिशाओंमें बारह सूर्योंके एक साथ उदित होनेपर छाया अपने-आप नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप सर्वव्यापी परमात्माका साक्षात्कार होनेपर यह अविद्या स्वय ही विलीन हो जाती है। रघुनन्दन ! बाह्य विषयोंकी इच्छामात्रको यहाँ अविद्या कहा गया है (क्योंकि अविद्यासे ही इच्छा उत्पन्न होती है)। इच्छा-मात्रका नाश ही मोक्ष कहलाता है। वह मोक्ष सङ्कल्पके अभावमात्रसे सिद्ध होता है। जैसे सूर्यका उदय होनेपर रात न जाने कहाँ चली जाती है, उसी प्रकार परमात्माके