संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन * २०५
यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर अविद्या न जाने कहाँ विलीन हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा-ब्रह्मन् ! यह जो कुछ भी दृश्य-प्रपञ्च है, वह (अविद्यासे उत्पन्न होनेके कारण) अविद्या ही है और वह अविद्या परमात्माके चिन्तनसे नष्ट हो जाती है। तब कृपापूर्वक यह बताइये कि वह परमात्मा कैसा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो विषयोंके संसर्गसे रहित, असाधारण और अनिर्वचनीय चेतन तत्त्व है, वह परमेश्वर ही आत्मा या परमात्मा शब्दसे कहा गया है। निष्पाप श्रीराम ! ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंग एव पेड़-पौधों-तक जो यह तृण आदिरूप जगत् है, वह सब सदा परमात्मा ही है। यहाँ अविद्या कहीं नहीं है। यह सब नित्य चैतन्यघन अविनाशी एव अखण्ड ब्रह्म ही है। यहाँ मन नामकी कोई दूसरी कल्पना है ही नहीं। यहाँ तीनों लोकोंमें न कोई जन्म लेता है और न मरता ही है। जन्म-मरण आदि भाव-विकारोंका कहीं अस्तित्व ही नहीं है। इस संसारमें केवल—अद्वितीय एकमात्र ज्ञान-स्वरूप, समानभावसे सबमें व्यापक, अखण्ड और विषय-संसर्गसे रहित सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चैतन्यघन, सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित, शान्त, सर्वत्र समभावसे स्थित, निर्विकार, विज्ञान-स्वरूप परमात्मामें जो यह आवरणसहित जीवात्मा चिन्मय स्वभावसे भिन्न—जड विषयरूप जगत्की स्वय कल्पना करके दौड़ता है, वह अविद्यारूप आवरणसे मलिन हुआ चेतन जीवात्मा ही मनके रूपमें परिणत होनेके कारण 'मन' नामसे कहा गया है। जो संसार वास्तवमें कुछ नहीं है, वह एकमात्र—अद्वितीय, सर्वव्यापी, शान्तस्वरूप परमात्मामें संकल्पमात्रसे ही उत्पन्न हुआ है। अतः जैसे अग्निकी ज्वाला जिससे उत्पन्न हुई, उसी वायुसे शान्त हो जाती है, उसी तरह संकल्पसे उत्पन्न हुई यह सृष्टि संकल्पसे ही नष्ट हो जाती है। भोगाभावरूपताको प्राप्त हुई वह अविद्या एकमात्र असंकल्परूप पुरुष-प्रयत्नद्वारा लयको प्राप्त होती है।
'मैं कृश हूँ, अत्यन्त दुखी हूँ, बँधा हुआ हूँ तथा हाथ-पैर आदि अवयवोंसे युक्त हूँ' इस भावनाके अनुरूप व्यवहारसे जीवात्मा बन्धनमें पड़ता है। 'मेरा दुःखसे कोई सम्बन्ध नहीं है, यह शरीर भी मेरा नहीं है; भला, किस आत्माको बन्धन प्राप्त हुआ है—किसीको भी नहीं, आत्मा नित्य-मुक्तस्वरूप है' इस भावनाके अनुरूप व्यवहारसे जीवात्माकी मुक्ति होती है। नेत्रोंकी ही अपनी दर्शन-शक्तिका क्षय होनेपर अर्थात् अत्यन्त दूरताके कारण दर्शनशक्तिके कुण्ठित हो जानेपर जो वस्तुस्वभावसे अदर्शनरूप अन्धकार उदित हुआ है, वही आकाशकी नीलिमाके रूपमें दृष्टिगोचर होता है। यह जान लेनेपर जैसे आकाशमें कालिमा दीखनेपर भी 'यह वास्तवमें कालिमा नहीं है' ऐसी बुद्धि सुदृढ़ हो जाती है, वैसे ही अविद्यारूपी अन्धकारको भी समझना चाहिये।
जैसे स्वप्नमें 'हाय ! मैं दुःखसे नष्ट हो गया' इस संकल्पसे मनुष्य दुःखसे नष्ट-सा होने लगता है और 'मैं जाग गया हूँ' इस संकल्पसे वह स्वप्नके दुःखसे छुटकारा पाकर सुखी हो जाता है, उसी प्रकार मन विषयके संकल्पसे मूढ़ताको प्राप्त होता है और विज्ञानस्वरूप उदार परमात्माके संकल्प या चिन्तनसे वह विज्ञानमय ब्रह्मभावकी ओर अग्रसर होता है। 'मैं अज्ञानी हूँ' ऐसे संकल्पसे यह अनादि अविद्या एक क्षणमें प्रकट होती है और विस्मरण अर्थात् संकल्प-वासनाओंके मूलोच्छेदसे यह विनाशशीला अविद्या सर्वथा नष्ट हो जाती है।
जो दृश्य पहले ही नहीं था, वह आज भी नहीं है और जो यह भासित हो रहा है, वह शान्त, अद्वितीय, निर्विकार एवं निर्दोष ब्रह्म ही है। अतः कभी किसीके लिये किसी तरह और किसी भी कारणसे ब्रह्मके अतिरिक्त दूसरी कोई मननीय वस्तु नहीं है; इसलिये आदि-अन्तसे रहित निर्विकार ब्रह्ममें पूर्णतः स्थित हो जाना चाहिये।