संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उत्तम बुद्धिके द्वारा परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर प्रयत्न-पूर्वक चित्तसे भोगाशाभावनाको जड़-मूलसहित उखाड़ फेंकना चाहिये । महान् मोह ( अज्ञान ) ही जरा और मरण आदिका कारण है । जो-जो वस्तु कार्यरूपसे प्रकट होती है, वह सब सैकड़ों आशापाशोंसे उल्लसित होने-वाली वासनाका ही विस्तार है । 'ये मेरे पुत्र हैं, मेरा धन है, यह मैं हूँ, यह मेरा घर है' इस प्रकारके इन्द्र-जालसे यह वासना ही वृद्धिको प्राप्त होती है । तत्त्वज्ञ श्रीराम ! परमात्मतत्त्वके सिवा दूसरी कोई वस्तु कभी सत्य नहीं है । अतः वास्तवमें 'मेरा' और 'मैं'—ये दोनों ही नहीं हैं । रघुनन्दन ! ज्ञानीकी दृष्टिमें अविद्या नहीं है । आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी और नदीरूप जो यह अविद्या है, वह अज्ञानीकी ही दृष्टिमें है । ज्ञानीकी दृष्टिमें तो आकाश आदिके रूपमें ब्रह्म ही अपनी महिमामें स्थित है । अहो ! यह कितने आश्चर्यकी बात है कि जो सत्य है, उस ब्रह्मको तो लोग भूल गये हैं और जो असत्य अविद्या नामक वस्तु है, उसीका निश्चितरूपसे निरन्तर स्मरण हो रहा है !
( सर्ग ११४ )
अविद्याकी बन्धनकारितापर आश्चर्य; चेष्टा देहमें नहीं, देहीमें है—इसका प्रतिपादन तथा अज्ञानकी सात भूमिकाओंका वर्णन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! पूज्यपाद महात्मा वसिष्ठके यों कहनेपर कमलनयन श्रीराम प्रफुल्ल पङ्कजके समान शोभा पाने लगे ।
श्रीरामजी बोले—मुनिवर ! जो अविद्या वास्तवमें है ही नहीं, उसने सबको वशमें कर लिया है—यह कैसी विचित्र बात है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—निष्पाप रघुनन्दन ! इस संसारमें काठ और दीवालके समान जड देह कुछ भी नहीं है—वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं है । इस चित्तने ही स्वप्नके संसारकी भाँति इसकी कल्पना कर ली है । श्रीराम ! अज्ञानी जीवात्माको ये अनन्त शारीरिक सुख-दुःख होते हैं । किंतु ज्ञानी महात्मा पुरुषको ये बिल्कुल नहीं होते ( क्योंकि वे परमात्माके यथार्थ स्वरूपको जान गये हैं ) । देह जड है, अतएव वह दुःखका अनुभव नहीं कर सकता । देहाभिमानी जीवात्मा ही अविवेक-के कारण दुखी होता है । यह अविवेक या अविचार अतिशय अज्ञानके कारण है । अज्ञान ही समस्त दुःखोंका हेतु है । एकमात्र अविवेकरूपी दोषके कारण ही जीवात्मा शुभाशुभ कर्मोंके सुख-दुःखादि फलोंका भोक्ता बना है—ठीक उसी तरह, जैसे रेशमका कीड़ा अज्ञान-वश ही रेशमके कोषमें बन्धनको प्राप्त होता है । अविवेकरूपी रोगसे बँधा हुआ, विविध वृत्तियोंसे युक्त मन नाना आकृतियोंमें विचरण करता हुआ चक्रके समान घूमता रहता है । श्रीराम ! जैसे घरका मालिक घरमें अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, किंतु जड गृह स्वयं कुछ भी नहीं करता, उसी तरह शरीरमें जीवात्मा ही विविध चेष्टाएँ करता है, शरीर नहीं ।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण तत्त्ववेत्ताओं-में श्रेष्ठ हैं । सिद्धि देनेवाली ज्ञानकी सात भूमिकाओंका स्वरूप कैसा है ? यह मुझे संक्षेपसे बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अज्ञानकी सात भूमिकाएँ हैं और ज्ञानकी भी सात ही भूमिकाएँ हैं । फिर गुणोंकी विचित्रतासे इन दोनोंके दूसरे-दूसरे असंख्य भेद हो जाते हैं । आत्मस्वरूपमें अनादिकालसे अज्ञानका आरोप है । उस अज्ञानकी ये सात भूमिकाएँ हैं, जिन्हें सुनो—१ बीज-जाग्रत्, २ जाग्रत्, ३ महा-जाग्रत्, ४ जाग्रत्-स्वप्न, ५ स्वप्न, ६ स्वप्नजाग्रत् और ७ सुषुप्ति । इस तरह अज्ञानके ये सात भेद हैं । ये