संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन * २०७
सातों भेद फिर एक दूसरेसे संयुक्त होकर अनेक नाम धारण करते हैं । अब तुम इस सप्तविध अज्ञानके लक्षण सुनो ।
महासर्गके आदिमें चिन्मय परमात्मासे जो प्रथम, नाम-निर्देशसे रहित एवं विशुद्ध व्यष्टि चेतन प्रकट होता है, वह भविष्यमें होनेवाले 'चित्त' और 'जीव' आदि संज्ञा-शब्दों तथा उनके अर्थोका भाजन होकर जाग्रत् अवस्थाके बीजरूपमें स्थित होता है; (क्योंकि वह महाप्रलयके समय भी परमात्मामें बीजरूपसे ही था) इसलिये 'बीज-जाग्रत्' कहलाता है। यह अज्ञानकी नूतन अवस्था है । अब तुम जाग्रत् संसारका वर्णन सुनो । नवजात बीज जाग्रत्के पश्चात् यह स्थूल देह मैं हूँ, यह देह, यह भोग्य पदार्थ-समूह मेरा है' ऐसी जो अपने भीतर प्रतीति होती है, उसे 'जाग्रत्' कहते हैं । 'यह देह मैं हूँ' 'यह भोग्य-समूह मेरा है' इस जाग्रत् प्रतीतिका उत्पन्न होनेके पश्चात् जन्मान्तरके अभ्याससे दृढ़ हुई जो प्रतीति स्फुरित होती है, उसे 'महाजाग्रत्' कहा गया है।* जाग्रत्-पुरुषका अदृढ़ या दृढ़ जो सर्वथा तन्मयात्मक (जाग्रत्के ही तुल्य) मनोराज्य है, उसीको 'जाग्रत् स्वप्न' कहते हैं। दो चन्द्रमाओंका दर्शन, सीपीमें चाँदीकी प्रतीति और मृगतृष्णा (मरुस्थलमें बिना हुए जलकी प्रतीति) आदि भेदकी तरह अभ्यासवश जाग्रत्भावको प्राप्त स्वप्न-मनोराज्य अनेक प्रकारका होता है । 'उसे मैंने थोड़े ही समयतक देखा, वह सत्य भी नहीं है' नींदके समय (सुषुप्ति-कालके आदि या अन्तमें) अनुभवमें आयी हुई बातोंके विषयमें नींदके अन्तमें जो ऐसी प्रतीति होती है, उसे 'स्वप्न' कहा गया है। वह स्वप्न अज्ञ पुरुषकी महाजाग्रत् अवस्थामें स्थित स्थूल शरीरके कण्ठसे लेकर हृदयपर्यन्त नाड़ी-प्रदेशमें प्रकट होता है । चिरकालतक दर्शनके अभावसे जो विकसित नहीं हुआ, वह महाशरीरवाला दृढ़ अभिमान ही स्वप्न है । सुदृढ़ अभिनिवेशसे या चिरस्थायित्वकी कल्पनासे पुष्ट हो जाग्रत्भावको प्राप्त हुआ स्वप्न महाजाग्रत्की समता प्राप्त कर लेता है । इस अवस्थाको प्राप्त हुआ स्वप्न 'स्वप्न-जाग्रत्' माना गया है । पूर्वोक्त छहों अवस्थाओंका परित्याग करनेपर जो जीवकी जड़ अवस्था है, वही भावी दुःखोंका बोध करानेवाले बीजरूप अज्ञानसे सम्पन्न 'सुषुप्ति' कही जाती है । रघुनन्दन ! इस प्रकार सात प्रकारकी अज्ञान-भूमिकाका मैंने वर्णन किया । यह नाना प्रकारके विकारों तथा लोकान्तरोंके भेदोंसे युक्त होनेके कारण निन्द्य एवं त्याज्य बतायी गयी है ।
( सर्ग ११५--११७ )
ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप रघुनन्दन ! अब मैं सात प्रकारकी ज्ञानभूमिकाका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो । पहली ज्ञानभूमिका शुभेच्छा बतायी गयी है, दूसरी विचारणा, तीसरी तनुमानसा, चौथी सत्त्वापत्ति, पाँचवीं असंसक्ति, छठी पदार्थाभावना और सातवीं तुर्या—इस प्रकार ये ज्ञानकी सात भूमिकाएँ मानी गयी हैं ।
स्थितः किं मूढ एवास्मि प्रेक्ष्येऽहं शास्त्रसज्जनैः ।
वैराग्यपूर्वमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः ॥
'मैं मूढ होकर ही क्यों स्थित रहूँ, मैं शास्त्रों और सत्पुरुषोंके द्वारा जानकर तत्त्वका साक्षात्कार करूँगा—
* जैसे ब्राह्मण आदि जातियोंमें उत्पन्न हुए लोगोंमेंसे किसी-किसी व्यक्तिका जन्मान्तरके अभ्याससे अपने वर्णोचित कर्मोंमें विशेष आग्रह और नैपुण्य देखा जाता है, सबमें ऐसी बात नहीं पायी जाती; अतः इस जन्मके या जन्मान्तरके दृढ़ अभ्याससे दृढ़ताको प्राप्त हुई जो पूर्वोक्त जाग्रत् प्रतीति है, उसीको महाजाग्रत् कहा गया है ।