भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण * २१५

करनेके कारण बाह्य विषयोंसे विरत होते हैं। अत उन्हें जगत्‌के व्यवहार उसी तरह सुख नहीं दे पाते, जैसे गाढ नींदमें सोये हुए पुरुषोंको दर्शनीय रूप- सौन्दर्यसे सुशोभित स्त्रियाँ नहीं सुख दे सकतीं। ज्ञानकी ये सात भूमिकाएँ विवेकी पुरुषोंको ही प्राप्त होती हैं। इस ज्ञानदशाको प्राप्त हुए पशु (हनुमान् और नन्दी), अन्त्यज (मूक चाण्डाल, धर्मव्याध, गुह, भील और शबरी) आदि भी सदेह (जीवन्मुक्त) अथवा विदेहमुक्त ही हैं--इसमें संशय नहीं है। चेतन और जडकी ग्रन्थिका विच्छेद ही ज्ञान है। उसके प्राप्त होनेपर मुक्ति हो जाती। क्योंकि मृगतृष्णामें जलबुद्धि अथवा रज्जुमें सर्पबुद्धि आदिका जो बाध है, वैसा ही चेतन और जडकी ग्रन्थिका विच्छेद भी है। कुछ लोग एक ही जन्ममें क्रमशः ज्ञानकी सारी भूमिकाओंको प्राप्त हो जाते हैं। कोई कोई एक, दो या तीन भूमिकाओंतक ही पहुँच पाते हैं। कोई छ भूमिकाओंको प्राप्त होते हैं। कोई एकमात्र सातवीं भूमिकामें ही स्थित रहते हैं। कोई तीन भूमिकाओंतक जाते हैं। कोई अन्तिम भूमिकामें पहुँच जाते हैं। कोई चार भूमिकाओंको प्राप्त होते हैं। कोई दो भूमिकाओंमें स्थित होते हैं। कोई ज्ञानभूमिकाके एक अंशतक ही पहुँच पाते हैं। कोई साढ़े तीन, कोई साढ़े चार और कोई साढ़े छः भूमिकाओंतक पहुँच जाते हैं। जो उन भूमिकाओंमें पहुँचकर उत्तरोत्तर उत्कृष्ट स्थानोंपर विजय पाते जाते हैं, वे महात्मा निश्चय ही वन्दनीय हैं। उन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली है। उस चतुर्थ ज्ञानभूमिका (जीवन्मुक्तावस्था) में पहुँच जानेपर सम्राट् (भूमण्डल- का राजा) और विराट् (देवलोकका राजा) भी तिनकेके समान तुच्छ प्रतीत होता है; क्योंकि वे ज्ञानी महात्मा उस अवस्थामें परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। (सर्ग ११८)


मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण, संक्षेपमें ज्ञानभूमिका एवं जीवात्माके वास्तविक स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! जैसे मृगतृष्णाके जलमें, दो चन्द्रमाओंके भ्रममें और शरीर आदिकी अहंतामें मायासे जो रूप परिलक्षित होता है, वह विचारपूर्वक देखनेपर दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार सुवर्णमें जो कड़े, कुण्डल, अँगूठी आदिका भाव है, वह केवल भ्रान्ति है। वह असत् स्वरूपवाली माया है; क्योंकि उसका वह रूप ही ऐसा है, जो ज्ञानदृष्टिसे देखनेपर कायम नहीं रहता। असद्वस्तु तो सीपमें चाँदी और मरुस्थलमें जलकी भ्रान्तिके समान विचारहीनताके कारण ही सत्-सी प्रतीत होती है। असत् शरीरमें जो अहंताकी भावना है, वही परमा अविद्या है, वही माया है और वही संसृति है। जैसे सुवर्णमें अँगूठीपना आदि वास्तवमें कल्पित हैं, उसी तरह आत्मामें अहंता आदिकी भावना भी कल्पित है। इस प्रकार जो स्वच्छ, शान्त एवं निर्मल है, उस परमो- त्कृष्ट आत्मामें अहंताकी भावना असत् है। वह शुद्ध आत्मा मेरुता, असुरता, मनपना, देहता और महाभूततासे रहित है। उसमें तीनों कालोंकी कल्पना और भावाभाव वस्तुका अभाव है। स्वता, अहंता, आत्मता, तत्ता, सत्ता, असत्ता आदिसे भी वह रहित है। उसमें न कहीं भेदकी कल्पना है, न राग और रञ्जन ही है; क्योंकि ये सब मायामात्र हैं। वह तो सर्वात्मक, शान्त, आश्रयरहित, जगत्‌का कारण, शाश्वत, कल्याणमय, निर्विकार, इन्द्रियों- द्वारा अग्राह्य तथा नाम एवं कारणरहित ब्रह्म है।

रघुनन्दन ! वासनायुक्त चित्त जिस वस्तुकी पर्याप्त- रूपमें जैसी भावना करता है, वह वस्तु चाहे सत् हो अथवा असत्, उसको उसी समय उसी रूपमें प्रतीत होने