संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
लगती है; क्योंकि अहंता आदि भावोंसे युक्त अविद्याका ज्यों ही अभ्युदय हुआ, त्यों ही आदि, मध्य और अन्तसे रहित अनन्त अंगोंका ताँता लग जाता है। जैसे बहुत-से व्यक्तियोंके मनःकलित वचन बहुधा एक-से होते हैं, उसी तरह स्वप्नमें भी देश, काल और क्रिया भी एक-से दीख पड़ते हैं। परंतु उस व्यवहारकी सत्ता अज्ञानसे ही प्रतीत होती है। वास्तवमें तो चेतन सत्ताके अतिरिक्त सम्पूर्ण पदार्थोंकी कोई अन्य सत्ता है ही नहीं। वह चेतन सत्ता भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंमें मौजूद रहती है और वही भिन्न-सी प्रतीत होती है—ठीक उसी तरह, जैसे समुद्रमें तरङ्ग और बीजमें वृक्ष भिन्न-से भासित होते हैं। और जैसे बालूमें तेल आदिका होना असम्भव है, वैसे ही अविद्या कोई वस्तु नहीं है। भला, सोनेके बने हुए कङ्कणमें स्वर्णताके अतिरिक्त दूसरी कौन वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कोई नहीं। अतः अविद्याके साथ आत्मतत्त्वका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता; क्योंकि यह तो अपने अनुभवसे स्पष्ट है कि सभीका अपने समानके साथ ही सम्बन्ध होता है। जब जगत्के सम्पूर्ण पदार्थ चिन्मात्रमय एवं सन्मात्रमय होते हैं, तब वे भाव परस्पर अपने अनुभवके बलपर प्रकाशित होते हैं। विषम पदार्थोंका निरन्तर साक्षात् सम्बन्ध होना असम्भव है और परस्पर सम्बन्ध हुए बिना आपसमें अनुभव भी नहीं हो सकता।
तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! वास्तवमें जैसे मिट्टीकी बनी हुई सेना मृद्बुद्धिसे देखनेपर विचित्र होनेपर भी विचार-दृष्टिसे एकमात्र मिट्टी ही है, तरङ्ग आदि एकमात्र जल ही हैं, काठकी बनी हुई पुतलियोंमें एकमात्र काष्ठ ही व्याप्त है और घट आदि केवल मिट्टी ही हैं, उसी प्रकार यह भ्रमसे प्रतीत होनेवाला जगत् एकमात्र ब्रह्म ही है। द्रष्टाका दृश्य और दर्शनके साथ सम्बन्ध होनेपर उसके मध्यमें जो उसका द्रष्टा, दर्शन और दृश्य आदिसे रहित शुद्ध रूप है, वही वह परब्रह्म है।
श्रीराम ! जैसे शिलामें जल और जलमें अग्नि नहीं है, उसी प्रकार जीवात्मामें चित्त नहीं है; फिर वह परमात्मामें कहाँसे हो सकता है। विचारपूर्वक देखनेपर जो स्वयं ही कुछ नहीं है, उसके द्वारा जहाँ-कहीं जो कुछ किया जाता है, वह 'कृत' नहीं कहलाता। जो मूर्ख असत्य स्वरूपवाले चित्तका अनुवर्तन करते हैं, उन्हें धिक्कार है; क्योंकि वे केवल आकाश-ताडनरूपी कर्ममें व्यर्थ ही समय बितानेवाले हैं।
इस प्रकार भूतलपर पैदा हुए पुरुषको बुद्धिके कुछ भी विकसित होनेपर पहले सत्सङ्गपरायण होना चाहिये; क्योंकि अनवरत प्रवाहित होते हुए इस अविद्यारूपी नदियोंके समूहको शास्त्र एवं सज्जनोंके सम्पर्कके अतिरिक्त और किसी उपायसे पार नहीं किया जा सकता। उस सत्सङ्गद्वारा विवेककी प्राप्ति होनेसे पुरुषको 'यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है', ऐसा विचार उत्पन्न होता है। तब वह शुभेच्छा नामकी ज्ञानभूमिमें अवतीर्ण होता है। तदनन्तर विवेकवश विचारणा नामकी ज्ञानभूमिमें आता है। वहाँ यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति होनेसे मिथ्या वासनाका परित्याग करनेवाले पुरुषका मन सांसारिक वासनाओंसे रहित हो तनुता (सूक्ष्मता) को प्राप्त होता है। इस कारण वह तनुमानसा नामकी ज्ञानभूमिमें अवतीर्ण होता है। फिर ज्यों ही योगी यथार्थ ज्ञानका उदय होनेसे परमात्मामें तद्रूप हो जाता है, त्यों ही उसे सत्त्वापत्ति नामकी ज्ञानभूमि प्राप्त होती है। तब वासनाका विनाश हो जानेके कारण वह 'अमंस्क' कहलाने लगता है और कर्मफलके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् वासनाओंका विनाश हो जानेके कारण स्वाभाविक अभ्यास-से जब वह कार्योंको करता हुआ अथवा उनसे विरत हुआ या संसारकी अनन्य वस्तुओंमें स्थित हुआ भी अपने आत्मामें ही मनके क्षीण हो जानेके कारण बाह्य वस्तुओंका व्यवहार करते हुए भी न तो उन्हें देखता है, न रुचि-पूर्वक उनका सेवन करता है और न स्मरण ही करता