भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

उत्पत्ति-प्रकरण ] * मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण * २१७

है, बल्कि अर्ध-सुप्त एवं अर्ध-प्रबुद्ध पुरुषकी भाँति केवल कर्तव्य-कर्मोंको करता रहता है, तब वह योगी पदार्थ-भावना नामकी योगभूमिको प्राप्त होता है। इस प्रकार जिसका चित्त ब्रह्ममें लीन हो गया है, वह योगी कुछ वर्षोंतक ऐसे स्वाभाविक अभ्याससे बाह्य पदार्थोंका व्यवहार करता हुआ भी जब उनकी भावनासे रहित हो स्वयं तुर्यात्मा हो जाता है, तब 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। जीवन्मुक्त पुरुष न तो प्राप्त हुई वस्तुका अभिनन्दन करता है न अप्राप्तके लिये चिन्ता। वह जो कुछ सामने उपस्थित हो जाता है, उसीका निश्शङ्क होकर अनुवर्तन करता है। रघुनन्दन ! तुम सम्पूर्ण कार्योंकी वासनासे रहित हो, इसलिये तुम सबके अंदर वर्तमान जानने योग्य सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें स्थित हो। अतः तुम चाहे संसारके कल्याणके लिये शास्त्रविहित कर्म करते रहो चाहे एकान्तमें ध्यान-समाधिमें स्थित रहो। श्रीराम ! आत्मा न तो प्रकट होता है न विलीन ही। जैसे घड़ेके फूटकर टुकड़े हो जानेपर घटाकाशका नाश नहीं होता, उसी प्रकार इस शरीरके नष्ट हो जानेपर भी आत्माका विनाश नहीं होता। अरे, यह आत्मा तो अद्वितीय है। फिर दूसरी कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसकी वह अभिलाषा करेगा ? राघव ! जगत्में श्रवण करने योग्य, स्पर्श करने योग्य, देखने योग्य, चखने योग्य और सूँघने योग्य कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो आत्मासे पृथक् हो। वह आत्मा सर्वशक्तिमान्, विस्तृत और व्यक्त है। वासनाक्षयरूप मनोनाश हो जानेपर इस मायाका, जिसमें संस्काररूपसे कर्म करते हैं, अत्यन्त अभाव हो जाता है। जबतक इस मायाका यथार्थ ज्ञान नहीं हो पाता, तभीतक यह बड़े-बड़े मोहोंमें डालती रहती है; किंतु जब यह माया बिना हुए ही प्रतीत हो रही है—इस प्रकारका इसका वास्तविक ज्ञान हो जाता है, तब ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। यह ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुई है और संसारकी लीला करके ब्रह्ममें ही विलीन हो जाती है।

रघुकुलभूषण राम ! जैसे तेजसे सभी प्रकाश आविर्भूत होते हैं, उसी तरह कल्याणमय, रूपरहित, अप्रमेय और विशुद्ध ब्रह्मसे सभी प्राणी उत्पन्न हुए हैं। जैसे पत्तेमें उसकी नसें, जलमें तरङ्गसमूह, सुवर्णमें कटक-कुण्डल आदि और अग्निमें उष्णता आदि व्याप्त हैं, उसी प्रकार यह त्रिलोकी उस ब्रह्ममें ही स्थित है, उसीसे उत्पन्न हुई है और उसीमें विलीन हो जाती है। वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है और वही ब्रह्म कहा जाता है; उसका ज्ञान हो जानेपर इस मिथ्या जगत्का यथार्थ ज्ञान हो जाता है। श्रीराम ! देहके नष्ट होनेपर जीवात्माका नाश नहीं होता। जो चिन्मय जीवात्मा मनसे अतीत होनेके कारण आकाशकी भाँति अव्यक्त है, वह जड़ सुखों अथवा दुःखोंसे व्याप्त कैसे हो सकता है। उस चिदात्मामें, जो सबका साक्षी, सर्वत्र सम, निर्मल और निर्विकल्प है, ये सभी जगत् किसी प्रकारकी इच्छाके बिना ही उसी प्रकार प्रतिबिम्बित होते हैं, जैसे दर्पणमें पदार्थोंका प्रतिबिम्ब। संकल्पोंके पूर्णरूपसे क्षय हो जानेके कारण जब चित्त विलीन हो जाता है, तब सांसारिक मोहरूपी तुषार नष्ट हो जाता है। उस समय शरद्ऋतुके आनेपर स्वच्छ आकाशकी तरह चिन्मय शुद्ध आत्मा ही अद्वितीय, अजन्मा, आद्य एवं अनन्तरूपसे विभासित होता है। जैसे महासागरमें जल-लहरियाँ उत्पन्न होती हैं, दीखती हैं और तुरंत ही विलीन हो जाती हैं, उसी तरह यह मिथ्या मन स्वयं अपने अधिष्ठानभूत चेतनकी स्फुरणासे युक्त होकर सद्-सा दिखायी देता है और साक्षीभूत चेतनमें बारंबार उत्पन्न होकर विलीन होता रहता है।

( सर्ग ११९—१२२ )

उत्पत्ति-प्रकरण सम्पूर्ण ॥