भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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स्थिति-प्रकरण

चित्तरूपसे जगत्का वर्णन, जगत्की स्थितिका खण्डन करके पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन, मनको ही जगत्का कारण बताकर उसके नाश होनेपर जगत्की शून्यताका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अब उत्पत्ति-प्रकरणके अनन्तर इस स्थिति-प्रकरणको श्रवण करो, जो जान लिये जानेपर निर्वाण प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार जगत्-रूपसे स्थित यह दृश्य-प्रपञ्च और अहंता आदि आकार-रहित भ्रान्तिमात्र और असत्स्वरूप ही हैं। यह आकाशमें उत्पन्न हुए चित्रके समान एक निराधार विलक्षण चित्र है। यह यद्यपि ब्रह्मसे अभिन्न है, तथापि जलमें उसके भँवरकी भाँति ब्रह्ममें अन्य-सा स्थित लक्षित होता है। यह जगद्रूपी चित्र चित्रलिखित उद्यानकी तरह फूला हुआ है। इसकी आकृति मकरन्द आदि रससे रहित होनेपर भी सरस प्रतीत होती है। यद्यपि इसका रूप रोगयुक्त नेत्रों-द्वारा देखे गये अन्धकारके चक्रके समान वास्तवमें नहीं है, तथापि यह प्रत्यक्ष-सा दीखता है। यह रसात्मक होता हुआ भी परिणाममें अत्यन्त कटु है और उसके उत्पत्ति-विनाश होते रहते हैं।

ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ राम ! जो समस्त कल्पनाओंसे अतीत एवं निर्मल है, उस महान् अनन्त निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें यदि वास्तवमें जगत् आदि अङ्कुररूपमें विद्यमान हैं तो बताओ कि वह प्रलयकालके पश्चात् किन सहकारी कारणोंके सहयोगसे उत्पन्न हो सकता है ! क्योंकि इस जगत्में किसीने कभी भी वन्ध्याकी कन्याके समान सहकारी कारणोंके अभावमें अङ्कुरकी उत्पत्ति नहीं देखी है। श्रीराम ! यदि कहो कि सहकारी कारणोंके अभावमें भी (रज्जुमें सर्पकी तरह) जगद्-रूपी अङ्कुर आविर्भूत हुआ है तो ऐसी दशामें मूलकारण ही जगत्स्वभावताको प्राप्त हो गया है; क्योंकि सृष्टिके आदिमें यथास्थिति निराकार ब्रह्म ही सृष्टिरूपसे अपने स्वरूपमें स्थित होता है, अतः वहाँ जन्य-जनकका क्रम कहाँसे घट सकता है। इसलिये श्रीराम ! यह जगत् न तो था, न है और न होगा ही। (अतः ब्रह्ममें जगत्का तीनों कालोंमें अत्यन्त अभाव है।) सच्चिदानन्द परमात्मा ही अपने-आपमें इस प्रकार जगत्के रूपमें विकसित हो जाता है। वत्स राम ! जब इस जगत्का अत्यन्ताभाव हो जाता है, तब केवल एक ब्रह्म ही शेष रहता है। किंतु यदि जगत् प्रतीत होता है तो वह ब्रह्म ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है। जब काम कर्म-वासना आदि भावोंके साथ इस दृश्य-प्रपञ्चका उपशमन हो जाता है, तभी इस जगत्का अत्यन्ताभाव होता है; परंतु चित्तके मौजूद रहते दृश्य-जगत्का शमन होना सम्भव नहीं। इसलिये परमात्माके यथार्थ ज्ञानके बिना दृश्यताकी शान्ति नहीं हो सकती। अतः दृश्यस्वरूप जगत्का सर्वथा अत्यन्ताभाव ही दृश्यताकी शान्तिका एकमात्र उपाय है। इसके अतिरिक्त पूर्णरूपसे अनर्थके विनाशके लिये दूसरी कोई युक्ति नहीं है। परमात्मा स्वयं ही अपने संकल्पसे अपने अंदर वर्तमान जिस चमत्कारको प्रकट करता है, वही सृष्टिरूपसे प्रतीत होता है। उसका वास्तवमें न तो कोई रूप है और न कोई आधार ही है। जैसे महाशिलाओंपर खुदे हुए लेखोंके स्वरूप दीख पड़ते हैं, उसी तरह ये सृष्टियाँ न उत्पन्न होती हैं न नष्ट होती हैं तथा न आती हैं, न जाती हैं—केवल प्रतीत होती हैं। जैसे जलका द्रवत्व, वायुका स्पन्दन, समुद्रके आवर्त और गुणीके गुण अपने आधार-स्थानसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह उत्पत्ति-विनाशशील कार्योंवाला यह जगत् एकमात्र अनन्त, शान्त, विस्तृत, विज्ञानघन ब्रह्मरूपसे ही स्थित है, उससे पृथक् नहीं।

श्रीरामजीने पूछा—गुरुदेव ! महाप्रलयके पश्चात् सृष्टिके आरम्भमें सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाले ये प्रजापति स्मृतिरूपसे