भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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स्थिति-प्रकरण ] * चित्तरूपसे जगत्का वर्णन, पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन * २१९


ही उत्पन्न होते हैं, इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि उन स्मृत्यात्मासे प्रकट हुआ यह जगत् भी स्मृतिरूप ही है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघूद्वह ! यह ऐसा ही है। महाप्रलयके अनन्तर सर्गके आदिमें सर्वप्रथम ये प्रजापति स्मृतिरूपसे ही प्रकट होते हैं, अतः उनका संकल्परूप यह जगत् भी स्मृतिरूप ही है। उन प्रजापतिके प्राथमिक संकल्पनगर ही जगद्रूपसे प्रकाशित हो रहा है। ज्ञानीके लिये यह जगत् शान्त एव अविनाशी केवल ब्रह्म ही है, परंतु वही अज्ञानीकी बुद्धिसे भासमान नाना लोकोंसे युक्त है। पर्वतपर स्थित परमाणु जैसे पर्वतसे भिन्न नहीं हैं और न उनकी गणना ही की जा सकती है, उसी प्रकार ब्रह्मरूपी महान् मेरुगिरिपर स्थित त्रैलोक्यरूपी परमाणु ब्रह्मसे अभिन्न तथा असंख्येय हैं। इस सृष्टिको यदि सृष्टिके रूपमें ही समझा गया, तब तो यह अधोलोकमें ले जाती है; परंतु इसीको यदि ब्रह्मरूपसे जान लिया गया तो यह परम मङ्गलमयी हो जाती है। यह सब जगत् विश्वके कारण विज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा ही है; क्योंकि जिससे जो उत्पन्न होता है, उसे तद्रूप ही समझना चाहिये। इसलिये समस्त वेद्य दृश्य-प्रपञ्च आत्मज्ञान हो जानेपर ज्ञानीकी दृष्टिमें शुद्ध चिन्मात्र ही है।

श्रीराम ! साधकके द्वारा इन्द्रियसमुदायपर विजय-प्राप्ति-रूपी पुलके आश्रयसे ही इस भवसागरको पार किया जा सकता है, अन्य किसी भी कर्मसे इससे पार पाना कठिन है। निरन्तर शास्त्राध्ययन और सत्संगतिके अभ्याससे जो विवेकयुक्त हो गया है, वही इन्द्रियजयी होता है और उसीको इस दृश्य-प्रपञ्चके अत्यन्ताभावका ज्ञान भी प्राप्त होता है। सौन्दर्यशालियोंमें श्रेष्ठ राम ! संसार-सागरकी श्रेणियाँ जैसे आती हैं और पुनः जैसे चली जाती हैं, वह सारा स्वरूप मैंने तुमसे वर्णन कर दिया। अब इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? मन ही कर्मरूपी वृक्षका अङ्कुर है। उस मनके नष्ट हो जानेपर कर्मरूपी शरीरवाला संसार-वृक्ष भी नष्ट हो जाता है। श्रीराम ! यह सब कुछ मन ही है। इस मनकी चिकित्सा हो जानेपर जगज्जालरूपी सारी व्याधियोंकी चिकित्सा हो जाती है। यह मन ही जब देहाकारका मनन करता है, तब लोकमें कर्म करनेमें समर्थ देह उत्पन्न होती है। भला, कहीं मनसे भिन्न भी देह देखी जाती है ! जैसे विशाल आकाशमें असत्स्वरूप गन्धर्वनगरकी प्रतीति होती है, उसी तरह विषयोंके चिन्तनसे वृद्धिगत हुए मनमें यह सारा जगत् स्फुरित होता है। मन ही जगत् है तथा सम्पूर्ण जगत् ही मन है; ये दोनों एक साथ रहते हैं।

रघुनन्दन ! समस्त एषणाओंकी शान्ति हो जानेपर विशुद्ध-चित्त पुरुषकी जो स्थिति है, उसीको सत्य आत्मतत्त्व कहा गया है और उसीको निर्मल चैतन्य कहते हैं। निर्मल सत्वरूप मन जिस वस्तुके विषयमें जैसी भावना करता है, वह वस्तु तत्काल वैसी ही हो जाती है। जैसे इस समय जाग्रत्-अवस्थामें हमलोगोंको संसारका स्वयं ही प्रत्यक्ष भान होता है, उसी प्रकार स्वप्न और भ्रम आदि अवस्थाओंमें सहस्रों संसार भी मिथ्या दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे एकको दूसरेके स्वप्न और मनोरथसम्बन्धी नगरोंके व्यवहार पृथक् होनेके कारण दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्तिके ये संसाररूपी भ्रम पृथक्-पृथक् होनेके कारण एक दूसरेके दृष्टिगोचर नहीं होते। इसी प्रकार संकल्परूपी आकाशमें अनेक संसार-रूपी नगरोंके समुदाय हैं; परंतु वे ज्ञानदृष्टिके बिना मिथ्या नहीं प्रतीत होते। जैसे एकमात्र वसन्त ऋतुका रस ही वन, लता और गुल्म आदिके रूपमें प्रकट होता है, उसी तरह एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही प्रत्येक व्यक्तिके लिये मिथ्या जगतरूपसे प्रकट हुआ है। अपना यह संकल्प ही जगत्के आकारमें प्रतीत हो रहा है, यह बात अत्यन्त परमार्थ-दृष्टिसे ही ज्ञात होती है।