संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
अपने-अपने स्वभाव ( अनादि अज्ञान ) के भीतर स्थित चित्त ही प्रत्येक जीवमें इदमित्थं रूपसे प्रतीत होनेवाला यह जगत् है । इस प्रकार प्रतीतिमात्र जगत्को असत्य समझनेवाला चित्त स्वयं ही नष्ट हो जाता है; क्योंकि प्रतीतिकालमें ही इस जगत्की सत्ता है। परमार्थ वस्तु ( अधिष्ठानरूप ब्रह्म )-का साक्षात्कार होनेपर उसकी सत्ता नहीं रहती । चित्तकी सत्ता ही जगत् है और जगत्की सत्ता ही चित्त है । एकके अभावसे दोनोंका अभाव हो जाता है । यह इन दोनोंका अभाव सत्यस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्म-विषयक विचार करनेसे ही सम्भव है। जैसे मलिन मणिको युक्तिसे साफ करनेपर उससे शुद्ध प्रकाश प्रकट होता है, उसी तरह शुद्ध चित्तका अनुभव सत्य होता है । चिरकालतक एक परमात्माके चिन्तनरूप दृढ़ अभ्याससे चित्तकी शुद्धि होती है। जो संकल्पोंसे आक्रान्त नहीं है, ऐसे चित्तसे ज्ञानका उदय होता है । जैसे मलिन वस्त्रमें सुन्दर रंग नहीं टिकता, उसी तरह वासनासे मलिन चित्तमें ब्रह्माकाररूप एक दृष्टि स्थिर नहीं होती । वासनासे रहित होना ही चित्तकी शुद्धि है, जगत्के ज्ञानसे शून्य और एक ब्रह्माकार होना ही उसका वासनासे रहित होना है। चित्तकी शुद्धि होनेसे पुरुष शीघ्र ही प्रबुद्ध ( ज्ञान-सम्पन्न ) हो जाता है । चित्तका चिन्मय परमात्मारूपमें लय हो जाना ही उसकी वास्तविक शुद्धि है । इस शुद्धिका लाभ होते ही प्रबुद्ध पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है । ( सर्ग १–१७ )
स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेदभ्रमकी अनुभूति, चित्तशुद्धि एवं जाग्रत् आदि अवस्थाओंके शोधनसे ही भ्रम-निवारणपूर्वक आत्मबोधकी प्राप्ति तथा वैराग्यमूलक विवेकसे ही मोक्ष-लाभका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस प्राणीका जिस तरहके कर्मोंका भोगानुकूल फल जहाँ जैसे रहता है, वहाँ उतना ही वह अनुभव करता है, उससे अतिरिक्त नहीं । एक व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान जो मनोराज्य है, उसे देखने या भोगने आदिमें दूसरे व्यक्तिका मन सफल नहीं होता । यह जो असफलताको प्राप्त हुई मनकी स्थिति है, वही उसके विच्छेद यानी नानात्वमें हेतु है—यों जानना चाहिये । उस मनके भेदसे ही जीवोंके भी भेद होते हैं अर्थात् जैसे भिन्न-भिन्न मन हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न जीव भी हैं । जैसे सुवर्ण अपने ज्ञानके अभावसे कड़े-कंगन आदिके रूपको प्राप्त होता है, उसी प्रकार जिसे अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है, उस चेतनने स्थूल देहको स्वीकार करके संसाररूपिणी अविद्याका मिथ्या ही अनुभव किया है ।
सम्पूर्ण जीव-समूहोंका आत्मा स्वयं ही अपने संकल्पसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन अवस्थाओंको प्राप्त हुआ है । इन अवस्थाओंमें शरीर कारण नहीं है । इस प्रकार जाग्रत् आदि तीन अवस्थारूप आत्मामें ही जीवत्व है अर्थात् वह आत्मा ही जीवरूपसे स्फुरित हो रहा है; इसमें शरीरत्वका विकास नहीं है । तात्पर्य यह कि जैसे जल ही लहर एवं भँवर आदिके रूपमें विख्यात होता है—यह तात्त्विक दृष्टि प्राप्त होनेपर जलमें उससे पृथक् लहर आदिकी सत्ता नहीं रहती, उसी प्रकार जीवात्मा ही जाग्रत् आदि अवस्थारूप है—यह विचार दृढ़ होते ही जीवसे पृथक् देहकी वास्तविक सत्ता शेष नहीं रह जाती ।
इसी प्रकार तत्त्वज्ञ पुरुष सुषुप्ति-अवस्थाके अवसानभूत तुरीय पदरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मपदको ज्ञानद्वारा प्राप्त करके संसारसे निवृत्त हो जाता है; परंतु जो मूढ़ जीव है, वही सृष्टिमें प्रवृत्त होता है । ज्ञानी और अज्ञानी दोनोंकी सुषुप्ति एकरूप ही है; क्योंकि अज्ञको भी सुषुप्तावस्थामें सुखकी प्राप्ति होती है । किंतु अज्ञानी जीव तो सुषुप्तावस्थामें पहुँचकर भी असम्बुद्ध ( वास्तविक आत्मज्ञानसे रहित और देहात्मभावकी भ्रान्ति-वासनासे वासित ) होनेके कारण सृष्टिको प्राप्त होता है, परंतु