संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थिति-प्रकरण ] * स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेदभ्रमकी अनुभूति तथा विवेकसे ही मोक्षलाभका वर्णन * २२१
ज्ञानी नहीं। परब्रह्म परमात्मा निर्विशेष होनेके कारण अभाव नहीं कहा जा सकता। निर्विकार, अद्वितीय और असङ्ग होनेके कारण जो वास्तवमें किसीका कारण नहीं है, तथापि सम्पूर्ण प्रपञ्चके आरोपका अधिष्ठानरूपसे आदिकारण है, उस निर्विशेष परब्रह्म परमात्मामें वस्तुतः कारण एवं निमित्त आदि वस्तुकी भी सम्भावना नहीं है। (अतः ब्रह्ममें बिना किसी कारणके ही प्रतीत होनेवाला यह जगत् मिथ्या ही है।)
सार वस्तु (ब्रह्म)-का ही विचार करना उचित है। असार वस्तु (दृश्य संसार)-के विचारसे क्या लाभ। बीज अपने स्वरूपका त्याग करके अङ्कुर आदिके क्रमसे फलरूपमें परिणत होता देखा जाता है, परंतु ब्रह्म वैसा नहीं है। वह अपने स्वरूपका त्याग किये बिना ही जगत्रूप अध्यारोपका अधिष्ठानरूपसे कारण होता है, बीजका अवयव आदि सब कुछ साकार है। अतः उससे निराकार परम पदरूप ब्रह्मकी तुलना करना उचित नहीं। इसलिये कल्याणस्वरूप ब्रह्मके लिये कोई उपमा सम्मत ही नहीं हो सकती। अपनेको दृश्यरूपमें देखनेवाला द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप आत्माको नहीं देख सकता (इसलिये उसे अनर्थकी प्राप्ति होती है)। जिसकी बुद्धि प्रपञ्चसे आक्रान्त हो, ऐसे किसी पुरुषको अपनी यथार्थ स्थितिका ज्ञान नहीं होता।
जबतक भ्रान्तिसे मृगतृष्णामें जलकी प्रतीति हो रही है, तबतक किसीकी समझदारी किस कामकी; और जब यह ज्ञान हो गया कि यहाँ जल नहीं है, तब वहाँ मृगतृष्णा ही क्या रह गयी। जैसे नेत्र बहिर्मुख होनेके कारण अपने-आपको नहीं देख पाता, उसी प्रकार आकाशकी भाँति निर्मल होता हुआ भी द्रष्टा बहिर्मुख होनेके कारण अपने स्वरूपका साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह भ्रमकी प्रबलता कैसी आश्चर्यजनक है ! यदि दृश्य-प्रपञ्चको दृश्यरूपसे ही सच्चा समझा जाय तो आकाशके समान निर्मल ब्रह्म यत्न करनेपर भी नहीं मिल सकता; फिर तो उसकी प्राप्ति बहुत दूर हो जाती है। श्रीराम ! इसीलिये उसको दृश्य ही दिखायी देता है, द्रष्टाका दर्शन नहीं होता। वास्तवमें एकमात्र द्रष्टा ही सर्वत्र स्थित है, दृश्य नामकी कोई वस्तु यहाँ है ही नहीं (जो कुछ दिखायी देता है, वह केवल भ्रम है)। जब द्रष्टा और दृश्यमें कोई अन्तर ही नहीं रहा, तब कौन द्रष्टा और कैसा दृश्य, क्योंकि वह द्रष्टा ही दृश्यरूपमें प्रकट होता है।
जब चित्त सिद्धिको प्राप्त होता है, तब जीव जड-संसर्गसे मुक्त हो केवल शुद्ध चिन्मय आत्मस्वरूपसे स्थित होता है। वह चेतन आत्मा शुद्ध एवं सर्वव्यापी है; चेतन आत्मा जहाँ जिस वस्तुकी भावना करता है, वहाँ वह तत्काल प्रकट हो जाती है। उसने स्वप्नमें भी जो कुछ देखा है, वह स्वप्नके समयमें सत्य ही है। जैसे बीजके अंदर सूक्ष्मरूपसे पत्ते, लता, फूल और फलरूप अणु रहते हैं, उसी प्रकार चेतनरूप अणुके भीतर समस्त सूक्ष्म अनुभव विद्यमान हैं। जिस पुरुषके भीतर यह विचार नहीं उठता कि मैं कौन हूँ और यह जगत् क्या है, वह संसारके बन्धनसे मुक्त नहीं हुआ। जिस विशुद्ध बुद्धिवाले पुरुषकी भोगलिप्सा प्रतिदिन क्षीण होती जाती है, उस वैराग्यवान्का ही विवेकयुक्त विचार सफल होता है। जैसे शरीरके द्वारा पथ्य-भोजन आदि नियमोंके साथ सेवन किया हुआ औषध ही आरोग्य प्रदान करता है, उसी प्रकार जितेन्द्रियताका अभ्यास हो जानेपर ही विवेक सफल होता है। चित्रमें अङ्कित प्रज्वलित अग्निकी भाँति जिसका विवेक केवल कथनमात्र ही है, कार्यमें परिणत नहीं हुआ है, उसने अविवेकका त्याग नहीं किया है; अतः वह अविवेक उसे दुःख ही देनेवाला होगा। जैसे स्पर्शसे ही वायुकी सत्ताका भान होता है, कथनमात्रसे नहीं, उसी प्रकार भोगेच्छाके क्षीण होनेसे ही पुरुषका विवेक जाग्रत् होता है। चित्रलिखित अमृत अमृत नहीं है, चित्रलिखित अग्नि अग्नि नहीं है, चित्रलिखित नारी