भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

२२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

निश्चय ही नारी नहीं है; उसी तरह कथनमात्रका विवेक विवेक नहीं है, वास्तवमें अविवेक ही है। विवेकसे पहले राग और द्वेषका समूल नाश हो जाता है। तत्पश्चात् विषयभोगोंके लिये प्रयत्न सर्वथा क्षीण हो जाता है। जिस पुरुषमें विवेक जाग्रत् है, वही परम पवित्र है।

(सर्ग १८-१९)


उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन, मनको सत्य आत्मामें लगानेका आदेश, मनको भावनाके अनुसार रूप और फलकी प्राप्ति तथा भावनाके त्यागसे विचारद्वारा ब्रह्मभावकी प्राप्तिका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! वे जीव अपनी सिद्धिके लिये जैसे-जैसे प्रयत्न करते हैं, उन विविध उपासनाओंके रूपसे वे शीघ्र वैसे-ही-वैसे हो जाते हैं। देवताओंकी पूजा करनेवाले देवताओंको, यक्षोंकी आराधना करनेवाले यक्षोंको और ब्रह्मके उपासक ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। इनमें जो सर्वोत्तम है, उसी परमात्मारूप इष्टदेवका आश्रय लेना चाहिये।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप मुझे जाग्रत् तथा स्वप्न-अवस्थाओंका भेद बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी प्रतीति स्थिर हो, उसे जाग्रत् कहते हैं और जिसकी प्रतीति स्थिर नहीं होती, उसे स्वप्न कहा गया है। यदि स्वप्न भी कालान्तरमें स्थित हो तो प्रत्यक्ष अनुभवके आधारपर उसे जाग्रत्‌की श्रेणीमें ही देखा जायगा; और यदि जाग्रत् भी कालान्तरमें स्थित नहीं है तो वह स्वप्न ही है। इस प्रकार जाग्रत् स्वप्नभावको और स्वप्न जाग्रत्-भावको प्राप्त होता है। स्वप्न भी स्वप्नकालमें स्थिर होनेके कारण जाग्रत्-भावको प्राप्त होता है और जाग्रत्‌के मनोरथ भी जाग्रत्कालमें अस्थिर होनेसे स्वप्न ही हैं; क्योंकि वैसा ही बोध होता है।

रघुनन्दन ! मैंने तुमसे यह जो कुछ कहा है—जाग्रत् आदि अवस्थाओंका वर्णन किया है, वह सब मनके स्वरूपका निरूपणमात्र है। और किसी हेतु या प्रयोजनसे यह सब नहीं कहा गया है। जैसे अग्निके सम्पर्कमें आनेसे लोहेका गोला आग बन जाता है, उसी प्रकार दृढ़ निश्चयसे युक्त चित्त जिस वस्तुकी बारंबार भावना करता है, उसीके आकारको प्राप्त हो जाता है। भाव, अभाव, ग्रहण और त्याग आदि सारी प्रतीतियाँ चेतनमें मनके द्वारा कल्पित हैं। ये प्रतीत होती हैं, इसलिये तो ये असत्य नहीं हैं और वास्तवमें ये हैं नहीं, इसलिये सत्य नहीं हैं। चित्तकी चपलतासे ही इनका निर्माण हुआ है। मन मोहका जनक और जगत्‌की स्थितिका कारण है। मलिन मन ही व्यष्टि और समष्टिरूपसे इस जगत्‌की कल्पना करता है। संसारकी सारी विभूतियाँ एकमात्र मनको जीतनेसे ही प्राप्त होती हैं। चित्त जिसकी भावनामें तन्मय होता है, उसे निस्सन्देह प्राप्त कर लेता है। सौभाग्यशाली श्रीराम ! मनके द्वारा अभिलषित देश या विषयको शरीर प्राप्त होता है। परंतु शरीरके द्वारा आचरित देश या विषयको मन नियमतः प्राप्त नहीं होता।

जैसे सुगन्धित पुष्पके भीतर स्थित हुई वायु उसकी घनीभूत सुगन्धको प्राप्त कर लेती है, उसी प्रकार मननसे चञ्चल हुआ मन जिस-जिस वस्तुकी भावना करता है अथवा जिस-जिस वासनासे युक्त भावको अपनाता है, उसीके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। श्रीराम ! जैसे गन्धके भीतर स्थित हुई वायु गन्धरूपताको प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार मन जिस भावसे युक्त होता है, उसके बाद उसका वशवर्ती शरीर भी उसीके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। ज्ञानेन्द्रियोंके अपने-अपने विषयमें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 259, कुल 750 में से · BharatKosha