भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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स्थिति-प्रकरण ] * उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन *


प्रवृत्त होनेपर उनसे कर्मेन्द्रियरूप स्वतः ही इस तरह स्फुरित होता है, जैसे धूलमिश्रित वायुमें पृथ्वी अपने-आप धूलिकणोंके रूपमें स्फुरित होती है । कर्मेन्द्रियाँ क्षुब्ध होकर जब अपनी क्रियाशक्तिको प्रकट करती हैं, तब वायुमें धूल-समूहकी भाँति मनमें प्रचुर कर्म सम्पादित होता है । इस प्रकार मनसे कर्मकी उत्पत्ति हुई है और मनकी उत्पत्तिमें भी कर्मको ही बीज (कारण) बताया गया है । फल और सुगन्धकी भाँति इन दोनोंकी सत्ता एक दूसरेसे भिन्न नहीं है । दृढ़ अभ्यासके कारण मन जैसे भावको ग्रहण करता है, वैसे ही स्पन्द और कर्म नामकी शाखाओंको वह प्रकट करता है तथा उसी तरहकी क्रियारूप उसके फलको बड़े आदरसे उत्पन्न करता है । तदनन्तर उसीके स्वादका अनुभव करके शीघ्र बन्धनमें पड़ता है । मन जिस-जिस भावको अपनाता है, उसी-उसीको वस्तुरूपमें पाता है । वही श्रेय है, दूसरा नहीं—ऐसा उसका निश्चय हो जाता है । अपनी-अपनी प्रतीतिके द्वारा ही दृढ़तापूर्वक भिन्नताको प्राप्त हुए (मनुष्योंके) मन सदा ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये प्रयत्न करते हैं ।

जो अकृत्रिम अर्थात् नित्य-सिद्ध विज्ञान-आनन्दघन परमात्मा हैं, उनके लिये प्रयत्न करनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे अपने मनको तन्मय बना दें, जिससे उसकी प्राप्ति हो सके । यह दृश्य माया है, अविद्या है और भय देनेवाली भावना है । मनकी जो दृश्यमयता है, विद्वान्‌लोग उसीको (बन्धनमें डालनेवाला) कर्म कहते हैं । स्वभावमें स्थित जो यह दृश्य-तन्मयता अनुभवमें आती है, वही विद्वानोंद्वारा मदिराके समान संसारको उन्मत्त बना देनेवाली अविद्या कही जाती है । जैसे पटलनामक रोगसे अंधा हुआ पुरुष सूर्यके दीप्तिमान् प्रकाशको नहीं देखता, उसी प्रकार इस अविद्यासे

वह अविद्या संकल्पसे स्वयं उत्पन्न होती है । भ भावनाके संकल्पको त्याग देनेमात्रसे जब वह जाती है, उस समय रसस्वरूप आनन्दमय पर ध्यानके अभ्यासकी दृढ़तासे सुशोभित श्रवण म विचारके द्वारा सब पदार्थोंमें अनासक्ति स्थिर हो है । फिर सम्यग्दृष्टिके प्राप्त होनेपर असत्य दृष्टिका हो जाता है और वह निर्मल-स्वभाव, निर्विकल्प सच्चिदानन्द परमात्मा प्राप्त हो जाता है, जो न न असत् है न सुखी है न दुखी है तथा कैक्यभाव अपने हृदयमें अनुभवसे ही प्राप्त हो जैसे यह रस्सी है या सर्प है—ऐसा सन्देह रस्सीमें सर्पभाव आरोपित होता है, उसी प्रकार रहित चिन्मय आकाशस्वरूप जीवात्माने अपनेमें बन्धनकी कल्पना कर रखी है । जैसे एक ही रात और दिनकी कल्पनासे रातमें और तरहका देता है और दिनमें अन्य प्रकारका, उसी तरह वस्तु ब्रह्म बारंबार उस प्रतिकूल कल्पनाद्वारा प्रकारका भासित होता है और अपने स्वरूपसे दूसरा ही रूप धारण कर लेता है । जो तुच्छ आभास-रहित है, उपाधिशून्य है, जिसमें ब नहीं है तथा जो नाना प्रकारकी कल्पनाओं वह परब्रह्म परमात्मा ही परम सुखस्वरूप होने सुख दे सकता है । जीवकी अपनी कल्पनासे अभाव, शुभ और अशुभ क्षणभरमें उत्पन्न हो और क्षणभरमें मिट जाते हैं । समस्त पद भावके अनुसार ही फल देनेवाले हैं, यह जान पुरुष इस परिवर्तनशील जगत्‌के पदार्थोंके विष एक निश्चित रूपका प्रतिपादन नहीं कर दृढ़ भावनाके द्वारा जिस पदार्थके विषयमें जब निश्चित धारणा बनाये रखता है, तबतक व ही परिणामको वह देखता या अनुभव क ... । वह प्रत्यक्ष बाह्य हो है अथवा