संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अभिन्न है, ऐसा अपने मनमें निश्चय करके तुम अपनी बुद्धिके द्वारा उस अनादि अनन्त परमात्माका अपने आपमें ही अनुभव करो—मैं ही वह परब्रह्म परमात्मा हूँ, ऐसा अनुभव करो। (सर्ग २०-२१)
दृढ़ बोध होनेपर सम्पूर्ण दोषोंके विनाश, अन्तःकरणकी शुद्धि और विशुद्ध आत्मतत्त्व-के साक्षात्कारकी महिमाका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो नित्यानित्य वस्तुके विवेकसे सम्पन्न है, जिसके चित्तकी वृत्तियाँ परमात्मामें विलीन होती जा रही हैं, जो ज्ञान प्राप्त करके संकल्पोंका त्याग कर रहा है, जिसका मन परमात्माके स्वरूपमें परिणत हो गया है, जो इस हेय नाशवान् जड दृश्यका परित्याग कर रहा है तथा उपादेय सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका ध्यान कर रहा है, अर्थात् जो द्रष्टा परमात्माका अनुभव करता है तथा अद्रष्टारूप दृश्य-का अनुभव नहीं करता, जागरणके योग्य परम तत्त्वमें ही जाग रहा है और घनीभूत अज्ञानके विकाररूप संसारसे सोया हुआ है, जो सम्पूर्ण तुच्छ सुखोंसे लेकर हिरण्यगर्भ ब्रह्मतकके सुखोंमें अत्यन्त वैराग्यके कारण सरस और नीरस आपातरमणीय भोगोंमें आसक्त न होकर उनकी ओरसे पूर्णतया विरक्त है, जिसके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं है-ऐसे अधिकारी पुरुषका अनादि जडता (अज्ञान)-रूपी आकाश आसक्तिशून्य हो जब परमात्मारूपी जलके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है और धूपमें बर्फकी भाँति पूर्णतया विगलित हो जाता है। वर्षाकाल बीत जानेपर जैसे तरङ्गयुक्त जलसे चञ्चल मध्यभागवाली लहराती हुई नदियाँ धीरे-धीरे सूखने लगती हैं, उसी प्रकार जब विषयरूपी तरङ्गोंसे युक्त तृष्णाएँ शान्त हो जाती हैं तथा जैसे चूहे चिड़ियोंके जाल काट देते हैं, उसी प्रकार जब तीव्र वैराग्यसे संसार-वासना-रूपी जाल टूट जाता है और हृदयकी गाँठें ढीली पड़ जाती हैं, तब जैसे निर्मलीको पीसकर जलमें डालनेसे जल स्वच्छ हो जाता है, उसी तरह विज्ञानके प्रभावसे अन्तःकरण विशुद्ध होकर प्रसन्न हो जाता है। जैसे वायुके शान्त होनेपर समुद्रमें (निश्चलता) रूप समता आ जाती है, उसी प्रकार मनके शान्त होनेपर सब जगह सर्वोत्तम शान्ति पैदा करनेवाली अज्ञानरूपी मलसे रहित उन्नत समदर्शिताका उदय होता है। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ—जिसने जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वको जान लिया है, वह परम बुद्धिमान् पुरुष वायु आदि चारों भूतोंसे रहित आकाशकोशके समान न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है।
मैं कौन हूँ, यह दृश्य जगत् कैसे हुआ ?—इन सब बातोंका जबतक विवेकपूर्वक विचार नहीं किया जाता, तभीतक यह अन्धकारके समान संसारका आडम्बर खड़ा है। मिथ्या भ्रमसमूहसे उत्पन्न यह शरीर आपत्तियों-का घर है। जो आत्मभावनाके द्वारा इस दृश्यको नहीं देखता अर्थात् जो यह दृश्य नहीं है, सब कुछ आत्मा ही है—ऐसा देखता है, वही यथार्थरूपसे देखनेवाला है। जो देश और कालवश शरीरमें उत्पन्न हुए सुख-दुःखोंको भ्रमरहित दृष्टिसे 'ये मेरे नहीं हैं' इस तरह देखता है, वही यथार्थ द्रष्टा है। जो असीम आकाश, दिशा और काल आदि हैं तथा उनमें वर्तमान जो परिच्छिन्न क्रियाओंसे युक्त वस्तु है, वह सब 'मैं ही हूँ'—इस प्रकार जो सबमें अपने आत्माको देखता है, वही वास्तवमें देखनेवाला है। सर्वशक्तिमान्, अनन्तात्मा, सम्पूर्ण पदार्थोंमें स्थित, एकमात्र अद्वितीय चेतन परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हैं—ऐसा जो अपने हृदयके भीतर देखता है, वही वास्तवमें देखता है। जो विद्वान् आधि, व्याधि, जन्म, जरा और मृत्युसे युक्त इस देहको अपना स्वरूप नहीं मानता—'मैं देह हूँ', ऐसा नहीं देखता, वही