भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 750 में से

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स्थिति-प्रकरण ] * शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीकी रागरहित स्थितिका वर्णन * २२५


यथार्थदर्शी है । सूतमें गुँथी हुई मणियोंके समान यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही ओतप्रोत है, परंतु मैं मन नहीं हूँ--इस तरह जो देखता है, वही आत्माके यथार्थ स्वरूप-को देखता है । न मैं हूँ न दूसरी ही कोई 'वस्तु है; किंतु एकमात्र निरामय ब्रह्म ही सर्वत्र सब रूपोंमें विराजमान है--इस तरह जो देखता है, वही वास्तवमें देखता है । जिस महात्माके सांसारिक देह आदिके प्रति अपने पराये और तेरे-मेरेके भेद मिट गये हैं, वही सुन्दर दृष्टिसे सम्पन्न महापुरुष आत्माका यथार्थरूपसे अनुभव करता है । जो आकाशकी भाँति एकात्मा है और सम्पूर्ण पदार्थोंमें व्याप्त होता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता, ऐसा वह महात्मा पुरुष साक्षात् महेश्वर ही है । जो तम ( सुषुप्ति ), प्रकाश ( जाग्रत् ) और कलना ( स्वप्न )--इन तीनों अवस्थाओंसे मुक्त हैं, कालका भी परम प्रेमास्पद आत्मा बन गया है तथा जो सौम्य, समदर्शी और अपने आत्मस्वरूपमें स्थित हैं, ऐसे उस परमःम-पदको प्राप्त हुए पुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ । सम्पूर्ण जगत्में एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है--जिसकी बुद्धिमें ऐसा निश्चय हो गया है तथा जिसकी वृत्ति ( ब्रह्माकारदृष्टि ) जगत्‌की सृष्टि, प्रलय और स्थितिरूपिणी विचित्र एवं मनोहर वैभवायुक्‍त कलाओंमें सदा ही एकरस है, उस परम बोधवान् शिवस्वरूप महापुरुषको नमस्कार है । ( सर्ग २२ )

शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीकी रागरहित स्थितिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुकुलनन्दन श्रीराम ! जैसे देवराज इन्द्र अपनी अमरावतीपुरीमें निश्चिन्त होकर राज्य करते हैं, उसी प्रकार विवेकी पुरुष इस देहरूपिणी नगरीमें राज्य करता हुआ सदा निश्चिन्त एवं अपने आत्मामें स्थित रहता है। वह अपने मनरूपी मतवाले घोडेको कामभोगके भयानक गड्ढेकी ओर नहीं जाने देता तथा अपनी प्रज्ञा-रूपिणी पुत्रीको लोभके वशमें होकर नहीं बेचता । अज्ञानरूपी शत्रु राष्ट्र इसके छिद्रको नहीं देख सकता और यह संसाररूपी शत्रुके भयकी जड़ोंको ही काट देता है। तृष्णारूपिणी नदीके प्रवाहके भीतर उठनेवाली बड़ी भारी भँवरमें, जहाँ काम-भोगरूपी दुष्ट ग्राह निवास करते हैं, वह विवेकी पुरुष बहिर्मुख होकर डूबता नहीं । वह मनकी ब्रह्माकारवृत्तिमें आरूढ हो बाहर-भीतर परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको न देखता हुआ सदा समता-शान्तिरूप गङ्गा-यमुनाके संगममें स्नान करता है । जिसपर सम्पूर्ण इन्द्रियरूपी जन-समुदायकी दृष्टि रहती है, उस विषय-सुखके अवलोकनसे पराङ्मुख हो वह ध्यानमें सदा सुखपूर्वक बैठा रहता है । सर्वव्यापक होकर भी इस शरीररूपी नगरीमें स्थित आत्मारूपी पुरुष विश्वकी कल्पनाद्वारा निर्मित विविध भोगोंका प्रारब्धानुसार उपभोग करके अपने स्वरूपभूत परमपुरुषार्थको प्राप्त होता है । समस्त पदार्थोंकी क्रियासे विमुख रहनेवाला वह विवेकी पुरुष व्यवहार-दृष्टिसे कर्म करता हुआ भी परमार्थ-दृष्टिसे कुछ नहीं करता; क्योंकि वह सम्पूर्ण व्यावहारिक कार्योंका कर्तापनके अभिमानसे रहित होकर सम्यक्रूपसे अनुष्ठान करता है । उस शरीर-नगरीमें रहकर हृदय-पुण्डरीकमें आरूढ हो वह सदा शान्तिरूप शीतल शरीरवाली लोकसुन्दरी मैत्रीरूपिणी अपनी प्रियाके साथ नित्य रमण करता है। जैसे चन्द्रमाके अगल-बगलमें चित्तको आह्लादित करनेवाली विशाखा नामक दो ताराएँ स्थित होती हैं, इसी तरह विवेकी पुरुषके दोनों पार्श्वभागोंमें सत्यता और समता नामकी दो कान्ताएँ सम्यक्रूपसे विराजमान होती हैं, जो चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाली हैं। जैसे सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त और समस्त शोभा-सम्पत्तिसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले पूर्णिमाके चन्द्रमा चिरकालतक सम्पूर्ण दिशाओंको अपनी सुधामयी किरणोंसे पूर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जिसके सारे मनोरथ चिरकालके लिये परिपूर्ण हो

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