भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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२२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

गये हैं, जो सर्वात्मभावरूप सम्पत्तिसे सुन्दर दिखायी देता है, वह आत्मकाम तत्त्ववेत्ता पुरुष निरन्तर अपने प्रकाशसे प्रकाशित होता है । चन्द्रमा तो पुनः क्षीण होनेके लिये प्रकाशित होते हैं, परंतु तत्त्वज्ञ फिर क्षीण नहीं होता। वह अखण्ड एकरसभावसे अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित रहनेके लिये प्रकाशित होता है।

जैसे बिना किसी प्रयत्नके स्वतः प्राप्त हुए तथा व्यर्थ पदार्थोंमें मनुष्यकी दृष्टि आसक्तिशून्य होकर ही पड़ती है, उसी प्रकार विवेकी पुरुषकी बुद्धि सांसारिक कार्योंमें भी रागशून्य ही रहती है। इन्द्रियोंको प्रारब्धवश जो न्याययुक्त विषय प्राप्त होते हैं, उनका तो वह कभी निवारण नहीं करता और अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका प्रयत्न भी नहीं करता (प्रारब्धवश जो कुछ मिल जाय, उसीमें संतुष्ट रहता है)। इस प्रकार ज्ञानी अपने आपमें परिपूर्ण रहता है। जैसे मोर-पंखोंके आघात पर्वतको कम्पित नहीं कर सकते, उसी प्रकार ज्ञानीको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिके लिये होनेवाली चिन्ताएँ और प्रतिकूल प्राप्त वस्तुके लिये पश्चात्ताप विचलित नहीं करते। जिसके सारे संदेह निवृत्त हो गये हैं, भोगसम्बन्धी सारी उत्सुकता विनष्ट हो गयी है तथा काल्पनिक शरीर क्षीण हो गया है, वह ज्ञानी पुरुष सम्राट्के समान विराजमान होता है। जैसे अपार अनन्त क्षीरसागर अपने आपमें ही परिपूर्ण है, उसी प्रकार अपरिच्छिन्न आत्मज्ञानी अपने आपमें ही नहीं समाता अर्थात् अपने आपमें ही परिपूर्ण है और आत्मासे आत्मामें ही रमण करता है।

इतने बड़े भूमण्डलमें वे ही पुरुष सौभाग्यशाली, शुद्धचित्त और पुरुषोचित कलाओंके ज्ञानमें गणनीय हैं, जो अपने चित्तसे पराजित नहीं हुए हैं। जिसके हृदय-रूपी बिलमें कुण्डलाकार मनरूपी महान् सर्प सर्वथा शान्त हो गया है, अपने स्वरूपमें पूर्णरूपसे उदित हुए ऐसे उस अत्यन्त निर्मल तत्त्ववेत्ताको मैं प्रणाम करता हूँ।

(सर्ग २३)


मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ, अत्यन्त अज्ञानी और ज्ञानीके लिये उपदेशकी व्यर्थता तथा जगत् और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! (मनसहित) इन्द्रियरूपी छः शत्रु बड़े ही दुर्जय हैं। वे तपन, अवीचि, महारौरव, रौरव, संघात और कालसूत्र—नरकके इन छः बड़े-बड़े साम्राज्योंपर प्रतिष्ठित हैं। पापरूपी मतवाले हाथी इनके वाहन हैं तथा तृष्णारूपी बाण-शलाकाओंसे वे सदा सम्पन्न रहते हैं। वे इतने कृतघ्न हैं कि सबसे पहले अपने आश्रयभूत शरीरका ही नाश करते हैं। उनका महान् कोशागार कुकर्मरूपी धनसे ही भरा हुआ है। अपने इन इन्द्रियरूपी शत्रुओंपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। जिसने विवेकरूपी सूतके जालसे उन इन्द्रिय-रूपी दुष्ट शत्रुओंको बाँध लिया है, उसके अङ्गों (शम, दम, समता, शान्ति आदि) का वे विनाश नहीं करते। जिसने इन्द्रियरूपी भृत्योंको काबूमें कर लिया है तथा मनरूपी शत्रुको पूर्णतया बंदी बना लिया है, उस पुरुषकी विशुद्ध बुद्धि उसी तरह बढ़ती है, जैसे वसन्त ऋतुमें आमकी मञ्जरी। जिसका चित्तरूपी गर्व नष्ट हो गया है और इन्द्रियरूपी शत्रु जिसकी कैदमें आ गये हैं, उस पुरुषकी भोग-वासनाएँ उसी तरह क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमल विनष्ट हो जाते हैं। जबतक एकमात्र परमात्मतत्त्वके दृढ़ अभ्यासद्वारा मनपर विजय नहीं पा ली जाती, तभीतक मध्यरात्रिमें नाचनेवाले वेतालोंकी तरह हृदयमें वासनाएँ उछल-कूद मचाये रहती हैं। मैं समझता हूँ कि विवेकी पुरुषका यही मन विवेकके द्वारा अभीष्ट कार्य करनेसे भृत्य, मन्त्रणाद्वारा उत्तम कार्य करवानेसे मन्त्री और सब ओरसे इन्द्रियोंपर आक्रमण करनेके कारण सामन्त बन जाता है। मनरूपी मन्त्री

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