संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थिति-प्रकरण ] * मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ * २२७
शास्त्रविहित शुभ कर्ममें प्रवृत्त हुए पुरुषको उन निष्काम कर्मोंके करनेके लिये सलाह देता है, जो जन्म-मृत्युरूपी वृक्षोंको काटनेके लिये कुठारके समान हैं तथा भविष्यमें होनेवाले अभ्युदय (निरतिशय आनन्दकी प्राप्ति) के कारण हैं।
किंतु जिसे जगत्की सत्यताका पूर्ण निश्चय है, 'वह अत्यन्त मूढ़ है। उस अत्यन्त मूढ़ पुरुषके प्रति यदि जगत्की असत्यताका प्रतिपादन किया जाय तो यह उपदेश वहाँ शोभा नहीं पाता—उसके मनको अच्छा नहीं लगता। परमात्मतत्त्वके विचारका अभ्यास किये बिना जगत्की सत्यताके अनुभवका अपलाप (निराकरण) नहीं हो सकता। इस संसारमें किसीका भी जो निश्चय अन्तःकरणमें जड जमाकर सुदृढ़ हो गया है, वह शास्त्रोक्त परमार्थतत्त्वका अभ्यास किये बिना कदापि नष्ट नहीं होता। जो अनधिकारी-के प्रति ऐसा उपदेश देता है कि यह जगत् मिथ्या है, केवल ब्रह्म सत्य है, उस पुरुषको उन्मत्तके समान समझकर इस जगत्के उन्मत्त और मूढ़ मनुष्य उसकी पूरी हँसी उड़ाते हैं किंतु जो मदिरा पीकर मतवाला हो गया है, जो मदिरासे दूर रहनेके कारण मदमत्त नहीं हुआ है, उन दोनोंकी कहाँ एकता होती है। जैसे अन्धकार और प्रकाशको समझनेमें, छाया और धूपको पहचाननेमें कोई बाधा नहीं आती, उसी प्रकार ज्ञानी और अज्ञानीके विषयमे भी समझना चाहिये। बोधके विषयमें ज्ञानी और अज्ञानीकी कभी एकता नहीं हो सकती। अज्ञानीको कितने ही यत्नसे क्यों न समझाया जाय, उसे बाहर-भीतर जो संसारकी सत्यताका अनुभव हो रहा है, उसका वह सत्य अधिष्ठान-रूप ब्रह्ममें उसी प्रकार बाध नहीं कर सकता, जैसे शव अपने पैरों चल नहीं सकता। (अध्यस्त वस्तुका बाध किये बिना अधिष्ठान-तत्त्वका बोध नहीं हो सकता; इसलिये उसे बोधका उपदेश देना व्यर्थ है।)
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है—ऐसा उपदेश उस मनुष्यके प्रति देना उचित नहीं, जो अत्यन्त अज्ञानी है; क्योंकि उस अज्ञानीने तप और विद्या आदिके अनुभवसे होनेवाले संस्कारका अभाव होनेके कारण सदा उस लोकप्रसिद्ध देहात्मभावका ही अनुभव किया है। कभी भी असंसारी आत्मभावका उसे अनुभव नहीं हुआ। श्रीराम ! जिसको थोड़ा-थोड़ा ज्ञान है, उस पुरुषके प्रति ही यह उपदेश-वाणी सुशोभित (सफल) होती है। जो पुरुष पूर्ण ज्ञानी है, उसको तो 'मैं हूँ' इस प्रकार अहंकारास्पदरूपसे विचार करनेके लिये कुछ भी नहीं है। (इसलिये वह भी उपदेश देनेके योग्य नहीं है। तात्पर्य यह कि जो न तो अत्यन्त अज्ञानी है और न पूर्ण ज्ञानी ही, वही जिज्ञासु इस उपदेशका अधिकारी है।) जो शुद्ध बुद्धिसे युक्त ज्ञानी पुरुष निरन्तर यह अनुभव करता है कि यह सब कुछ शान्त परब्रह्म ही है, उसके इस अनुभवका बाध कैसे हो सकता है। आत्मामें परब्रह्मके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, सोनेमें अँगूठी आदिकी तरह आत्मामें अन्य किसीकी प्रातीतिक सत्ता भी नहीं है। मूढ़ पुरुष मिथ्या अहंकारमय है और सुन्दर बुद्धिसे युक्त ज्ञानी एकमात्र सत्य आत्मस्वरूप है। इन दोनोंके स्वभावके अन्तरका निराकरण कहीं नहीं हो सकता है। जो सर्वत्र व्याप्त, शान्त, शुद्ध, चेतन, आकाशवत् निर्विकार, निर्मल तथा उत्पत्ति-विनाशसे रहित है, वह ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही परमार्थ सत्य है। जिसके नेत्र तिमिर-रोगसे पीडित हैं, उसकी स्वाभाविक दृष्टियाँ ही आकाशमें केशोंके वर्तुलाकार गोलोंकी तरह प्रतीत होती हैं। उसी तरह चिन्मय परमात्मामे ये सृष्टियाँ प्रतिभासित होती हैं। वह चिदाकाशस्वरूप सत्यात्मा अपने आपको जैसा समझता है क्षणभरमें वैसा ही अनुभव करने लगता है। उसके दृष्टिबलसे असत्य वस्तु भी क्षणभरमें सत्य-सी प्रतीत होने लगती है।