संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
२२० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
अपने-अपने स्वभाव ( अनादि अज्ञान ) के भीतर स्थित चित्त ही प्रत्येक जीवमें इदमित्थं रूपसे प्रतीत होनेवाला यह जगत् है । इस प्रकार प्रतीतिमात्र जगत्को असत्य समझनेवाला चित्त स्वयं ही नष्ट हो जाता है; क्योंकि प्रतीतिकालमें ही इस जगत्की सत्ता है। परमार्थ वस्तु ( अधिष्ठानरूप ब्रह्म )-का साक्षात्कार होनेपर उसकी सत्ता नहीं रहती । चित्तकी सत्ता ही जगत् है और जगत्की सत्ता ही चित्त है । एकके अभावसे दोनोंका अभाव हो जाता है । यह इन दोनोंका अभाव सत्यस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्म-विषयक विचार करनेसे ही सम्भव है। जैसे मलिन मणिको युक्तिसे साफ करनेपर उससे शुद्ध प्रकाश प्रकट होता है, उसी तरह शुद्ध चित्तका अनुभव सत्य होता है । चिरकालतक एक परमात्माके चिन्तनरूप दृढ़ अभ्याससे चित्तकी शुद्धि होती है। जो संकल्पोंसे आक्रान्त नहीं है, ऐसे चित्तसे ज्ञानका उदय होता है । जैसे मलिन वस्त्रमें सुन्दर रंग नहीं टिकता, उसी तरह वासनासे मलिन चित्तमें ब्रह्माकाररूप एक दृष्टि स्थिर नहीं होती । वासनासे रहित होना ही चित्तकी शुद्धि है, जगत्के ज्ञानसे शून्य और एक ब्रह्माकार होना ही उसका वासनासे रहित होना है। चित्तकी शुद्धि होनेसे पुरुष शीघ्र ही प्रबुद्ध ( ज्ञान-सम्पन्न ) हो जाता है । चित्तका चिन्मय परमात्मारूपमें लय हो जाना ही उसकी वास्तविक शुद्धि है । इस शुद्धिका लाभ होते ही प्रबुद्ध पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है । ( सर्ग १–१७ )
स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेदभ्रमकी अनुभूति, चित्तशुद्धि एवं जाग्रत् आदि अवस्थाओंके शोधनसे ही भ्रम-निवारणपूर्वक आत्मबोधकी प्राप्ति तथा वैराग्यमूलक विवेकसे ही मोक्ष-लाभका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस प्राणीका जिस तरहके कर्मोंका भोगानुकूल फल जहाँ जैसे रहता है, वहाँ उतना ही वह अनुभव करता है, उससे अतिरिक्त नहीं । एक व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान जो मनोराज्य है, उसे देखने या भोगने आदिमें दूसरे व्यक्तिका मन सफल नहीं होता । यह जो असफलताको प्राप्त हुई मनकी स्थिति है, वही उसके विच्छेद यानी नानात्वमें हेतु है—यों जानना चाहिये । उस मनके भेदसे ही जीवोंके भी भेद होते हैं अर्थात् जैसे भिन्न-भिन्न मन हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न जीव भी हैं । जैसे सुवर्ण अपने ज्ञानके अभावसे कड़े-कंगन आदिके रूपको प्राप्त होता है, उसी प्रकार जिसे अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है, उस चेतनने स्थूल देहको स्वीकार करके संसाररूपिणी अविद्याका मिथ्या ही अनुभव किया है ।
सम्पूर्ण जीव-समूहोंका आत्मा स्वयं ही अपने संकल्पसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन अवस्थाओंको प्राप्त हुआ है । इन अवस्थाओंमें शरीर कारण नहीं है । इस प्रकार जाग्रत् आदि तीन अवस्थारूप आत्मामें ही जीवत्व है अर्थात् वह आत्मा ही जीवरूपसे स्फुरित हो रहा है; इसमें शरीरत्वका विकास नहीं है । तात्पर्य यह कि जैसे जल ही लहर एवं भँवर आदिके रूपमें विख्यात होता है—यह तात्त्विक दृष्टि प्राप्त होनेपर जलमें उससे पृथक् लहर आदिकी सत्ता नहीं रहती, उसी प्रकार जीवात्मा ही जाग्रत् आदि अवस्थारूप है—यह विचार दृढ़ होते ही जीवसे पृथक् देहकी वास्तविक सत्ता शेष नहीं रह जाती ।
इसी प्रकार तत्त्वज्ञ पुरुष सुषुप्ति-अवस्थाके अवसानभूत तुरीय पदरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मपदको ज्ञानद्वारा प्राप्त करके संसारसे निवृत्त हो जाता है; परंतु जो मूढ़ जीव है, वही सृष्टिमें प्रवृत्त होता है । ज्ञानी और अज्ञानी दोनोंकी सुषुप्ति एकरूप ही है; क्योंकि अज्ञको भी सुषुप्तावस्थामें सुखकी प्राप्ति होती है । किंतु अज्ञानी जीव तो सुषुप्तावस्थामें पहुँचकर भी असम्बुद्ध ( वास्तविक आत्मज्ञानसे रहित और देहात्मभावकी भ्रान्ति-वासनासे वासित ) होनेके कारण सृष्टिको प्राप्त होता है, परंतु
स्थिति-प्रकरण ] * स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेदभ्रमकी अनुभूति तथा विवेकसे ही मोक्षलाभका वर्णन * २२१
ज्ञानी नहीं। परब्रह्म परमात्मा निर्विशेष होनेके कारण अभाव नहीं कहा जा सकता। निर्विकार, अद्वितीय और असङ्ग होनेके कारण जो वास्तवमें किसीका कारण नहीं है, तथापि सम्पूर्ण प्रपञ्चके आरोपका अधिष्ठानरूपसे आदिकारण है, उस निर्विशेष परब्रह्म परमात्मामें वस्तुतः कारण एवं निमित्त आदि वस्तुकी भी सम्भावना नहीं है। (अतः ब्रह्ममें बिना किसी कारणके ही प्रतीत होनेवाला यह जगत् मिथ्या ही है।)
सार वस्तु (ब्रह्म)-का ही विचार करना उचित है। असार वस्तु (दृश्य संसार)-के विचारसे क्या लाभ। बीज अपने स्वरूपका त्याग करके अङ्कुर आदिके क्रमसे फलरूपमें परिणत होता देखा जाता है, परंतु ब्रह्म वैसा नहीं है। वह अपने स्वरूपका त्याग किये बिना ही जगत्रूप अध्यारोपका अधिष्ठानरूपसे कारण होता है, बीजका अवयव आदि सब कुछ साकार है। अतः उससे निराकार परम पदरूप ब्रह्मकी तुलना करना उचित नहीं। इसलिये कल्याणस्वरूप ब्रह्मके लिये कोई उपमा सम्मत ही नहीं हो सकती। अपनेको दृश्यरूपमें देखनेवाला द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप आत्माको नहीं देख सकता (इसलिये उसे अनर्थकी प्राप्ति होती है)। जिसकी बुद्धि प्रपञ्चसे आक्रान्त हो, ऐसे किसी पुरुषको अपनी यथार्थ स्थितिका ज्ञान नहीं होता।
जबतक भ्रान्तिसे मृगतृष्णामें जलकी प्रतीति हो रही है, तबतक किसीकी समझदारी किस कामकी; और जब यह ज्ञान हो गया कि यहाँ जल नहीं है, तब वहाँ मृगतृष्णा ही क्या रह गयी। जैसे नेत्र बहिर्मुख होनेके कारण अपने-आपको नहीं देख पाता, उसी प्रकार आकाशकी भाँति निर्मल होता हुआ भी द्रष्टा बहिर्मुख होनेके कारण अपने स्वरूपका साक्षात्कार नहीं कर सकता। यह भ्रमकी प्रबलता कैसी आश्चर्यजनक है ! यदि दृश्य-प्रपञ्चको दृश्यरूपसे ही सच्चा समझा जाय तो आकाशके समान निर्मल ब्रह्म यत्न करनेपर भी नहीं मिल सकता; फिर तो उसकी प्राप्ति बहुत दूर हो जाती है। श्रीराम ! इसीलिये उसको दृश्य ही दिखायी देता है, द्रष्टाका दर्शन नहीं होता। वास्तवमें एकमात्र द्रष्टा ही सर्वत्र स्थित है, दृश्य नामकी कोई वस्तु यहाँ है ही नहीं (जो कुछ दिखायी देता है, वह केवल भ्रम है)। जब द्रष्टा और दृश्यमें कोई अन्तर ही नहीं रहा, तब कौन द्रष्टा और कैसा दृश्य, क्योंकि वह द्रष्टा ही दृश्यरूपमें प्रकट होता है।
जब चित्त सिद्धिको प्राप्त होता है, तब जीव जड-संसर्गसे मुक्त हो केवल शुद्ध चिन्मय आत्मस्वरूपसे स्थित होता है। वह चेतन आत्मा शुद्ध एवं सर्वव्यापी है; चेतन आत्मा जहाँ जिस वस्तुकी भावना करता है, वहाँ वह तत्काल प्रकट हो जाती है। उसने स्वप्नमें भी जो कुछ देखा है, वह स्वप्नके समयमें सत्य ही है। जैसे बीजके अंदर सूक्ष्मरूपसे पत्ते, लता, फूल और फलरूप अणु रहते हैं, उसी प्रकार चेतनरूप अणुके भीतर समस्त सूक्ष्म अनुभव विद्यमान हैं। जिस पुरुषके भीतर यह विचार नहीं उठता कि मैं कौन हूँ और यह जगत् क्या है, वह संसारके बन्धनसे मुक्त नहीं हुआ। जिस विशुद्ध बुद्धिवाले पुरुषकी भोगलिप्सा प्रतिदिन क्षीण होती जाती है, उस वैराग्यवान्का ही विवेकयुक्त विचार सफल होता है। जैसे शरीरके द्वारा पथ्य-भोजन आदि नियमोंके साथ सेवन किया हुआ औषध ही आरोग्य प्रदान करता है, उसी प्रकार जितेन्द्रियताका अभ्यास हो जानेपर ही विवेक सफल होता है। चित्रमें अङ्कित प्रज्वलित अग्निकी भाँति जिसका विवेक केवल कथनमात्र ही है, कार्यमें परिणत नहीं हुआ है, उसने अविवेकका त्याग नहीं किया है; अतः वह अविवेक उसे दुःख ही देनेवाला होगा। जैसे स्पर्शसे ही वायुकी सत्ताका भान होता है, कथनमात्रसे नहीं, उसी प्रकार भोगेच्छाके क्षीण होनेसे ही पुरुषका विवेक जाग्रत् होता है। चित्रलिखित अमृत अमृत नहीं है, चित्रलिखित अग्नि अग्नि नहीं है, चित्रलिखित नारी
२२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निश्चय ही नारी नहीं है; उसी तरह कथनमात्रका विवेक विवेक नहीं है, वास्तवमें अविवेक ही है। विवेकसे पहले राग और द्वेषका समूल नाश हो जाता है। तत्पश्चात् विषयभोगोंके लिये प्रयत्न सर्वथा क्षीण हो जाता है। जिस पुरुषमें विवेक जाग्रत् है, वही परम पवित्र है।
(सर्ग १८-१९)
उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन, मनको सत्य आत्मामें लगानेका आदेश, मनको भावनाके अनुसार रूप और फलकी प्राप्ति तथा भावनाके त्यागसे विचारद्वारा ब्रह्मभावकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! वे जीव अपनी सिद्धिके लिये जैसे-जैसे प्रयत्न करते हैं, उन विविध उपासनाओंके रूपसे वे शीघ्र वैसे-ही-वैसे हो जाते हैं। देवताओंकी पूजा करनेवाले देवताओंको, यक्षोंकी आराधना करनेवाले यक्षोंको और ब्रह्मके उपासक ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। इनमें जो सर्वोत्तम है, उसी परमात्मारूप इष्टदेवका आश्रय लेना चाहिये।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप मुझे जाग्रत् तथा स्वप्न-अवस्थाओंका भेद बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी प्रतीति स्थिर हो, उसे जाग्रत् कहते हैं और जिसकी प्रतीति स्थिर नहीं होती, उसे स्वप्न कहा गया है। यदि स्वप्न भी कालान्तरमें स्थित हो तो प्रत्यक्ष अनुभवके आधारपर उसे जाग्रत्की श्रेणीमें ही देखा जायगा; और यदि जाग्रत् भी कालान्तरमें स्थित नहीं है तो वह स्वप्न ही है। इस प्रकार जाग्रत् स्वप्नभावको और स्वप्न जाग्रत्-भावको प्राप्त होता है। स्वप्न भी स्वप्नकालमें स्थिर होनेके कारण जाग्रत्-भावको प्राप्त होता है और जाग्रत्के मनोरथ भी जाग्रत्कालमें अस्थिर होनेसे स्वप्न ही हैं; क्योंकि वैसा ही बोध होता है।
रघुनन्दन ! मैंने तुमसे यह जो कुछ कहा है—जाग्रत् आदि अवस्थाओंका वर्णन किया है, वह सब मनके स्वरूपका निरूपणमात्र है। और किसी हेतु या प्रयोजनसे यह सब नहीं कहा गया है। जैसे अग्निके सम्पर्कमें आनेसे लोहेका गोला आग बन जाता है, उसी प्रकार दृढ़ निश्चयसे युक्त चित्त जिस वस्तुकी बारंबार भावना करता है, उसीके आकारको प्राप्त हो जाता है। भाव, अभाव, ग्रहण और त्याग आदि सारी प्रतीतियाँ चेतनमें मनके द्वारा कल्पित हैं। ये प्रतीत होती हैं, इसलिये तो ये असत्य नहीं हैं और वास्तवमें ये हैं नहीं, इसलिये सत्य नहीं हैं। चित्तकी चपलतासे ही इनका निर्माण हुआ है। मन मोहका जनक और जगत्की स्थितिका कारण है। मलिन मन ही व्यष्टि और समष्टिरूपसे इस जगत्की कल्पना करता है। संसारकी सारी विभूतियाँ एकमात्र मनको जीतनेसे ही प्राप्त होती हैं। चित्त जिसकी भावनामें तन्मय होता है, उसे निस्सन्देह प्राप्त कर लेता है। सौभाग्यशाली श्रीराम ! मनके द्वारा अभिलषित देश या विषयको शरीर प्राप्त होता है। परंतु शरीरके द्वारा आचरित देश या विषयको मन नियमतः प्राप्त नहीं होता।
जैसे सुगन्धित पुष्पके भीतर स्थित हुई वायु उसकी घनीभूत सुगन्धको प्राप्त कर लेती है, उसी प्रकार मननसे चञ्चल हुआ मन जिस-जिस वस्तुकी भावना करता है अथवा जिस-जिस वासनासे युक्त भावको अपनाता है, उसीके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। श्रीराम ! जैसे गन्धके भीतर स्थित हुई वायु गन्धरूपताको प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार मन जिस भावसे युक्त होता है, उसके बाद उसका वशवर्ती शरीर भी उसीके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। ज्ञानेन्द्रियोंके अपने-अपने विषयमें
स्थिति-प्रकरण ] * उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन *
प्रवृत्त होनेपर उनसे कर्मेन्द्रियरूप स्वतः ही इस तरह स्फुरित होता है, जैसे धूलमिश्रित वायुमें पृथ्वी अपने-आप धूलिकणोंके रूपमें स्फुरित होती है । कर्मेन्द्रियाँ क्षुब्ध होकर जब अपनी क्रियाशक्तिको प्रकट करती हैं, तब वायुमें धूल-समूहकी भाँति मनमें प्रचुर कर्म सम्पादित होता है । इस प्रकार मनसे कर्मकी उत्पत्ति हुई है और मनकी उत्पत्तिमें भी कर्मको ही बीज (कारण) बताया गया है । फल और सुगन्धकी भाँति इन दोनोंकी सत्ता एक दूसरेसे भिन्न नहीं है । दृढ़ अभ्यासके कारण मन जैसे भावको ग्रहण करता है, वैसे ही स्पन्द और कर्म नामकी शाखाओंको वह प्रकट करता है तथा उसी तरहकी क्रियारूप उसके फलको बड़े आदरसे उत्पन्न करता है । तदनन्तर उसीके स्वादका अनुभव करके शीघ्र बन्धनमें पड़ता है । मन जिस-जिस भावको अपनाता है, उसी-उसीको वस्तुरूपमें पाता है । वही श्रेय है, दूसरा नहीं—ऐसा उसका निश्चय हो जाता है । अपनी-अपनी प्रतीतिके द्वारा ही दृढ़तापूर्वक भिन्नताको प्राप्त हुए (मनुष्योंके) मन सदा ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये प्रयत्न करते हैं ।
जो अकृत्रिम अर्थात् नित्य-सिद्ध विज्ञान-आनन्दघन परमात्मा हैं, उनके लिये प्रयत्न करनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे अपने मनको तन्मय बना दें, जिससे उसकी प्राप्ति हो सके । यह दृश्य माया है, अविद्या है और भय देनेवाली भावना है । मनकी जो दृश्यमयता है, विद्वान्लोग उसीको (बन्धनमें डालनेवाला) कर्म कहते हैं । स्वभावमें स्थित जो यह दृश्य-तन्मयता अनुभवमें आती है, वही विद्वानोंद्वारा मदिराके समान संसारको उन्मत्त बना देनेवाली अविद्या कही जाती है । जैसे पटलनामक रोगसे अंधा हुआ पुरुष सूर्यके दीप्तिमान् प्रकाशको नहीं देखता, उसी प्रकार इस अविद्यासे
वह अविद्या संकल्पसे स्वयं उत्पन्न होती है । भ भावनाके संकल्पको त्याग देनेमात्रसे जब वह जाती है, उस समय रसस्वरूप आनन्दमय पर ध्यानके अभ्यासकी दृढ़तासे सुशोभित श्रवण म विचारके द्वारा सब पदार्थोंमें अनासक्ति स्थिर हो है । फिर सम्यग्दृष्टिके प्राप्त होनेपर असत्य दृष्टिका हो जाता है और वह निर्मल-स्वभाव, निर्विकल्प सच्चिदानन्द परमात्मा प्राप्त हो जाता है, जो न न असत् है न सुखी है न दुखी है तथा कैक्यभाव अपने हृदयमें अनुभवसे ही प्राप्त हो जैसे यह रस्सी है या सर्प है—ऐसा सन्देह रस्सीमें सर्पभाव आरोपित होता है, उसी प्रकार रहित चिन्मय आकाशस्वरूप जीवात्माने अपनेमें बन्धनकी कल्पना कर रखी है । जैसे एक ही रात और दिनकी कल्पनासे रातमें और तरहका देता है और दिनमें अन्य प्रकारका, उसी तरह वस्तु ब्रह्म बारंबार उस प्रतिकूल कल्पनाद्वारा प्रकारका भासित होता है और अपने स्वरूपसे दूसरा ही रूप धारण कर लेता है । जो तुच्छ आभास-रहित है, उपाधिशून्य है, जिसमें ब नहीं है तथा जो नाना प्रकारकी कल्पनाओं वह परब्रह्म परमात्मा ही परम सुखस्वरूप होने सुख दे सकता है । जीवकी अपनी कल्पनासे अभाव, शुभ और अशुभ क्षणभरमें उत्पन्न हो और क्षणभरमें मिट जाते हैं । समस्त पद भावके अनुसार ही फल देनेवाले हैं, यह जान पुरुष इस परिवर्तनशील जगत्के पदार्थोंके विष एक निश्चित रूपका प्रतिपादन नहीं कर दृढ़ भावनाके द्वारा जिस पदार्थके विषयमें जब निश्चित धारणा बनाये रखता है, तबतक व ही परिणामको वह देखता या अनुभव क ... । वह प्रत्यक्ष बाह्य हो है अथवा
२२४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अभिन्न है, ऐसा अपने मनमें निश्चय करके तुम अपनी बुद्धिके द्वारा उस अनादि अनन्त परमात्माका अपने आपमें ही अनुभव करो—मैं ही वह परब्रह्म परमात्मा हूँ, ऐसा अनुभव करो। (सर्ग २०-२१)
दृढ़ बोध होनेपर सम्पूर्ण दोषोंके विनाश, अन्तःकरणकी शुद्धि और विशुद्ध आत्मतत्त्व-के साक्षात्कारकी महिमाका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो नित्यानित्य वस्तुके विवेकसे सम्पन्न है, जिसके चित्तकी वृत्तियाँ परमात्मामें विलीन होती जा रही हैं, जो ज्ञान प्राप्त करके संकल्पोंका त्याग कर रहा है, जिसका मन परमात्माके स्वरूपमें परिणत हो गया है, जो इस हेय नाशवान् जड दृश्यका परित्याग कर रहा है तथा उपादेय सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका ध्यान कर रहा है, अर्थात् जो द्रष्टा परमात्माका अनुभव करता है तथा अद्रष्टारूप दृश्य-का अनुभव नहीं करता, जागरणके योग्य परम तत्त्वमें ही जाग रहा है और घनीभूत अज्ञानके विकाररूप संसारसे सोया हुआ है, जो सम्पूर्ण तुच्छ सुखोंसे लेकर हिरण्यगर्भ ब्रह्मतकके सुखोंमें अत्यन्त वैराग्यके कारण सरस और नीरस आपातरमणीय भोगोंमें आसक्त न होकर उनकी ओरसे पूर्णतया विरक्त है, जिसके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं है-ऐसे अधिकारी पुरुषका अनादि जडता (अज्ञान)-रूपी आकाश आसक्तिशून्य हो जब परमात्मारूपी जलके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है और धूपमें बर्फकी भाँति पूर्णतया विगलित हो जाता है। वर्षाकाल बीत जानेपर जैसे तरङ्गयुक्त जलसे चञ्चल मध्यभागवाली लहराती हुई नदियाँ धीरे-धीरे सूखने लगती हैं, उसी प्रकार जब विषयरूपी तरङ्गोंसे युक्त तृष्णाएँ शान्त हो जाती हैं तथा जैसे चूहे चिड़ियोंके जाल काट देते हैं, उसी प्रकार जब तीव्र वैराग्यसे संसार-वासना-रूपी जाल टूट जाता है और हृदयकी गाँठें ढीली पड़ जाती हैं, तब जैसे निर्मलीको पीसकर जलमें डालनेसे जल स्वच्छ हो जाता है, उसी तरह विज्ञानके प्रभावसे अन्तःकरण विशुद्ध होकर प्रसन्न हो जाता है। जैसे वायुके शान्त होनेपर समुद्रमें (निश्चलता) रूप समता आ जाती है, उसी प्रकार मनके शान्त होनेपर सब जगह सर्वोत्तम शान्ति पैदा करनेवाली अज्ञानरूपी मलसे रहित उन्नत समदर्शिताका उदय होता है। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ—जिसने जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वको जान लिया है, वह परम बुद्धिमान् पुरुष वायु आदि चारों भूतोंसे रहित आकाशकोशके समान न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है।
मैं कौन हूँ, यह दृश्य जगत् कैसे हुआ ?—इन सब बातोंका जबतक विवेकपूर्वक विचार नहीं किया जाता, तभीतक यह अन्धकारके समान संसारका आडम्बर खड़ा है। मिथ्या भ्रमसमूहसे उत्पन्न यह शरीर आपत्तियों-का घर है। जो आत्मभावनाके द्वारा इस दृश्यको नहीं देखता अर्थात् जो यह दृश्य नहीं है, सब कुछ आत्मा ही है—ऐसा देखता है, वही यथार्थरूपसे देखनेवाला है। जो देश और कालवश शरीरमें उत्पन्न हुए सुख-दुःखोंको भ्रमरहित दृष्टिसे 'ये मेरे नहीं हैं' इस तरह देखता है, वही यथार्थ द्रष्टा है। जो असीम आकाश, दिशा और काल आदि हैं तथा उनमें वर्तमान जो परिच्छिन्न क्रियाओंसे युक्त वस्तु है, वह सब 'मैं ही हूँ'—इस प्रकार जो सबमें अपने आत्माको देखता है, वही वास्तवमें देखनेवाला है। सर्वशक्तिमान्, अनन्तात्मा, सम्पूर्ण पदार्थोंमें स्थित, एकमात्र अद्वितीय चेतन परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हैं—ऐसा जो अपने हृदयके भीतर देखता है, वही वास्तवमें देखता है। जो विद्वान् आधि, व्याधि, जन्म, जरा और मृत्युसे युक्त इस देहको अपना स्वरूप नहीं मानता—'मैं देह हूँ', ऐसा नहीं देखता, वही
स्थिति-प्रकरण ] * शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीकी रागरहित स्थितिका वर्णन * २२५
यथार्थदर्शी है । सूतमें गुँथी हुई मणियोंके समान यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही ओतप्रोत है, परंतु मैं मन नहीं हूँ--इस तरह जो देखता है, वही आत्माके यथार्थ स्वरूप-को देखता है । न मैं हूँ न दूसरी ही कोई 'वस्तु है; किंतु एकमात्र निरामय ब्रह्म ही सर्वत्र सब रूपोंमें विराजमान है--इस तरह जो देखता है, वही वास्तवमें देखता है । जिस महात्माके सांसारिक देह आदिके प्रति अपने पराये और तेरे-मेरेके भेद मिट गये हैं, वही सुन्दर दृष्टिसे सम्पन्न महापुरुष आत्माका यथार्थरूपसे अनुभव करता है । जो आकाशकी भाँति एकात्मा है और सम्पूर्ण पदार्थोंमें व्याप्त होता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता, ऐसा वह महात्मा पुरुष साक्षात् महेश्वर ही है । जो तम ( सुषुप्ति ), प्रकाश ( जाग्रत् ) और कलना ( स्वप्न )--इन तीनों अवस्थाओंसे मुक्त हैं, कालका भी परम प्रेमास्पद आत्मा बन गया है तथा जो सौम्य, समदर्शी और अपने आत्मस्वरूपमें स्थित हैं, ऐसे उस परमःम-पदको प्राप्त हुए पुरुषको मैं नमस्कार करता हूँ । सम्पूर्ण जगत्में एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है--जिसकी बुद्धिमें ऐसा निश्चय हो गया है तथा जिसकी वृत्ति ( ब्रह्माकारदृष्टि ) जगत्की सृष्टि, प्रलय और स्थितिरूपिणी विचित्र एवं मनोहर वैभवायुक्त कलाओंमें सदा ही एकरस है, उस परम बोधवान् शिवस्वरूप महापुरुषको नमस्कार है । ( सर्ग २२ )
शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीकी रागरहित स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुकुलनन्दन श्रीराम ! जैसे देवराज इन्द्र अपनी अमरावतीपुरीमें निश्चिन्त होकर राज्य करते हैं, उसी प्रकार विवेकी पुरुष इस देहरूपिणी नगरीमें राज्य करता हुआ सदा निश्चिन्त एवं अपने आत्मामें स्थित रहता है। वह अपने मनरूपी मतवाले घोडेको कामभोगके भयानक गड्ढेकी ओर नहीं जाने देता तथा अपनी प्रज्ञा-रूपिणी पुत्रीको लोभके वशमें होकर नहीं बेचता । अज्ञानरूपी शत्रु राष्ट्र इसके छिद्रको नहीं देख सकता और यह संसाररूपी शत्रुके भयकी जड़ोंको ही काट देता है। तृष्णारूपिणी नदीके प्रवाहके भीतर उठनेवाली बड़ी भारी भँवरमें, जहाँ काम-भोगरूपी दुष्ट ग्राह निवास करते हैं, वह विवेकी पुरुष बहिर्मुख होकर डूबता नहीं । वह मनकी ब्रह्माकारवृत्तिमें आरूढ हो बाहर-भीतर परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको न देखता हुआ सदा समता-शान्तिरूप गङ्गा-यमुनाके संगममें स्नान करता है । जिसपर सम्पूर्ण इन्द्रियरूपी जन-समुदायकी दृष्टि रहती है, उस विषय-सुखके अवलोकनसे पराङ्मुख हो वह ध्यानमें सदा सुखपूर्वक बैठा रहता है । सर्वव्यापक होकर भी इस शरीररूपी नगरीमें स्थित आत्मारूपी पुरुष विश्वकी कल्पनाद्वारा निर्मित विविध भोगोंका प्रारब्धानुसार उपभोग करके अपने स्वरूपभूत परमपुरुषार्थको प्राप्त होता है । समस्त पदार्थोंकी क्रियासे विमुख रहनेवाला वह विवेकी पुरुष व्यवहार-दृष्टिसे कर्म करता हुआ भी परमार्थ-दृष्टिसे कुछ नहीं करता; क्योंकि वह सम्पूर्ण व्यावहारिक कार्योंका कर्तापनके अभिमानसे रहित होकर सम्यक्रूपसे अनुष्ठान करता है । उस शरीर-नगरीमें रहकर हृदय-पुण्डरीकमें आरूढ हो वह सदा शान्तिरूप शीतल शरीरवाली लोकसुन्दरी मैत्रीरूपिणी अपनी प्रियाके साथ नित्य रमण करता है। जैसे चन्द्रमाके अगल-बगलमें चित्तको आह्लादित करनेवाली विशाखा नामक दो ताराएँ स्थित होती हैं, इसी तरह विवेकी पुरुषके दोनों पार्श्वभागोंमें सत्यता और समता नामकी दो कान्ताएँ सम्यक्रूपसे विराजमान होती हैं, जो चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाली हैं। जैसे सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त और समस्त शोभा-सम्पत्तिसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले पूर्णिमाके चन्द्रमा चिरकालतक सम्पूर्ण दिशाओंको अपनी सुधामयी किरणोंसे पूर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जिसके सारे मनोरथ चिरकालके लिये परिपूर्ण हो
२२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
गये हैं, जो सर्वात्मभावरूप सम्पत्तिसे सुन्दर दिखायी देता है, वह आत्मकाम तत्त्ववेत्ता पुरुष निरन्तर अपने प्रकाशसे प्रकाशित होता है । चन्द्रमा तो पुनः क्षीण होनेके लिये प्रकाशित होते हैं, परंतु तत्त्वज्ञ फिर क्षीण नहीं होता। वह अखण्ड एकरसभावसे अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित रहनेके लिये प्रकाशित होता है।
जैसे बिना किसी प्रयत्नके स्वतः प्राप्त हुए तथा व्यर्थ पदार्थोंमें मनुष्यकी दृष्टि आसक्तिशून्य होकर ही पड़ती है, उसी प्रकार विवेकी पुरुषकी बुद्धि सांसारिक कार्योंमें भी रागशून्य ही रहती है। इन्द्रियोंको प्रारब्धवश जो न्याययुक्त विषय प्राप्त होते हैं, उनका तो वह कभी निवारण नहीं करता और अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका प्रयत्न भी नहीं करता (प्रारब्धवश जो कुछ मिल जाय, उसीमें संतुष्ट रहता है)। इस प्रकार ज्ञानी अपने आपमें परिपूर्ण रहता है। जैसे मोर-पंखोंके आघात पर्वतको कम्पित नहीं कर सकते, उसी प्रकार ज्ञानीको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिके लिये होनेवाली चिन्ताएँ और प्रतिकूल प्राप्त वस्तुके लिये पश्चात्ताप विचलित नहीं करते। जिसके सारे संदेह निवृत्त हो गये हैं, भोगसम्बन्धी सारी उत्सुकता विनष्ट हो गयी है तथा काल्पनिक शरीर क्षीण हो गया है, वह ज्ञानी पुरुष सम्राट्के समान विराजमान होता है। जैसे अपार अनन्त क्षीरसागर अपने आपमें ही परिपूर्ण है, उसी प्रकार अपरिच्छिन्न आत्मज्ञानी अपने आपमें ही नहीं समाता अर्थात् अपने आपमें ही परिपूर्ण है और आत्मासे आत्मामें ही रमण करता है।
इतने बड़े भूमण्डलमें वे ही पुरुष सौभाग्यशाली, शुद्धचित्त और पुरुषोचित कलाओंके ज्ञानमें गणनीय हैं, जो अपने चित्तसे पराजित नहीं हुए हैं। जिसके हृदय-रूपी बिलमें कुण्डलाकार मनरूपी महान् सर्प सर्वथा शान्त हो गया है, अपने स्वरूपमें पूर्णरूपसे उदित हुए ऐसे उस अत्यन्त निर्मल तत्त्ववेत्ताको मैं प्रणाम करता हूँ।
(सर्ग २३)
मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ, अत्यन्त अज्ञानी और ज्ञानीके लिये उपदेशकी व्यर्थता तथा जगत् और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! (मनसहित) इन्द्रियरूपी छः शत्रु बड़े ही दुर्जय हैं। वे तपन, अवीचि, महारौरव, रौरव, संघात और कालसूत्र—नरकके इन छः बड़े-बड़े साम्राज्योंपर प्रतिष्ठित हैं। पापरूपी मतवाले हाथी इनके वाहन हैं तथा तृष्णारूपी बाण-शलाकाओंसे वे सदा सम्पन्न रहते हैं। वे इतने कृतघ्न हैं कि सबसे पहले अपने आश्रयभूत शरीरका ही नाश करते हैं। उनका महान् कोशागार कुकर्मरूपी धनसे ही भरा हुआ है। अपने इन इन्द्रियरूपी शत्रुओंपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। जिसने विवेकरूपी सूतके जालसे उन इन्द्रिय-रूपी दुष्ट शत्रुओंको बाँध लिया है, उसके अङ्गों (शम, दम, समता, शान्ति आदि) का वे विनाश नहीं करते। जिसने इन्द्रियरूपी भृत्योंको काबूमें कर लिया है तथा मनरूपी शत्रुको पूर्णतया बंदी बना लिया है, उस पुरुषकी विशुद्ध बुद्धि उसी तरह बढ़ती है, जैसे वसन्त ऋतुमें आमकी मञ्जरी। जिसका चित्तरूपी गर्व नष्ट हो गया है और इन्द्रियरूपी शत्रु जिसकी कैदमें आ गये हैं, उस पुरुषकी भोग-वासनाएँ उसी तरह क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमल विनष्ट हो जाते हैं। जबतक एकमात्र परमात्मतत्त्वके दृढ़ अभ्यासद्वारा मनपर विजय नहीं पा ली जाती, तभीतक मध्यरात्रिमें नाचनेवाले वेतालोंकी तरह हृदयमें वासनाएँ उछल-कूद मचाये रहती हैं। मैं समझता हूँ कि विवेकी पुरुषका यही मन विवेकके द्वारा अभीष्ट कार्य करनेसे भृत्य, मन्त्रणाद्वारा उत्तम कार्य करवानेसे मन्त्री और सब ओरसे इन्द्रियोंपर आक्रमण करनेके कारण सामन्त बन जाता है। मनरूपी मन्त्री
स्थिति-प्रकरण ] * मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ * २२७
शास्त्रविहित शुभ कर्ममें प्रवृत्त हुए पुरुषको उन निष्काम कर्मोंके करनेके लिये सलाह देता है, जो जन्म-मृत्युरूपी वृक्षोंको काटनेके लिये कुठारके समान हैं तथा भविष्यमें होनेवाले अभ्युदय (निरतिशय आनन्दकी प्राप्ति) के कारण हैं।
किंतु जिसे जगत्की सत्यताका पूर्ण निश्चय है, 'वह अत्यन्त मूढ़ है। उस अत्यन्त मूढ़ पुरुषके प्रति यदि जगत्की असत्यताका प्रतिपादन किया जाय तो यह उपदेश वहाँ शोभा नहीं पाता—उसके मनको अच्छा नहीं लगता। परमात्मतत्त्वके विचारका अभ्यास किये बिना जगत्की सत्यताके अनुभवका अपलाप (निराकरण) नहीं हो सकता। इस संसारमें किसीका भी जो निश्चय अन्तःकरणमें जड जमाकर सुदृढ़ हो गया है, वह शास्त्रोक्त परमार्थतत्त्वका अभ्यास किये बिना कदापि नष्ट नहीं होता। जो अनधिकारी-के प्रति ऐसा उपदेश देता है कि यह जगत् मिथ्या है, केवल ब्रह्म सत्य है, उस पुरुषको उन्मत्तके समान समझकर इस जगत्के उन्मत्त और मूढ़ मनुष्य उसकी पूरी हँसी उड़ाते हैं किंतु जो मदिरा पीकर मतवाला हो गया है, जो मदिरासे दूर रहनेके कारण मदमत्त नहीं हुआ है, उन दोनोंकी कहाँ एकता होती है। जैसे अन्धकार और प्रकाशको समझनेमें, छाया और धूपको पहचाननेमें कोई बाधा नहीं आती, उसी प्रकार ज्ञानी और अज्ञानीके विषयमे भी समझना चाहिये। बोधके विषयमें ज्ञानी और अज्ञानीकी कभी एकता नहीं हो सकती। अज्ञानीको कितने ही यत्नसे क्यों न समझाया जाय, उसे बाहर-भीतर जो संसारकी सत्यताका अनुभव हो रहा है, उसका वह सत्य अधिष्ठान-रूप ब्रह्ममें उसी प्रकार बाध नहीं कर सकता, जैसे शव अपने पैरों चल नहीं सकता। (अध्यस्त वस्तुका बाध किये बिना अधिष्ठान-तत्त्वका बोध नहीं हो सकता; इसलिये उसे बोधका उपदेश देना व्यर्थ है।)
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म है—ऐसा उपदेश उस मनुष्यके प्रति देना उचित नहीं, जो अत्यन्त अज्ञानी है; क्योंकि उस अज्ञानीने तप और विद्या आदिके अनुभवसे होनेवाले संस्कारका अभाव होनेके कारण सदा उस लोकप्रसिद्ध देहात्मभावका ही अनुभव किया है। कभी भी असंसारी आत्मभावका उसे अनुभव नहीं हुआ। श्रीराम ! जिसको थोड़ा-थोड़ा ज्ञान है, उस पुरुषके प्रति ही यह उपदेश-वाणी सुशोभित (सफल) होती है। जो पुरुष पूर्ण ज्ञानी है, उसको तो 'मैं हूँ' इस प्रकार अहंकारास्पदरूपसे विचार करनेके लिये कुछ भी नहीं है। (इसलिये वह भी उपदेश देनेके योग्य नहीं है। तात्पर्य यह कि जो न तो अत्यन्त अज्ञानी है और न पूर्ण ज्ञानी ही, वही जिज्ञासु इस उपदेशका अधिकारी है।) जो शुद्ध बुद्धिसे युक्त ज्ञानी पुरुष निरन्तर यह अनुभव करता है कि यह सब कुछ शान्त परब्रह्म ही है, उसके इस अनुभवका बाध कैसे हो सकता है। आत्मामें परब्रह्मके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, सोनेमें अँगूठी आदिकी तरह आत्मामें अन्य किसीकी प्रातीतिक सत्ता भी नहीं है। मूढ़ पुरुष मिथ्या अहंकारमय है और सुन्दर बुद्धिसे युक्त ज्ञानी एकमात्र सत्य आत्मस्वरूप है। इन दोनोंके स्वभावके अन्तरका निराकरण कहीं नहीं हो सकता है। जो सर्वत्र व्याप्त, शान्त, शुद्ध, चेतन, आकाशवत् निर्विकार, निर्मल तथा उत्पत्ति-विनाशसे रहित है, वह ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही परमार्थ सत्य है। जिसके नेत्र तिमिर-रोगसे पीडित हैं, उसकी स्वाभाविक दृष्टियाँ ही आकाशमें केशोंके वर्तुलाकार गोलोंकी तरह प्रतीत होती हैं। उसी तरह चिन्मय परमात्मामे ये सृष्टियाँ प्रतिभासित होती हैं। वह चिदाकाशस्वरूप सत्यात्मा अपने आपको जैसा समझता है क्षणभरमें वैसा ही अनुभव करने लगता है। उसके दृष्टिबलसे असत्य वस्तु भी क्षणभरमें सत्य-सी प्रतीत होने लगती है।
२२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंके तापको ही मृगजल या मृगतृष्णा नाम दिया गया है, उसी प्रकार जो आकाशकी-ज्यों निराकार है, उस आकाशरूप चिन्मय परमात्माके अपने खमतुल्य प्रतिभासका ही, जो वास्तवमें शून्य है, जगत् नाम रक्खा गया है। जैसे स्फटिक-शिलाका मध्यभाग वास्तवमें घनीभूत है, उसी प्रकार महाचेतन परमात्माका यह जो शान्त और निर्मल अपना स्वरूप है, वह वास्तवमें सच्चिदानन्दघन है। स्फटिक-शिलामें प्रतिबिम्बित होनेवाले वन, पर्वत और नदी आदिके स्वरूपकी भाँति 'है और नहीं है' ये दो दृष्टियाँ चिदाकाश परमात्मामें कहीं नहीं हैं। और प्रतिभासमात्रसे जो कुछ है, उस चेतन-आत्माका स्वरूप ही उस रूपमें भासित होता है—ऐसा समझना चाहिये। (सर्ग २४-३१')
शास्त्रचिन्तन, शास्त्रीय सदाचारके सेवन तथा शास्त्रविपरीत आचारके त्यागसे लाभ
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! चिन्मय आकाश-स्वरूप जो 'जीवात्मा' है, वही रजोगुणसे रहित होकर अपने स्वाभाविक स्वरूप—स्वप्रकाशरूपताका त्याग न करता हुआ ही अहंकार, प्राण, देह और इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस विरूप देहको भी अपना आत्मा समझता है। असत्य होकर भी सत्य-सी प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णा-में जल-बुद्धिके समान अपनी ही अविद्यामूलक वासनाकी भ्रान्तिसे जीव मानो अपने चिन्मयरूपसे भिन्नता (जड-देहरूपता) को प्राप्त होता है। जो लोग महावाक्य-रूप शस्त्रसे दृश्य-प्रपञ्चको आगन्तुक समझकर निर्वाण-भावमें स्थित हैं, वे अन्तरात्माकी ओर उन्मुख हुई अपनी बुद्धिसे ही भवसागरसे पार हो जाते हैं। जो उदारचेता पुरुष त्रिलोकीके वैभवको भी सदा तृणके तुल्य समझता है, उसे सारी आपत्तियाँ इस तरह छोड़ देती हैं, जैसे साँप अपनी केंचुलीको। जिसके भीतर सदा सत्यस्वरूप ब्रह्मका चमत्कार स्फुरित होता है, उसकी सारे लोकपाल अखण्ड ब्रह्माण्डके समान रक्षा करते हैं। अपार विपत्तिमें पड़नेपर भी कभी कुमार्गमें पैर नहीं रखना चाहिये; क्योंकि राहु अनुचित मार्गसे अमृत पीनेका प्रयत्न करनेके कारण ही मृत्युको प्राप्त हो गया। जो पुरुष उपनिषद् आदि उत्तम शास्त्र और उनके अनुसार चलनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंके सम्पर्क रूपी सूर्यका, जो कि परमात्माका साक्षात्कार-रूपी तीव्र प्रकाश देनेवाला है, आश्रय लेते हैं, वे फिर कभी मोहरूपी अन्धकारके वशीभूत नहीं होते। जिसने शम-दम आदि गुणोंके द्वारा यश प्राप्त किया है, वशमें न आनेवाले प्राणी भी उसके वशीभूत हो जाते हैं। उसकी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उसे अक्षय कल्याणकी प्राप्ति होती है। जिनका गुणोंके विषयमें संतोष नहीं है, जिनका शास्त्रोंके प्रति अनुराग है तथा जिन्हें सत्य-पालनका स्वाभाविक अभ्यास है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उनके अतिरिक्त जो दूसरे लोग हैं, वे पशुओंकी ही श्रेणीमें हैं। जिनके यशरूपी चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्राणियोंका हृदयरूपी सरोवर प्रकाशित है, वे क्षीरसागरके समान हैं। उनके शरीरमें निश्चय ही भगवान् श्रीहरिका निवास है।
परम पुरुषार्थरूपी प्रयत्नका आश्रय ले उत्तम उद्योगको अपनाकर शास्त्रके अनुकूल उद्वेगशून्य आचरण करता हुआ कौन पुरुष सिद्धिका भागी नहीं होता। अर्थात् वह सिद्धिका भागी अवश्य होता है। शास्त्रके अनुसार कार्य करनेवाले पुरुषको सिद्धियोंके लिये उतावली नहीं करनी चाहिये; क्योंकि चिरकालतक परिपक्व 'हुई सिद्धि ही पुष्ट एवं उत्तम फलको देनेवाली होती है। शोक, क्लेश और भयका परित्याग करके घमंड और शीघ्रताके आग्रहको छोड़कर शास्त्रके अनुसार व्यवहार करना चाहिये। उसके विपरीत चलकर अपना विनाश नहीं करना चाहिये। परिणाममें दुर्भाग्य प्रदान करनेवाली,
स्थिति-प्रकरण ] * शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारके त्यागसे मोक्षकी प्राप्ति * २२९
दीन, शुभ फलसे रहित जो धन, पुत्र आदि लौकिक वस्तुओंकी चिन्ता है, वह दीर्घकालतक बनी रहनेवाली प्रगाढ़ महानिद्रा ही है। उसे त्यागकर सचेत हो जाना चाहिये—विशुद्ध ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर लेना चाहिये। व्यवहारपरायण पुरुषोंके विचारसे लोकमर्यादाके अनुसार तथा शास्त्र और सदाचारके अनुकूल कर्म करके उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जिसका चरित्र सदाचारसे सुन्दर तथा बुद्धि विवेकशील है और संसारके सुख-फलरूपी दुःखद दशाओंमें जिसकी आसक्ति नहीं है, उस पुरुषके यश, गुण और आयु—ये तीनों ही वसन्त ऋतुकी लताओंके समान उत्तम फल देनेके लिये शोभाके साथ विकासको प्राप्त होते हैं। (सर्ग ३२)
शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारकी बन्धकता और उसके त्यागसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! समस्त साधनोंका अधिक अभ्यास ही सफल होता है। इसलिये सर्वत्र और सदा साधन करनेसे सब प्रकारके फलोंकी प्राप्ति सम्भव है; क्योंकि इष्ट, मित्र, स्वजन एवं बन्धु-बान्धवोंको आनन्द देनेवाले नन्दीने तालाबके किनारे आराधना करके भगवान् शिवको पाकर मृत्युपर भी विजय पा ली। दानव-सेना और धन-धान्यसे सम्पन्न बलि आदि दानवों-द्वारा देवता उसी तरह कुचल दिये गये, जैसे हाथियोंके द्वारा कमलोंसे भरे हुए सरोवर मथ डाले जाते हैं; किंतु फिर अतिशय प्रयत्न करनेके कारण देवताओंने सबसे उत्कृष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। राजा मरुत्तके यज्ञमें महर्षि संवर्तने ब्रह्माजीकी तरह देवताओं और असुरों-सहित दूसरी सृष्टि ही रच डाली थी। (अतिशय साधन और प्रयत्नसे ही उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हुई थी।) शास्त्रीय विधिसे महान् साधनोंके अनुष्ठानमें अत्यन्त संलग्न रहनेवाले विश्वामित्रने बारं बार की गयी कठोर तपस्या-द्वारा दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। राजकुमारी सावित्री अपने पति-प्रेमरूप पातिव्रत्य धर्मके प्रभावसे यमराजको जीतकर उत्तम वाणीका प्रयोग करके संतुष्ट किये हुए यम देवताकी अनुमतिसे अपने पति सत्यवान्को लौटा लायी। संसारमें ऐसा कोई शास्त्रीय शुभ कर्मका अतिशय अनुष्ठान नहीं है, जिसका फल स्पष्टरूपसे प्राप्त न होता हो। अपने मनमें ऐसा विचार करके कल्याणकामी पुरुषोंको सर्वोत्कृष्ट प्रयत्नसे सुशोभित होना चाहिये। सम्पूर्ण सुख-दुःख आदि अवस्थाओंकी भ्रम-दृष्टियोंका मूलोच्छेद करनेवाला परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही है। अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये साधनका अतिशय अभ्यास करना चाहिये। संसार-सागरको पार करनेके लिये सत्पुरुषोंके सङ्ग और सेवाके बिना तप, तीर्थ तथा शास्त्राभ्यास आदि कोई भी साधन सफल नहीं होते। जिसके सेवनसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हों और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
जबतक अन्तःकरणके आकाशमें चैतन्यरूपी चाँदनी अहंकाररूपी मेघमालासे आच्छादित है, तब-तक वह परमार्थरूपिणी कुमुदिनीको विकसित नहीं कर सकती। जबतक हृदयाकाशमें अहम्भावका बादल उमड़-घुमड़कर बढ़ता जाता है, तभीतक तृणारूपी कुटज-कुसुमकी मञ्जरी विकासको प्राप्त होती है। वह मिथ्याकल्पित अहंकार दूषित अन्तःकरणमें अनन्त संसार-बन्धनमें डालनेवाले मोहको जन्म देता है। 'यह देह मैं हूँ' इस प्रबल मोहसे बढ़कर अनर्थकारी दूसरा अज्ञान इस संसारमें न कभी हुआ है और न होगा ही। इस संसारमें यह जो कुछ भी सुख-दुःखरूपी विकार आता है, उसके रूपमें अहंकार-चक्रका ही
२३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मुख्य विकार बढ़ रहा है। जिस पुरुषने अज्ञानसे आरोपित अहंकाररूपी वृक्षके अङ्कुरको विवेकपूर्वक विचारसे संस्कृत मनरूपी हलके द्वारा जोतकर उखाड़ फेंका है, उसके आत्मारूपी खेतमें संसार-तापका नाशक एवं सहस्रों शाखाओंसे युक्त अच्छेद्यज्ञानरूपी वृक्ष बढ़ता और फलता है। जिस नराधमको अहंकाररूपी पिशाचने पकड़ लिया है, उसके उस पिशाचको मार भगानेके लिये विवेकके बिना न कोई शास्त्र समर्थ हैं न मन्त्र।
श्रीरामजीने पूछा--भगवन् ! ब्रह्मन् ! कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे अहंकार नहीं बढ़ता ? आप संसाररूपी भयकी शान्तिके लिये वह उपाय मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा--रघुनन्दन ! आत्मा चैतन्यमय दर्पणके समान शुद्ध है। उसमें उसके पूर्वोक्त शुद्ध स्वरूपका निरन्तर स्मरण करनेसे अहंकार नहीं बढ़ता। यह जगत् झूठे इन्द्रजालकी शोभाके समान है। इसमें अनुराग या वैराग्यसे मेरा क्या प्रयोजन है--ऐसा मनमें विचार करते रहनेसे अहंकार उत्पन्न ही नहीं होता। श्रीराम ! इस त्रिलोकीमें तीन प्रकारके अहंकार होते हैं। उनमें दो प्रकारके अहंकार तो श्रेष्ठ हैं, किंतु तीसरा त्याज्य है। मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ! मैं ही यह सम्पूर्ण विश्व हूँ। मैं ही अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हूँ। मेरे सिवा दूसरा कुछ नहीं है--इस तरहका जो अहंकार है, उसे उत्तम समझना चाहिये। यह अहंकार जीवन्मुक्त पुरुषकी मोक्ष-प्राप्तिके लिये है। यह बन्धनमें डालनेवाला नहीं होता। 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े करनेपर जो सौवाँ हिस्सा होता है, उसीके समान मुझ जीवात्माका सूक्ष्म स्वरूप है अर्थात् मैं अवयवसे रहित हूँ, अतएव सबसे भिन्न हूँ।' इस प्रकारका जो अनुभव है, वही दूसरा शुभ अहंकार है। वह भी साधकके मोक्षके लिये ही है, बन्धनके लिये नहीं। उपर्युक्त अहंकारके नामसे केवल कल्पना होती है। वास्तवमें वह नहीं है। यह हाथ-पैर आदिसे युक्त शरीर ही मैं हूँ, इस प्रकारका जो मिथ्या अभिमान है, वही तीसरा अहंकार है। वह लौकिक एवं तुच्छ ही है। उस दुष्ट अहंकारको त्याग देना ही चाहिये; क्योंकि वह सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। पहले बताये गये जो दो अहंकार हैं, उनको स्वीकार करके 'मैं देह नहीं हूँ' ऐसा विचारसे भी निश्चय कर लेनेके पश्चात् उन दोनोंको भी अन्तिम तीसरे अहंकारकी भाँति ही लौकिक समझकर त्याग देना उचित है--ऐसा प्राचीन महापुरुषोंका मत है। प्रथम दो अहंकार अलौकिक हैं। उन दोनोंको अङ्गीकार करके तीसरे लौकिक अहंकारका, जो दुःख देनेवाला है, त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि यह तीसरा अहंकार सर्वथा त्यागने ही योग्य है। इस दुःखदायी अहंकारको त्यागकर पुरुष जैसे-जैसे ज्ञानमें स्थित होता जाता है, वैसे-ही-वैसे वह परमात्मभावकी ओर बढ़ता जाता है। निष्पाप रघुनन्दन ! यदि पुरुष पूर्वोक्त दो अहंकारोंकी भावना करता रहे तो उसे परमपद प्राप्त हो जाता है; और यदि उनका भी त्याग करके सम्पूर्ण अहंकारोंसे रहित हो जाय तो वह अत्यन्त उच्च पद (परमात्मभाव)-में शीघ्र ही आरूढ़ हो जाता है। महामते ! जिस जीवका अहंकार शान्त हो गया है, उसे भोग रोगके समान जान पड़ते हैं। जैसे अच्छी तरहसे तृप्त हुए पुरुषको विषमिश्रित रस स्वादिष्ट नहीं प्रतीत होते, उसी प्रकार उसे भोग अच्छे नहीं लगते। रघुनन्दन ! अहंकारकी स्मृतिका भी सर्वथा त्याग करके अतिशय पुरुषार्थरूप प्रयत्नके द्वारा भवसागरको पार किया जाता है। पहले 'सब मैं ही हूँ और ये सब मेरे हैं' ऐसा समझकर फिर 'यह देह आदि मैं नहीं हूँ और इस देहके सम्बन्धी भी मेरे कुछ नहीं हैं' ऐसा विचार करके उससे सब प्रतिबन्धकोंका नाश होनेसे प्रतिष्ठाको प्राप्त हुए स्तुत्य आत्मज्ञानको अपने हृदयमें उतारकर महात्मा पुरुष परम पदको प्राप्त कर लेता है।
( सर्ग ३३ )
स्थिति-प्रकरण ] * मनोनियग्रहके उपाय—भोगेच्छा-त्याग, सत्सङ्ग और आत्मबोधके महत्त्वका वर्णन * २३१
मनोनिग्रहके उपाय—भोगेच्छा-त्याग, सत्सङ्ग, विवेक और आत्मबोधके महत्त्वका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिन्होंने अविद्याके घनीभूत विलासोंसे विषयोंकी ओर उन्मुख हुए अपने मनको जीत लिया है, उन महाशूर श्रेष्ठ पुरुषोंकी ही सदा विजय होती है। सब प्रकारके उपद्रवोंको प्राप्त करानेवाले इस संसारके दुःखको निवारण करनेका एकमात्र उपाय यही है कि अपने मनको वशमें किया जाय। ज्ञानका जो सारभूत सर्वस्व है, उसे बताता हूँ; उसे सुनकर हृदयमें धारण करना चाहिये। भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है। जैसे जहाँ काँटोंके बीज बिखेर दिये गये हैं, वह भूमि काँटोंके समुदायको ही उत्पन्न करती है, उसी प्रकार वासनासे आवृत्त हुई बुद्धि केवल दोषोंको ही जन्म देती है। जिसमें वासना-समूहका कोई लगाव नहीं है, अतएव जहाँ राग और द्वेष नहीं देखे गये हैं, वह चाञ्चल्यरहित बुद्धि धीरे-धीरे परम शान्तिको प्राप्त हो जाती है। जैसे जहाँ उत्तम बीज बोया गया है, वह भूमि समयपर श्रेष्ठ फल देनेवाले पौधोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार शुभ बुद्धि दोषरहित, शुभ एवं उत्तम गुणोंको ही सदा प्रकट करती है। जब शुभ भावोंके अनुसंधानसे मन प्रसन्न (शुद्ध) हो जाता है और धीरे-धीरे मिथ्याज्ञानरूपी घने मेघ शान्त हो जाते हैं, सुजनतारूपी चन्द्रमा जब शुक्लपक्षकी भाँति उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होने लगता है और आकाशमें सूर्यके तेजकी भाँति पुण्यमय विवेकका प्रसार हो जाता है, अन्तःकरणरूपी बाँसके भीतर धैर्यरूपी मोतीकी वृद्धि होने लगती है, वसन्त ऋतुमें चटकीली चाँदनीके प्रसारसे चरितार्थ होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति जब अन्तःकरणकी स्थिति आत्मज्ञानजनित परमानन्दकी प्राप्तिसे सर्वथा सफल हो जाती है, शीतल छायावाले सत्सङ्गरूपी फलवान् वृक्ष जब फलने लगते हैं तथा ध्यान-समाधिरूप सरल वृक्ष जब आनन्दमय सुन्दर रस टपकाने लगता है, उस समय मन निर्द्वन्द्व, निष्काम और उपद्रवशून्य हो जाता है। उसके चपलताकूपी अनर्थ तथा शोक, मोह और भयरूपी रोग शान्त हो जाते हैं। शास्त्रोंके अर्थके विषयमें उसका सारा संदेह दूर हो जाता है। उसमें सभी सांसारिक पदार्थोंको देखनेकी उत्कण्ठाका अभाव हो जाता है। उसकी कल्पनाओंके जाल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। वह मोहरहित एवं वासनाशून्य हो जाता है। उसमें आकाङ्क्षा, उपाक्रोश (परनिन्दा), अपेक्षा और दुश्चिन्ताका अभाव हो जाता है। वह शोकरूपी कुहरेसे रहित और आसक्तिशून्य होता है तथा उसके हृदयकी अज्ञानकी गाँठें खुल जाती हैं।
विशुद्ध आत्मा न तो संसारी पुरुष है, न शरीर है और न रुधिर ही है; शरीर आदि सब जड़ हैं, किंतु शरीरी (आत्मा) आकाशके समान निर्लेप है। जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही बन्धनके लिये रेशमी तन्तुओंका जाल रच लेता है, उसी प्रकार जीवात्मा मनमें विकल्प-वासनाओंका प्रसार करके अपने बन्धनके लिये सुदृढ़ जगत्रूप जालकी रचना कर लेता है। जीवात्मा इस वर्तमान देहभ्रमका त्याग करके फिर दूसरे देश और दूसरे कालमें अन्यदेहभावको धारण करता है; जीवात्माके मनमें जैसी वासना होती है, वैसा ही शरीर उत्पन्न होता है। जीवात्माका चित्त जैसी वासना लेकर सोता है, रातको स्वप्नमें वैसा ही बनकर रहता है। इमलीका बीज यदि शहदके रससे सींचा जाय तो अङ्कुर आदिके क्रमसे वृक्ष बनकर फलनेके समय भी वह उस मधुसे अनुरञ्जित होकर मधुर फल ही देता है और वही बीज यदि विषके प्रतिनिषिभूत धतूरे और करञ्ज आदि लताके पीसे हुए चूर्णके रससे सींचा जाय तो उसका फल कडुवा ही होता है। महती शुभ वासनासे मनुष्यका चित्त महान् होता है। मनुष्य 'मैं इन्द्र हूँ' इस प्रकारका मनोरथ होनेपर इन्द्ररूपमें प्रतिष्ठित होनेका स्वप्न देखता है। इसी तरह मनुष्यका क्षुद्र वासनासे वासित हुआ चित्त तुच्छ क्षुद्रताको
सं० यो० व० अं० ९—
२३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
देखता है। पिशाचका भ्रम होनेसे मनुष्य रातको स्वप्नमें पिशाचोंको ही देखने लगता है। जैसे प्रतिदिन क्षीण होता हुआ चन्द्रमा अपने पूर्ण होनेकी आशाको कभी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार दरिद्रता आदिसे पीड़ित होनेपर भी उद्योगशील श्रेष्ठ पुरुष उदारगतिका परित्याग नहीं करता। वास्तवमें तो न यहाँ बन्धन है और न मोक्ष है, न बन्धनका अभाव है न बन्धनकी सत्ता ही है। इन्द्रजाल-लताकी भाँति यह झूठी माया ही प्रकट हुई है। बन्धन और मोक्षकी अवस्थाओंसे तथा द्वैत और अद्वैतसे रहित यह सम्पूर्ण विज्ञानानन्दमयी ब्रह्म-सत्ता ही है—ऐसा निश्चय ही परमार्थ है। यह जगत् परमात्माका स्वरूप ही है, ऐसा ज्ञान हुए बिना यह दृश्य जगत् दुःख देनेवाला ही होता है और यदि वैसा ज्ञान हो गया तो यह दृश्य मोक्ष प्रदान करनेवाला होता है। जल भिन्न है और तरङ्ग भिन्न, इस प्रकार अनेकता और भिन्नताका बोध अज्ञान है। जल ही तरङ्ग है, इस प्रकार एकत्वबोधसे यथार्थ ज्ञान सिद्ध होता है। जैसे स्नेहरहित बन्धुके मिलने और बिछुड़नेसे मनुष्यको न सुख होता है न दुःख, उसी प्रकार परमात्माका तात्त्विक ज्ञान हो जानेपर इस पाञ्चभौतिक शरीरके रहने या बिछुड़नेसे पुरुष सुख या दुःखसे लिप्त नहीं होता। वासना-रहित एवं शान्तचित्त हुआ अपने देह-नगरका स्वामी जीवात्मा आक्षेप (संकोच)-शून्य, सर्वव्यापी और सबका अधिपति हो जाता है। चित्तके सर्वथा विगलित (शान्त) हो जानेपर अपने दोषोंका त्याग करके धीर हुई बुद्धिसे युक्त पुरुष मृत्यु और जन्म होनेपर प्राप्त होनेवाली पारलौकिक और ऐहलौकिक नीरस गतियोंपर दृष्टिपात करके विवेक—विचारद्वारा परमात्मारूपी दीपक पाकर तापरहित हो अपने देहरूपी नगरमें आनन्दपूर्वक प्रतिष्ठित होता है। (सर्ग ३४-३५)
सर्वत्र और सभी रूपोंमें चेतन आत्माकी ही स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे जो तरङ्गें भविष्यमें प्रकट होनेवाली हैं और अभी व्यक्त नहीं हुई हैं, वे समुद्रके जलमें अभिन्नरूपसे स्थित हैं, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मामें भावी सृष्टियाँ उस सत्स्वरूप परमात्मासे पृथक् नहीं हैं; क्योंकि उनकी स्वतः सत्ता नहीं है, परमात्माकी सत्तासे ही उनकी सत्ता है। जैसे आकाश सर्वत्र व्यापक होकर भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण दृष्टिमें नहीं आता, उसी प्रकार निरवयव शुद्ध चेतन परमात्मा सर्वव्यापी होनेपर भी दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे जलमय समुद्रमें जो नाना प्रकारकी असंख्य तरङ्गें उठती हैं, उनका वह नानात्व जलसे पृथक् भाव-विकारवाला नहीं है, उसी प्रकार चैतन्य ब्रह्मस्वरूप चिन्मय समुद्रमें 'तू', 'मैं', 'यह', 'वह' इत्यादि रूपसे जो प्रचुर नानात्वरूपमें जगत् भासित होता है, वह उस ब्रह्मरूप चैतन्य-सिन्धुसे पृथक् नहीं है। वास्तवमें चेतन परमात्मा न अस्त होता है न उदित, न उठता है न खड़ा होता या बैठता है, न आता है न जाता है, न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। रघुनन्दन ! वह निर्मल चेतन परमात्मा स्वयं अपने आपमें ही स्थित है। वही भ्रमसे प्रतीत होनेवाले जगत् नामक प्रपंचके रूपमें विस्तारको प्राप्त हुआ है। जैसे तेज ही तेजःपुञ्ज (सूर्य आदि) के रूपमें और जल ही जलराशि (समुद्र आदि) के रूपमें स्फुरित होता है, उसी प्रकार चेतन परमात्मा ही अपने स्पन्दनभूत सृष्टिके रूपमें स्फुरित हो रहा है।
चेतन परमात्मा ही आकाशरूपसे अवकाश प्रदान करता है, जिससे अङ्कुरको बाहर निकलने या फैलनेका अवसर मिलता है। स्पन्दात्मक वायुरूपसे वह उसका आकर्षण करता है, जिससे अङ्कुर बाहर निकलता है। वही जलरूप होकर रसरूपसे अङ्कुरको स्नेहयुक्त बनाता है। वही सुदृढ़ पृथ्वीरूपसे उस अङ्कुरको दृढ़ता प्रदान
स्थिति-प्रकरण ] * ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण * २३३
करता है और तेजरूप होकर उसे अपना रूप देता है, जिससे वह दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार वह परमात्मा स्थावर-जङ्गम जगत्पर अनुग्रह करता है। वही परमात्मा हेमन्त आदि कालरूपसे प्रकट होकर जौ आदि अङ्कुरोंके विरोधी तृण आदिकी उत्पत्तिमें बाधक बनता है और उन अङ्कुरोंकी उत्पत्तिके अनुकूल वातावरण तैयार करता है। वह चेतन तत्त्व परमात्मा ही फूलोंमें धीरे-धीरे केसरका संचय करके गन्धरूपमें प्रकट होता है। मिट्टीके भीतर रसरूपताको प्राप्त हो वही वृक्षकी वृद्धिके द्वारा स्थाणुभाव (मूल और तनेके रूप) को प्राप्त होता है। उस मूलमें स्थित हुए सुन्दर रसलेश ही फलके रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही पल्लवोंमें प्रविष्ट हो रेखाएँ बनकर पत्र आदिके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। वह चेतन तत्त्व परमात्मा ही वृक्षोंमें इन्द्रधनुषके समान नूतनताका सम्पादन करता हुआ उनपर अनुग्रह करता है। स्थिरतारूप चतुरताको प्रकट करनेवाली नियतिरूपसे वही स्थितिको प्राप्त होता है। उसी परमात्माके अनुग्रहसे धारणरूप धर्मवाली यह धीर वसुन्धरा प्रलयकालतक स्थित रहती है।
इस प्रकार सब ओर स्थित और सुस्थिर आकारवाली ये समस्त संसार-पंक्तियाँ, जो ब्रह्मकी स्वभावभूत हैं, बार-बार आती-जाती रहती हैं। यह सारा जगत् एक दूसरेके प्रति कारणभावको प्राप्त होकर अपने अधिष्ठानभूत चैतन्यके सकाशसे स्वयं ही उत्पन्न हुआ है और एक-दूसरेके द्वारा नष्ट होता हुआ यह उस अधिष्ठानभूत चैतन्यमें स्वयं ही लीन होता है। जैसे अगाध जलमें होनेवाला स्पन्दन भी स्वतः अस्पन्दन ही है; क्योंकि वहाँ जलसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार चेतन आत्मामें प्रकट हुआ सद्सद्रूप जगत् भी वास्तवमें अप्रकट ही है; क्योंकि वह सब ज्ञानसे चेतन-स्वरूप ही अनुभूत होता है। (सर्ग ३६-३७)
ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, वासनाके कारण ही कर्तृत्वका प्रतिपादन
तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसी परिस्थितिमें सुख-दुःख आदि भोग देनेवाले कर्मोंमें या ध्यान-समाधिमें तत्त्वज्ञानियोंका जो यह कर्म या कर्तृत्व दिखायी देता है, वह वास्तवमें असत् है; क्योंकि उसमें कर्तापन नहीं है। परंतु मूर्खोंका वह कर्म (कर्तृत्वाभिमान होनेके कारण) असत् नहीं है (यही ज्ञानी और अज्ञानीमें अन्तर है)। पहले यह विचार करना चाहिये कि कर्तृत्व किसका नाम है। अन्तःकरणमें स्थित जो मनकी वृत्ति है, उसका निश्चय—अमुक वस्तु ग्रहण करने योग्य है, इसका विश्वास वासना कहलाता है। वह वासना ही 'कर्तृत्व' शब्दसे प्रतिपादित होती है; क्योंकि वासनाके अनुसार ही मनुष्य चेष्टा करता है और चेष्टाके अनुसार ही फल भोगता है। अतः कर्तृत्वसे फलभोक्तृत्व होता है—यह सिद्धान्त है। कहा भी है—'पुरुष कर्म करे या न करे, वह स्वर्गमें या नरकमें, सर्वत्र उसीका अनुभव करता है जैसी उसके मनमें वासना होती है। इसलिये जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, वे पुरुष कर्म करें या न करें, तो भी उनमें वासना होनेके कारण कर्तृत्व अवश्य है। इसके विपरीत जिन्हें तत्त्वज्ञान हो गया है, वे कर्म करें तो भी उनमें कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि वे वासनासे सर्वथा शून्य हैं। तत्त्वज्ञानीकी वासना शिथिल हो जाती है, इसलिये वह कर्म करता हुआ भी उसके फलकी इच्छा नहीं रखता। उसकी बुद्धि कर्तृत्वाभिमान और आसक्तिसे रहित होती है, अतः वह अनासक्त भावसे केवल चेष्टामात्र करता है। उसे जो कुछ भी प्रारब्धके अनुसार कर्मोंका फल प्राप्त होता है, वह उस सारे कर्म-फलको यह आत्मा ही है—ऐसा अनुभव करता है। परंतु जिसका मन फलासक्तिमें डूबा हुआ है, वह कर्म न करके भी कर्ता ही माना जाता
२३४ * अविच्छिन्नविदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
है। मन जो कुछ करता है, वही किया हुआ होता है। मन जिसे नहीं करता, वह किया हुआ नहीं होता; अतः मन ही कर्ता है, शरीर नहीं। चित्तसे ही यह संसार प्राप्त हुआ है, इसलिये यह चित्तमय ही है, केवल चित्तमात्र होकर चित्तमें स्थित है—यह बात पहले विचार-पूर्वक निर्णीत हो चुकी है। सम्पूर्ण विषय और विभिन्न प्रकारकी चित्तवृत्तियाँ—ये सब शान्त होकर जब वासनारूप हो जाते हैं, तब उस वासनारूप उपाधिसे युक्त जीवात्मा ही रहता है। उनमेंसे जो आत्मतत्त्वके ज्ञाता हैं, उनका मन वर्षाकालमें मृगतृष्णाके जल और प्रचण्ड धूपमें हिमकणके समान गलकर जब परम शान्त हो जाता है, तब तुरीय दशाको प्राप्त हो, उसी परमात्मरूपमें स्थित हो जाता है। विद्वान् लोग ज्ञानियोंके मनको न तो आनन्दमय मानते हैं और न अनानन्दमय ही। उनका मन न चल है, न अचल है। न सत् है, न असत् है और न इनका मध्य ही है। बल्कि वह इन सबसे विलक्षण अनिर्वचनीय है। जैसे हाथी छोटी तलैयामें नहीं डूबता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष वासनामय चेष्टारसमें नहीं मग्न होता। मूर्खका मन तो भोगोंको ही देखता है, परमार्थ-तत्त्वको नहीं। तत्त्वज्ञानीकी चित्तवृत्ति सांसारिक विपत्तिमें भी प्रसन्न ही रहती है। वह चाँदनीकी तरह भुवनमात्रको प्रकाशित करती है। चित्तके संयोगके बिना कर्म करता हुआ भी ज्ञानी अकर्ता ही है; क्योंकि वह कर्म मनको लिप्त नहीं करता। वह यत्नपूर्वक किये हुए हाथ-पैर आदिके संचालनरूप कर्मके फलको भी नहीं भोगता। बालक मनसे ही नगरका निर्माण और उसकी सफाई एवं सजावट करता है तथा उस मनःकल्पित नगरको खेल-खेलमें ही अकृत-सा अनुभव करता है; उसको उपादेयरूपसे नहीं ग्रहण करता। उसके सुख-दुःखको स्वाभाविक-सा देखता है। मनके द्वारा किये गये नगरके विध्वंसको वास्तविक विध्वंस समझकर खेल-खेलमें दुःखका-सा भी अनुभव करता है। साथ ही यह भी समझता रहता है कि यह वास्तविक दुःख नहीं है। उसी प्रकार ज्ञानी कर्म करता हुआ भी वास्तवमें उससे लिप्त नहीं होता। जिनका मन पूर्ण आत्मामें ही संलग्न है, उन ज्ञानियोंकी दृष्टिसे तो वस्तुतः संसारमें मोक्ष नहीं है। जिनका मन आत्मामें संलग्न नहीं है, उन्हीं लोगोंकी दृष्टिसे यह बन्धन-मोक्ष आदि सब कुछ है।
किंतु वास्तवमें तो न बन्धन है न मोक्ष है, न बन्धनका अभाव है और न बन्धनके कारणभूत वासना आदि ही हैं। परमात्मतत्त्वका ज्ञान न होनेसे ही यह दुःख है। यथार्थ ज्ञानसे उसका लय हो जाता है।
(सर्ग ३८)
सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी परब्रह्मरूपताका प्रतिपादन; अत्यन्त मूढको नहीं, विवेकी जिज्ञासुको ही 'सर्वं ब्रह्म'का उपदेश देनेकी आवश्यकता तथा बाजीगरके दिखाये हुए खेलकी भाँति मायामय जगत्के मिथ्यात्वका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! महात्मन् ! ऐसी स्थितिमें यदि वस्तुतः बन्धन और मोक्ष कल्पित ही हैं, एकमात्र परब्रह्म ही सर्वत्र विद्यमान हैं तो बिना दीवारके चित्रकी भाँति इस निराधार सृष्टिका आगमन कहाँसे हुआ ? यह कृपापूर्वक बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राजकुमार ! ब्रह्मतत्त्व ही इस सारी सृष्टिके रूपमें विद्यमान है; क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है। इसलिये उस ब्रह्ममें सारी शक्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। सत्त्व, असत्त्व, द्वित्व, एकत्व, अनेकत्व, आदित्व और अन्तत्व—ये परस्पर विरुद्ध-से प्रतीत होनेवाले सारे भाव परब्रह्ममें हैं। परंतु वे उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे समुद्रका जल-प्रवाह उल्लास एवं विकासको प्राप्त हो उत्ताल तरङ्गों-
१५-सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारम्बार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन
स्थिति-प्रकरण ] ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन २३५
द्वारा अपनी नानाकारताका दर्शन कराता हुआ प्रकट होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्म चित्तका तथा चित्तस्वरूप होनेके कारण कर्ममयी, वासनामयी और मनोमयी सारी शक्तियोंका संचय, प्रदर्शन, धारण, उत्पादन और संहार करता है। समस्त जीवोंकी सब ओर फैली हुई सारी दृष्टियोंकी और समस्त पदार्थोंकी परब्रह्मसे ही निरन्तर उत्पत्ति होती है। जैसे लहरें समुद्रसे ही उत्पन्न होती और उसीमें लीन हो जाती हैं, इसलिये सदा समुद्ररूप ही हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ परमात्मासे उत्पन्न होकर उसीमें लीन होते हैं। फलतः चिन्मय परमात्मासे उत्पन्न होनेके कारण वे परमात्मरूप ही हैं।
निष्पाप रघुनन्दन ! यह सब निर्मल ब्रह्म ही विराजमान है। यहाँ मल नामक कोई वस्तु नहीं है। समुद्रमें तरङ्ग-समूहोंके रूपसे जल ही स्फुरित होता है, मिट्टी नहीं। रघुकुलतिलक ! यहाँ एकमात्र परब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी कल्पना ही नहीं है, जैसे अग्निमें उष्णताके सिवा और कोई कल्पना ही नहीं है। जिसकी बुद्धि पूर्णरूपसे व्युत्पन्न नहीं हुई है—जिसमें आधी समझ और आधी मूढ़ता है, उसे 'यह सब ब्रह्म ही है' यह उपदेश अच्छा नहीं लगता। वह दृश्योंको उपस्थित करनेवाली भोगदृष्टिसे सदा दृश्य पदार्थोंकी ही भावना करता हुआ नष्ट (तत्त्वज्ञानरूप परमार्थसे भ्रष्ट) हो जाता है। किंतु जो तत्त्वज्ञानरूप परमार्थ-दृष्टिको प्राप्त है, उस पुरुषके भीतर विषय-भोगकी इच्छा नहीं उत्पन्न होती। उसके लिये तो 'यह सब ब्रह्म ही है' ऐसा समयोचित उपदेश भी उपयुक्त होता है। जिसकी बुद्धि पूर्णतया व्युत्पन्न नहीं है, ऐसे शिष्यको उन सद्गुणोंद्वारा शुद्ध करे, जिनमें शम (मनोनिग्रह) और दम (इन्द्रियनिग्रह) की प्रधानता हो। तत्पश्चात् यह उपदेश दे कि यह सब कुछ ब्रह्म है तथा तुम भी विशुद्ध ब्रह्म ही हो। जो अज्ञानीको अथवा आधी समझवाले पुरुषको 'सर्वं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म है) यह उपदेश देता है, उसने मानो उस शिष्यको महान् नरकोंके जालमें डाल दिया। जिसकी बुद्धि पूर्णतया व्युत्पन्न है, जिसकी भोगेच्छा नष्ट हो गयी है और कामना सर्वथा मिट गयी है, उस महात्मामें अविद्यारूपी मल नहीं है। अतः उसीके लिये 'सर्वं ब्रह्म' का उपदेश देना उचित है। जो शिष्यकी परीक्षा लिये बिना ही उसे उपदेश देता है, वह अत्यन्त मूढ़ बुद्धिवाला उपदेशक महाप्रलय-पर्यन्त नरकको प्राप्त होता है।
ब्रह्म सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वगत और सर्व-स्वरूप है। यह ब्रह्म मैं ही हूँ, यों समझना चाहिये। अपनी मायाद्वारा विचित्र कार्य करनेवाले ऐन्द्रजालिकों (बाजीगरों) को तो तुम देखते ही हो। वे मायाके द्वारा सत्को असत् और असत्को सत् बना देते हैं। उसी प्रकार परमात्मा अमायामयी होकर भी मायामय महान् ऐन्द्र-जालिककी भाँति बनकर सङ्कल्पके द्वारा घटको पट बनाता है और पटको घट। मेरुके सुवर्णमय तटप्रान्तमें लहराते हुए नन्दनवनकी भाँति पत्थरपर लता पैदा करता है और कल्पवृक्षोंपर प्रकट हुए रत्नके गुच्छोंकी भाँति लतामें प्रस्तर पैदा कर देता है तथा आकाशमें सुन्दर वन लगा देता है। गन्धर्वनगरमें दीखनेवाले उद्यानकी भाँति उस भावी जगत्में कल्पनाद्वारा आकाशमें ही नगरकी रचना कर देता है—आकाशको ही नगररूपमें दिखा देता है। व्योमकी नीलिमाको नष्ट-सी करके उसे भूतल बना देता है। गन्धर्वनगरके राजमहलमें बहुत-सी महिषियोंकी भाँति भूतलमें आकाशकी स्थापना कर देता है। पद्मराग-मणिके बने हुए लाल फर्शमें प्रतिबिम्बित हुआ आकाश जैसे आधारकी लालिमासे ही लाल दिखायी देता है, उसी प्रकार जगत्में जो कुछ है, होगा या था, वह सब ब्रह्मकी सत्तासे ही सत्-सा प्रतीत होता है; क्योंकि ईश्वर संकल्पके द्वारा स्वयं व्यक्तरूप हो विचित्र वेश-भूषाको अपनाकर स्वयं अपने आपको दिखलाता है। श्रीराम ! जब कि इस जगत्में एक ही वस्तु सब प्रकारसे सर्वत्र सब रूपोंमें
३१६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रकट होती है, सभी रूपोंमें एक ही रुद्र-वस्तु विद्यमान है, तब हर्ष, ईर्ष्या और आश्चर्यके लिये अवसर ही कहाँ है। अतः धैर्यशाली होकर सदा समभावसे ही स्थित रहना चाहिये। जो समतासे युक्त है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष आश्चर्य, गर्व, मोह, हर्ष और अमर्ष आदि विकारोंको कभी प्राप्त नहीं होता। (सर्ग ३०)
दृश्यकी असत्ता और सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन, मायाके दोष तथा आत्मज्ञानसे ही उसका निवारण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परब्रह्म परमात्माकी जो निर्मल चैतन्य-शक्ति है, वह सर्वशक्तिमती है। वह परमात्माके सकाशसे स्वाभाविक ही विभिन्न रूपोंकी कल्पना करती हुई भावी देह आदि आकृतियोंकी किंचित् स्फुरणाके रूपमें स्वयं ही दृश्य जगत् बन जाती है। उस चेतन शक्तिका संकल्परूप मन ही अपने संकल्पमात्रसे क्षणभरमें गन्धर्वनगरके समान इस असत् (मिथ्या) दृश्यप्रपञ्चका विस्तार कर देता है। सब ओर प्रकाशित होता हुआ वह स्वयम्प्रकाश सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही जब बाह्यदृष्टिसे दृश्यमान आकाशरूप होकर स्थित होता है, वही यह सबकी दृष्टि (अनुभव) में आनेवाला प्रसिद्ध आकाश है। वही परमात्मा कमलजन्मा ब्रह्माका संकल्प करके उनके उस स्वरूपको देखता है। तदनन्तर दक्ष आदि प्रजापतियोंकी कल्पना करके जगत्की कल्पना करता है। श्रीराम ! इस प्रकार चौदह भुवनोंमें रहनेके कारण चौदह प्रकारके अनन्त प्राणिसमुदायके कोलाहलसे युक्त यह सृष्टि परमात्माके चित्तसे ही निर्मित हुई है। भूतलसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी प्राणियोंमें जो ये मनुष्य-जातिके प्राणी हैं, ये ही आत्मज्ञानके उपदेशके पात्र हैं।
श्रीराम ! यह जगत् अमुक निमित्तसे और अमुक उपादानसे उत्पन्न हुआ है, यह जो वाणीकी रचना या कल्पना है, वह शास्त्रोक्त मर्यादाके निर्वाहके लिये है, वास्तवमें कुछ नहीं है; क्योंकि परमात्मामें विकार, अवयव, विभिन्न दिशाओंकी सत्ता तथा देश-काल आदिके क्रम सम्भव नहीं हैं। यद्यपि इनका आविर्भाव प्रत्यक्ष देखा जाता है, तथापि निराकार, निर्विकार और सर्वगत परमात्मामें इन सबका होना कदापि सम्भव नहीं। उस चिन्मय परमात्माके बिना जगत्के किसी दूसरे मूलकारणकी कल्पना हो ही नहीं सकती। दूसरी कोई कल्पना न है न होगी। क्रम, शब्द और अर्थ अन्यत्र कहाँसे आ सकते हैं तथा व्यवहारजनित उक्तियाँ भी उस परमात्माके सिवा और कहाँसे सम्भव हो सकती हैं। यहाँ जो-जो कल्पनाएँ हैं, जो-जो पदार्थ हैं, उनके वाचक जो-जो शब्द हैं और जो-जो वाक्य हैं, वे सब उस सत्-स्वरूप परमात्मासे उत्पन्न तथा सद्रूप होनेके कारण 'सत्' ही समझे जाते हैं। 'यह जगत् भिन्न है और यह ब्रह्म भिन्न है'—इस तरहके शब्दों और अर्थोंका व्यवहार-भ्रम केवल वाणीमें है, परमात्मामें नहीं; क्योंकि परिच्छेद होनेपर ही भिन्नता होती है। (ब्रह्म अपरिच्छिन्न है, इसलिये उसका किसीसे भेद होना सम्भव नहीं।) अग्निकी एक शिखाकी दूसरी शिखा जननी है, यह कथन उक्ति-वैचित्र्यमात्र है। इस वाक्यके अर्थमें वास्तविकता नहीं है। इसी प्रकार परमात्माके विषयमें जन्य-जनक आदि शब्दोंका व्यवहार वास्तवमें सम्भव नहीं है; क्योंकि अनन्त होनेके कारण जब ब्रह्म एक ही है, तब वह किसको किस तरह उत्पन्न करेगा ? जैसे समुद्रमें जो तरङ्गोंका समूह दिखायी देता है, वह उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार परब्रह्ममें जो अर्थबोधक शब्द दृष्टिगोचर होता है, उसे विद्वान् पुरुष ब्रह्म ही मानते हैं। ब्रह्म ही चेतन जीवात्मा है, ब्रह्म ही मन है, ब्रह्म ही बुद्धि है, ब्रह्म ही अर्थ है, ब्रह्म ही शब्द है और ब्रह्म ही धातु है। यह सारा विश्व ब्रह्म ही है। इस विश्वसे परे भी ब्रह्मपद ही है। वास्तवमें तो जगत् है ही नहीं। सब
स्थिति-प्रकरण ] -- * चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहंकार आदिके रूपमें विस्तार * २३७
कुछ केवल ब्रह्म ही है। सर्वस्वरूप एवं सर्वव्यापी उस अनन्त ब्रह्मपदसे दूसरी कोई वस्तु उत्पन्न हो, यह सम्भव नहीं। जो कुछ ब्रह्मसे प्रकट हुआ है, वह ब्रह्मरूप ही है। इस जगत्में ब्रह्मतत्त्वके बिना कुछ भी होना सम्भव नहीं। निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म ही है। यही परमार्थता—यथार्थ कथन है।
रघुनन्दन ! यह माया ऐसी है, जो अपने विनाशसे ही हर्ष देनेवाली होती है। इसके स्वभावका पता नहीं लगता। ज्ञानकी दृष्टिसे जब इसको देखनेका प्रयत्न किया जाता है, तब यह तत्काल नष्ट हो जाती है। अहो ! संसारको बाँधनेवाली यह माया बड़ी ही विचित्र है। यद्यपि यह असत्य ही है, तथापि इसने अत्यन्त सत्यकी भाँति अपना ज्ञान कराया है। जो पुरुष 'यह जगत् ब्रह्मरूपसे सत्य ही है' अथवा 'मिथ्या होनेके कारण असत्य ही है'—इन दो बातोंमेंसे किसी एकको दृढ़ निश्चयके साथ अपना लेता है और मनमें आसक्ति न रखकर जगत्को स्वप्नभूमिकी भाँति भ्रान्तिमात्र ही देखता है, वह कभी दुःखमें नहीं डूबता। जिसकी इन मिथ्याभूत देह-इन्द्रिय आदिरूप द्वैतभावनाओंमें अहंबुद्धि है, वही दुःखके सागरमें डूबता है। स्वरूप-ज्ञानसे शून्य उस मिथ्यादर्शी पुरुषके लिये सब ओर केवल अविद्या ही विद्यमान है। जैसे जलमें सूखी धूल नहीं होती, उसी प्रकार महान् पुरुष परमात्मामें विकार आदि कोई दोष नहीं होते। अविद्यारूपी नदीमें बहता हुआ आत्मा इस संसारमें आत्माके यथार्थज्ञानके बिना अनुभवमें नहीं आता और वह आत्मज्ञान शास्त्रके तात्पर्यका यथार्थ बोध होनेसे ही प्राप्त होता है। श्रीराम ! परमात्माकी प्राप्तिके बिना अविद्यारूपी नदीका पार नहीं मिलता। वह परमात्माकी प्राप्ति ही अक्षयपद कहलाती है।
(सर्ग ४०-४१)
चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहंकार आदिके रूपमें विस्तार तथा अविद्याके कारण जीवोंके कर्मानुसार नाना योनियोंमें जन्मोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! विभिन्न कल्पनाओंद्वारा ही जिसने आकार ग्रहण कर रखा है तथा जो देश, काल और क्रियाके अधीन है, चैतन्यका वही रूप क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्र कहते हैं शरीरको। उसे बाहर और भीतरसे वह पूर्णतया जानता है, इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ञ ही वासनाका संकलन करके अहंकारभावको प्राप्त होता है। अहंकार ही निश्चयात्मकवृत्तिसे युक्त होकर जब निर्णायक एवं विभिन्न कल्पनाओंसे युक्त होता है, तब उसे बुद्धि कहते हैं। संकल्पयुक्त बुद्धि ही मनका स्थान ग्रहण करती है तथा घनीभूत विकल्पोंसे युक्त मन ही धीरे-धीरे इन्द्रियभावको प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष इन्द्रियोंको ही हाथ-पैर आदिसे युक्त शरीर मानते हैं। वह शरीर लोकमें सभीके अनुभवमें आता है, उत्पन्न होता है और जीवित रहता है। इस प्रकार संकल्प-वासनारूपी रस्सीसे जकड़ा और दुःखोंके जालसे व्याप्त हुआ वह जीव अज्ञानसे चित्तता—दृश्यताको प्राप्त होता है। जैसे बेर आदिका फल परिपाकवश अवस्था (रूप, रस आदि गुणोंके परिवर्तन) से ही अन्यरूपताको प्राप्त होता है, उसकी आकृति (जाति) नहीं बदल जाती—वह बेरसे भिन्न कोई दूसरा फल नहीं हो जाता, उसी प्रकार जीव—क्षेत्रज्ञ भी अविद्यारूप मलके परिणामवश अवस्थाभेदसे ही कुछ अन्यरूप-सा हो जाता है, आकृति (परिणामरहित चेतन जाति) से नहीं। (तात्पर्य यह है कि अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, शरीरके संघातक अनात्म-वस्तुमें वह आत्माभिमान कर लेता है; किंतु वास्तवमें उसका स्वरूप चेतन ही है।) इस प्रकार जीव अहंकारभावको प्राप्त होता है। अहंकार बुद्धिरूपमें परिणत होता है और बुद्धि संकल्पोंके समूहसे व्याप्त
२३८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मनका स्वरूप धारण करती है। फिर संकल्पमय मन नाना प्रकारके शरीरोंको धारण करनेमें संलग्न होता है। जैसे गौएँ मदमत्त साँड़के पीछे दौड़ती हैं और जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर भागी जाती हैं, उसी प्रकार इच्छा आदि शक्तियाँ मनका अनुसरण करती हैं, जिससे काम-क्रोध-लोभ-मोहादि दोषोंकी ही वृद्धि होती है। इस प्रकार इच्छा-द्वेष आदि शक्तियोंके बाहुल्यसे युक्त मन शाखा-प्रशाखारूपसे अभिमानकी वृद्धि होनेके कारण घनीभूत अहंकारभावको प्राप्त हो रेशमके कीड़ेकी भाँति स्वेच्छासे ही बन्धनको प्राप्त होता है। जैसे पक्षी स्वयं ही अपने शरीरको जाल आदि फंदोंमें फँसाकर कष्टकारी बन्धनमें डालते और पछताते हैं, उसी तरह मन अपने संकल्पोंके अनुसंधानसे स्वयं ही दुःखदायी बन्धनमें पड़कर इस लोकमें संतप्त होता है।
जैसे पक्षी समुद्रमें गिरा हो, उसी तरह मन घोर दुःखके महासागरमें पड़ा हुआ है, गन्धर्वनगरके समान शून्य जगत्-जालमें अपने बन्धनके हेतुरूप देह आदिपर आसक्ति रखता है, विषयोंकी ओर दौड़ा जाता है और तत्त्वज्ञान आदिके प्रति अविश्वासके समुद्रमें निरन्तर बह रहा है।
जो अनन्त विषयोंमें अनन्त संकल्प-कल्पनाओंकी उत्पत्तिमें हेतु है, उस माया अथवा अविद्याके द्वारा इस जगत्रूपी विशाल इन्द्रजालका विस्तार करनेवाले मूढ़ जीव जलमें आवर्तों (भँवरों) के समान तबतक चक्कर काटते रहते हैं, जबतक उन्हें अपने अनिन्दित—विशुद्ध आत्मस्वरूपका साक्षात्कार नहीं हो जाता। किंतु जब वे साधन करते-करते काल पाकर आत्माका साक्षात्कार करके असत्को त्यागकर सत्य ज्ञानको अपनाते हैं, तब परम पदको प्राप्त होकर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते। कुछ अज्ञानी जीव सहस्रों जन्मोंका कष्ट भोगकर विवेकको प्राप्त करके भी मूर्खताके कारण उस संसाररूपी संकटमें ही गिर जाते हैं; कुछ लोग उच्च कुलमें जन्म और साधनकी शक्ति एवं सुविधाको पाकर भी अज्ञान और विषयासक्तिके कारण अपनी तुच्छ बुद्धिसे ही पुनः तिर्यग्योनियोंको प्राप्त होते हैं और तिर्यग्-योनिसे नरकोंमें भी गिरते हैं। कुछ महाबुद्धिमान् सत्पुरुष एक ही जन्मके द्वारा मोक्षरूप ब्रह्मपदमें शीघ्र ही प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रीराम ! कितने ही जीवसमूह तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेते हैं, कितने ही देवयोनियोंको प्राप्त होते हैं, कितने ही नागयोनिको प्राप्त करते हैं। जैसे यह जगत् विशाल दिखायी देता है, वैसे ही अन्यान्य जगत् भी हैं, थे और भविष्यमें भी बहुत-से होंगे। इस ब्रह्माण्डमें लोग जिस व्यवहारसे रहते हैं, उसी व्यवहारसे अन्य ब्रह्माण्डोंमें भी रहते हैं। केवल उनकी आकृतियोंमें अन्तर या विलक्षणता होती है। जैसे नदीकी लहरें परस्पर टकरानेसे परिवर्तित होती रहती हैं, उसी प्रकार विभिन्न सृष्टियाँ अपने सात्त्विक, राजस आदि स्वभाववश परस्पर संघर्षके कारण बदलती रहती हैं। जैसे जलराशि समुद्रमें अनन्त लहरें निरन्तर उठती और विलीन होती रहती हैं, उसी प्रकार उस परमपद-स्वरूप परमात्मामें यह तीनों लोकोंकी रचना आदि मोहमाया व्यर्थ ही विस्तारको प्राप्त हो अनवरत बढ़ती, परिणामको प्राप्त होती और विनष्ट होती रहती है।
( सर्ग ४२-४३ )
परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व, मनोमय होनेके कारण जगत्की असत्ता तथा ज्ञानीकी दृष्टिमें सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! इस क्रमसे जिस जीवने परमात्माके स्वरूपमें अपनी स्थिति प्राप्त कर ली, वह अस्थिपञ्जररूप देहको कैसे ग्रहण किये रहता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो यह शरीर आदिके रूपमें स्थावर-जङ्गम जगत् दिखायी देता है, यह आभास-मात्र ही है, अतएव स्वप्नके समान असत् होता हुआ ही
स्थिति-प्रकरण ] * परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * २३९
प्रकट हुआ। (तात्पर्य यह है कि वह परमात्मनिष्ठ जीव इस शरीर आदिको स्वप्नके तुल्य मिथ्या मानता हुआ ही इसमें रहता है)। निष्पाप श्रीराम ! यह प्रपञ्च दीर्घ-कालतक बने रहनेवाले स्वप्नके समान मिथ्या ही दीखता है, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान तथा पहाड़ी भूमिमें घूमते हुए पुरुषको घूमते दीखनेवाले पर्वतके समान मिथ्या ही दृष्टिगोचर होता है। जिसकी अज्ञानमयी निद्रा टूट गयी है और वासनात्मक भावना गल गयी है, वह ज्ञानवान् पुरुष इस संसाररूपी स्वप्नको देखता हुआ भी नहीं देखता—इसे मिथ्या समझता है। श्रीराम ! जीवोंके स्वभावसे कल्पित यह संसार, जिसकी मोक्ष होनेसे पहले-तक निरन्तर प्राप्ति होती रहती है, अनात्मज्ञानीके ही अंदर सदा सत्य-सा विद्यमान रहता है।
रघुनन्दन ! यह जगत् यद्यपि सब प्रकारसे सम्पन्न दिखायी देता है, तथापि यहाँ वास्तवमें कुछ भी सम्पन्न नहीं है। यह आभासमात्र एवं मनका विलासमात्र है; अतः शून्य (असत्) रूपमें ही स्थित है। मनका संकल्पमात्र ही इसका स्वरूप है। जहाँ भी यह प्रतीत होता है, वहाँ स्वप्नमें देखे गये नगरके समान शून्यरूप ही है, केवल आकाशरूपमें ही स्थित है। शरीर आदिके रूपमें जो ये तीनों लोक दिखायी देते हैं, वे सब-के-सब मनसे ही कल्पित हैं। जैसे पदार्थोंके देखनेमें नेत्र कारण है, उसी प्रकार उनके स्मरणमात्रमें मन कारण है (अतः मनःकल्पित यह जगत् अतीतकी स्मृतिके ही तुल्य है। स्मरणकालमें वह पदार्थरूपसे विद्यमान या उपलब्ध नहीं है)। श्रीराम ! मनकी इस अद्भुत शक्तिको तो देखो; उसने अपनेसे उत्पन्न हुए इस शरीरको अपनी भावना या संकल्पके द्वारा ही प्राप्त किया है। इसलिये लोग उस मनकी कल्पनाको सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न समझते हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्राणी मनके द्वारा अपने संकल्पसे ही रचे गये हैं। अपने संकल्पके शान्त होनेपर तैलरहित दीपककी भाँति वे सब शान्त हो जाते हैं। महामते ! देखो, यह सारा जगत् आकाशके समान शून्य, मनकी कल्पनामात्रसे विकसित तथा दीर्घकालीन स्वप्नके तुल्य मिथ्या ही प्रकट हुआ है। विशुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! इस जगत्में कभी कोई वस्तु वास्तवमें न उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है। यहाँ जो जन्म और मरण दीखते हैं, वे सब मिथ्या ही हैं। जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंका ताप बढ़नेसे उसमें मृगतृष्णा (जल) का दर्शन होता है, उसी प्रकार मनके संकल्पसे ये ब्रह्मा आदि सभी प्राणी बिना हुए ही दिखायी देते हैं। संसारमें जितनी आकार राशियाँ दिखायी देती हैं, वे सब-की-सब दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति असत् हैं, मिथ्याज्ञानकी घनीभूत मूर्तियाँ हैं तथा मनोरथकी भाँति संकल्पमें ही प्रकट हुई हैं (वास्तवमें इनकी सत्ता नहीं है)। जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले पुरुषको नदीके तटवर्ती वृक्ष और पहाड़ आदि मिथ्या ही चलते हुए प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार इन दृश्य आकारोंकी परम्परा नित्य असत्य होती हुई ही सत्य-सी प्रकट दिखायी देती है। मायासे ही जिसकी ठठरी रची गयी है और मनके मननसे ही जिसका निर्माण हुआ है, ऐसा जो यह दृश्य जगत् है, इसे इन्द्रजाल ही समझो। यह सत्य नहीं है, तो भी सत्यके समान स्थित है। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है। फिर इसके लिये उससे भिन्न होनेका प्रसङ्ग ही कहाँ है। यदि कोई प्रसङ्ग है तो कौन और कैसा है ! वह भिन्नता या भेदभावना कहाँ स्थित है ? 'यह पर्वत है, यह ठूँठा वृक्ष है' इत्यादि रूपसे जो जगत्के आडम्बरका विलास है, वह मनकी भावनाके दृढ़ होनेसे असत् होता हुआ भी सत्-सा दृष्टिगोचर होता है। जैसे महान् आयोजनोंसे पूर्ण स्वप्न भ्रम ही है, वास्तविक नहीं, उसी प्रकार मनके द्वारा रचे गये इस जगत्को भी दीर्घकालीन स्वप्न ही समझो। जो मूढ़ चित्त मानव अपने संकल्पसे उत्पन्न हुई मनोरथमयी सम्पत्तिको स्वरूपसे युक्त (सत्य) समझकर उसका अनुसरण करता है, वह एक-