भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


देखता है। पिशाचका भ्रम होनेसे मनुष्य रातको स्वप्नमें पिशाचोंको ही देखने लगता है। जैसे प्रतिदिन क्षीण होता हुआ चन्द्रमा अपने पूर्ण होनेकी आशाको कभी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार दरिद्रता आदिसे पीड़ित होनेपर भी उद्योगशील श्रेष्ठ पुरुष उदारगतिका परित्याग नहीं करता। वास्तवमें तो न यहाँ बन्धन है और न मोक्ष है, न बन्धनका अभाव है न बन्धनकी सत्ता ही है। इन्द्रजाल-लताकी भाँति यह झूठी माया ही प्रकट हुई है। बन्धन और मोक्षकी अवस्थाओंसे तथा द्वैत और अद्वैतसे रहित यह सम्पूर्ण विज्ञानानन्दमयी ब्रह्म-सत्ता ही है—ऐसा निश्चय ही परमार्थ है। यह जगत् परमात्माका स्वरूप ही है, ऐसा ज्ञान हुए बिना यह दृश्य जगत् दुःख देनेवाला ही होता है और यदि वैसा ज्ञान हो गया तो यह दृश्य मोक्ष प्रदान करनेवाला होता है। जल भिन्न है और तरङ्ग भिन्न, इस प्रकार अनेकता और भिन्नताका बोध अज्ञान है। जल ही तरङ्ग है, इस प्रकार एकत्वबोधसे यथार्थ ज्ञान सिद्ध होता है। जैसे स्नेहरहित बन्धुके मिलने और बिछुड़नेसे मनुष्यको न सुख होता है न दुःख, उसी प्रकार परमात्माका तात्त्विक ज्ञान हो जानेपर इस पाञ्चभौतिक शरीरके रहने या बिछुड़नेसे पुरुष सुख या दुःखसे लिप्त नहीं होता। वासना-रहित एवं शान्तचित्त हुआ अपने देह-नगरका स्वामी जीवात्मा आक्षेप (संकोच)-शून्य, सर्वव्यापी और सबका अधिपति हो जाता है। चित्तके सर्वथा विगलित (शान्त) हो जानेपर अपने दोषोंका त्याग करके धीर हुई बुद्धिसे युक्त पुरुष मृत्यु और जन्म होनेपर प्राप्त होनेवाली पारलौकिक और ऐहलौकिक नीरस गतियोंपर दृष्टिपात करके विवेक—विचारद्वारा परमात्मारूपी दीपक पाकर तापरहित हो अपने देहरूपी नगरमें आनन्दपूर्वक प्रतिष्ठित होता है। (सर्ग ३४-३५)

सर्वत्र और सभी रूपोंमें चेतन आत्माकी ही स्थितिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे जो तरङ्गें भविष्यमें प्रकट होनेवाली हैं और अभी व्यक्त नहीं हुई हैं, वे समुद्रके जलमें अभिन्नरूपसे स्थित हैं, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मामें भावी सृष्टियाँ उस सत्स्वरूप परमात्मासे पृथक् नहीं हैं; क्योंकि उनकी स्वतः सत्ता नहीं है, परमात्माकी सत्तासे ही उनकी सत्ता है। जैसे आकाश सर्वत्र व्यापक होकर भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण दृष्टिमें नहीं आता, उसी प्रकार निरवयव शुद्ध चेतन परमात्मा सर्वव्यापी होनेपर भी दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे जलमय समुद्रमें जो नाना प्रकारकी असंख्य तरङ्गें उठती हैं, उनका वह नानात्व जलसे पृथक् भाव-विकारवाला नहीं है, उसी प्रकार चैतन्य ब्रह्मस्वरूप चिन्मय समुद्रमें 'तू', 'मैं', 'यह', 'वह' इत्यादि रूपसे जो प्रचुर नानात्वरूपमें जगत् भासित होता है, वह उस ब्रह्मरूप चैतन्य-सिन्धुसे पृथक् नहीं है। वास्तवमें चेतन परमात्मा न अस्त होता है न उदित, न उठता है न खड़ा होता या बैठता है, न आता है न जाता है, न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। रघुनन्दन ! वह निर्मल चेतन परमात्मा स्वयं अपने आपमें ही स्थित है। वही भ्रमसे प्रतीत होनेवाले जगत् नामक प्रपंचके रूपमें विस्तारको प्राप्त हुआ है। जैसे तेज ही तेजःपुञ्ज (सूर्य आदि) के रूपमें और जल ही जलराशि (समुद्र आदि) के रूपमें स्फुरित होता है, उसी प्रकार चेतन परमात्मा ही अपने स्पन्दनभूत सृष्टिके रूपमें स्फुरित हो रहा है।

चेतन परमात्मा ही आकाशरूपसे अवकाश प्रदान करता है, जिससे अङ्कुरको बाहर निकलने या फैलनेका अवसर मिलता है। स्पन्दात्मक वायुरूपसे वह उसका आकर्षण करता है, जिससे अङ्कुर बाहर निकलता है। वही जलरूप होकर रसरूपसे अङ्कुरको स्नेहयुक्त बनाता है। वही सुदृढ़ पृथ्वीरूपसे उस अङ्कुरको दृढ़ता प्रदान