संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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मनोनिग्रहके उपाय—भोगेच्छा-त्याग, सत्सङ्ग, विवेक और आत्मबोधके महत्त्वका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिन्होंने अविद्याके घनीभूत विलासोंसे विषयोंकी ओर उन्मुख हुए अपने मनको जीत लिया है, उन महाशूर श्रेष्ठ पुरुषोंकी ही सदा विजय होती है। सब प्रकारके उपद्रवोंको प्राप्त करानेवाले इस संसारके दुःखको निवारण करनेका एकमात्र उपाय यही है कि अपने मनको वशमें किया जाय। ज्ञानका जो सारभूत सर्वस्व है, उसे बताता हूँ; उसे सुनकर हृदयमें धारण करना चाहिये। भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है। जैसे जहाँ काँटोंके बीज बिखेर दिये गये हैं, वह भूमि काँटोंके समुदायको ही उत्पन्न करती है, उसी प्रकार वासनासे आवृत्त हुई बुद्धि केवल दोषोंको ही जन्म देती है। जिसमें वासना-समूहका कोई लगाव नहीं है, अतएव जहाँ राग और द्वेष नहीं देखे गये हैं, वह चाञ्चल्यरहित बुद्धि धीरे-धीरे परम शान्तिको प्राप्त हो जाती है। जैसे जहाँ उत्तम बीज बोया गया है, वह भूमि समयपर श्रेष्ठ फल देनेवाले पौधोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार शुभ बुद्धि दोषरहित, शुभ एवं उत्तम गुणोंको ही सदा प्रकट करती है। जब शुभ भावोंके अनुसंधानसे मन प्रसन्न (शुद्ध) हो जाता है और धीरे-धीरे मिथ्याज्ञानरूपी घने मेघ शान्त हो जाते हैं, सुजनतारूपी चन्द्रमा जब शुक्लपक्षकी भाँति उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होने लगता है और आकाशमें सूर्यके तेजकी भाँति पुण्यमय विवेकका प्रसार हो जाता है, अन्तःकरणरूपी बाँसके भीतर धैर्यरूपी मोतीकी वृद्धि होने लगती है, वसन्त ऋतुमें चटकीली चाँदनीके प्रसारसे चरितार्थ होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति जब अन्तःकरणकी स्थिति आत्मज्ञानजनित परमानन्दकी प्राप्तिसे सर्वथा सफल हो जाती है, शीतल छायावाले सत्सङ्गरूपी फलवान् वृक्ष जब फलने लगते हैं तथा ध्यान-समाधिरूप सरल वृक्ष जब आनन्दमय सुन्दर रस टपकाने लगता है, उस समय मन निर्द्वन्द्व, निष्काम और उपद्रवशून्य हो जाता है। उसके चपलताकूपी अनर्थ तथा शोक, मोह और भयरूपी रोग शान्त हो जाते हैं। शास्त्रोंके अर्थके विषयमें उसका सारा संदेह दूर हो जाता है। उसमें सभी सांसारिक पदार्थोंको देखनेकी उत्कण्ठाका अभाव हो जाता है। उसकी कल्पनाओंके जाल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। वह मोहरहित एवं वासनाशून्य हो जाता है। उसमें आकाङ्क्षा, उपाक्रोश (परनिन्दा), अपेक्षा और दुश्चिन्ताका अभाव हो जाता है। वह शोकरूपी कुहरेसे रहित और आसक्तिशून्य होता है तथा उसके हृदयकी अज्ञानकी गाँठें खुल जाती हैं।
विशुद्ध आत्मा न तो संसारी पुरुष है, न शरीर है और न रुधिर ही है; शरीर आदि सब जड़ हैं, किंतु शरीरी (आत्मा) आकाशके समान निर्लेप है। जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही बन्धनके लिये रेशमी तन्तुओंका जाल रच लेता है, उसी प्रकार जीवात्मा मनमें विकल्प-वासनाओंका प्रसार करके अपने बन्धनके लिये सुदृढ़ जगत्रूप जालकी रचना कर लेता है। जीवात्मा इस वर्तमान देहभ्रमका त्याग करके फिर दूसरे देश और दूसरे कालमें अन्यदेहभावको धारण करता है; जीवात्माके मनमें जैसी वासना होती है, वैसा ही शरीर उत्पन्न होता है। जीवात्माका चित्त जैसी वासना लेकर सोता है, रातको स्वप्नमें वैसा ही बनकर रहता है। इमलीका बीज यदि शहदके रससे सींचा जाय तो अङ्कुर आदिके क्रमसे वृक्ष बनकर फलनेके समय भी वह उस मधुसे अनुरञ्जित होकर मधुर फल ही देता है और वही बीज यदि विषके प्रतिनिषिभूत धतूरे और करञ्ज आदि लताके पीसे हुए चूर्णके रससे सींचा जाय तो उसका फल कडुवा ही होता है। महती शुभ वासनासे मनुष्यका चित्त महान् होता है। मनुष्य 'मैं इन्द्र हूँ' इस प्रकारका मनोरथ होनेपर इन्द्ररूपमें प्रतिष्ठित होनेका स्वप्न देखता है। इसी तरह मनुष्यका क्षुद्र वासनासे वासित हुआ चित्त तुच्छ क्षुद्रताको
सं० यो० व० अं० ९—