संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मुख्य विकार बढ़ रहा है। जिस पुरुषने अज्ञानसे आरोपित अहंकाररूपी वृक्षके अङ्कुरको विवेकपूर्वक विचारसे संस्कृत मनरूपी हलके द्वारा जोतकर उखाड़ फेंका है, उसके आत्मारूपी खेतमें संसार-तापका नाशक एवं सहस्रों शाखाओंसे युक्त अच्छेद्यज्ञानरूपी वृक्ष बढ़ता और फलता है। जिस नराधमको अहंकाररूपी पिशाचने पकड़ लिया है, उसके उस पिशाचको मार भगानेके लिये विवेकके बिना न कोई शास्त्र समर्थ हैं न मन्त्र।
श्रीरामजीने पूछा--भगवन् ! ब्रह्मन् ! कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे अहंकार नहीं बढ़ता ? आप संसाररूपी भयकी शान्तिके लिये वह उपाय मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा--रघुनन्दन ! आत्मा चैतन्यमय दर्पणके समान शुद्ध है। उसमें उसके पूर्वोक्त शुद्ध स्वरूपका निरन्तर स्मरण करनेसे अहंकार नहीं बढ़ता। यह जगत् झूठे इन्द्रजालकी शोभाके समान है। इसमें अनुराग या वैराग्यसे मेरा क्या प्रयोजन है--ऐसा मनमें विचार करते रहनेसे अहंकार उत्पन्न ही नहीं होता। श्रीराम ! इस त्रिलोकीमें तीन प्रकारके अहंकार होते हैं। उनमें दो प्रकारके अहंकार तो श्रेष्ठ हैं, किंतु तीसरा त्याज्य है। मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ! मैं ही यह सम्पूर्ण विश्व हूँ। मैं ही अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हूँ। मेरे सिवा दूसरा कुछ नहीं है--इस तरहका जो अहंकार है, उसे उत्तम समझना चाहिये। यह अहंकार जीवन्मुक्त पुरुषकी मोक्ष-प्राप्तिके लिये है। यह बन्धनमें डालनेवाला नहीं होता। 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े करनेपर जो सौवाँ हिस्सा होता है, उसीके समान मुझ जीवात्माका सूक्ष्म स्वरूप है अर्थात् मैं अवयवसे रहित हूँ, अतएव सबसे भिन्न हूँ।' इस प्रकारका जो अनुभव है, वही दूसरा शुभ अहंकार है। वह भी साधकके मोक्षके लिये ही है, बन्धनके लिये नहीं। उपर्युक्त अहंकारके नामसे केवल कल्पना होती है। वास्तवमें वह नहीं है। यह हाथ-पैर आदिसे युक्त शरीर ही मैं हूँ, इस प्रकारका जो मिथ्या अभिमान है, वही तीसरा अहंकार है। वह लौकिक एवं तुच्छ ही है। उस दुष्ट अहंकारको त्याग देना ही चाहिये; क्योंकि वह सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। पहले बताये गये जो दो अहंकार हैं, उनको स्वीकार करके 'मैं देह नहीं हूँ' ऐसा विचारसे भी निश्चय कर लेनेके पश्चात् उन दोनोंको भी अन्तिम तीसरे अहंकारकी भाँति ही लौकिक समझकर त्याग देना उचित है--ऐसा प्राचीन महापुरुषोंका मत है। प्रथम दो अहंकार अलौकिक हैं। उन दोनोंको अङ्गीकार करके तीसरे लौकिक अहंकारका, जो दुःख देनेवाला है, त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि यह तीसरा अहंकार सर्वथा त्यागने ही योग्य है। इस दुःखदायी अहंकारको त्यागकर पुरुष जैसे-जैसे ज्ञानमें स्थित होता जाता है, वैसे-ही-वैसे वह परमात्मभावकी ओर बढ़ता जाता है। निष्पाप रघुनन्दन ! यदि पुरुष पूर्वोक्त दो अहंकारोंकी भावना करता रहे तो उसे परमपद प्राप्त हो जाता है; और यदि उनका भी त्याग करके सम्पूर्ण अहंकारोंसे रहित हो जाय तो वह अत्यन्त उच्च पद (परमात्मभाव)-में शीघ्र ही आरूढ़ हो जाता है। महामते ! जिस जीवका अहंकार शान्त हो गया है, उसे भोग रोगके समान जान पड़ते हैं। जैसे अच्छी तरहसे तृप्त हुए पुरुषको विषमिश्रित रस स्वादिष्ट नहीं प्रतीत होते, उसी प्रकार उसे भोग अच्छे नहीं लगते। रघुनन्दन ! अहंकारकी स्मृतिका भी सर्वथा त्याग करके अतिशय पुरुषार्थरूप प्रयत्नके द्वारा भवसागरको पार किया जाता है। पहले 'सब मैं ही हूँ और ये सब मेरे हैं' ऐसा समझकर फिर 'यह देह आदि मैं नहीं हूँ और इस देहके सम्बन्धी भी मेरे कुछ नहीं हैं' ऐसा विचार करके उससे सब प्रतिबन्धकोंका नाश होनेसे प्रतिष्ठाको प्राप्त हुए स्तुत्य आत्मज्ञानको अपने हृदयमें उतारकर महात्मा पुरुष परम पदको प्राप्त कर लेता है।
( सर्ग ३३ )