भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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स्थिति-प्रकरण ] * शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारके त्यागसे मोक्षकी प्राप्ति * २२९

दीन, शुभ फलसे रहित जो धन, पुत्र आदि लौकिक वस्तुओंकी चिन्ता है, वह दीर्घकालतक बनी रहनेवाली प्रगाढ़ महानिद्रा ही है। उसे त्यागकर सचेत हो जाना चाहिये—विशुद्ध ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर लेना चाहिये। व्यवहारपरायण पुरुषोंके विचारसे लोकमर्यादाके अनुसार तथा शास्त्र और सदाचारके अनुकूल कर्म करके उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जिसका चरित्र सदाचारसे सुन्दर तथा बुद्धि विवेकशील है और संसारके सुख-फलरूपी दुःखद दशाओंमें जिसकी आसक्ति नहीं है, उस पुरुषके यश, गुण और आयु—ये तीनों ही वसन्त ऋतुकी लताओंके समान उत्तम फल देनेके लिये शोभाके साथ विकासको प्राप्त होते हैं। (सर्ग ३२)


शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारकी बन्धकता और उसके त्यागसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! समस्त साधनोंका अधिक अभ्यास ही सफल होता है। इसलिये सर्वत्र और सदा साधन करनेसे सब प्रकारके फलोंकी प्राप्ति सम्भव है; क्योंकि इष्ट, मित्र, स्वजन एवं बन्धु-बान्धवोंको आनन्द देनेवाले नन्दीने तालाबके किनारे आराधना करके भगवान् शिवको पाकर मृत्युपर भी विजय पा ली। दानव-सेना और धन-धान्यसे सम्पन्न बलि आदि दानवों-द्वारा देवता उसी तरह कुचल दिये गये, जैसे हाथियोंके द्वारा कमलोंसे भरे हुए सरोवर मथ डाले जाते हैं; किंतु फिर अतिशय प्रयत्न करनेके कारण देवताओंने सबसे उत्कृष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। राजा मरुत्तके यज्ञमें महर्षि संवर्तने ब्रह्माजीकी तरह देवताओं और असुरों-सहित दूसरी सृष्टि ही रच डाली थी। (अतिशय साधन और प्रयत्नसे ही उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हुई थी।) शास्त्रीय विधिसे महान् साधनोंके अनुष्ठानमें अत्यन्त संलग्न रहनेवाले विश्वामित्रने बारं बार की गयी कठोर तपस्या-द्वारा दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। राजकुमारी सावित्री अपने पति-प्रेमरूप पातिव्रत्य धर्मके प्रभावसे यमराजको जीतकर उत्तम वाणीका प्रयोग करके संतुष्ट किये हुए यम देवताकी अनुमतिसे अपने पति सत्यवान्‌को लौटा लायी। संसारमें ऐसा कोई शास्त्रीय शुभ कर्मका अतिशय अनुष्ठान नहीं है, जिसका फल स्पष्टरूपसे प्राप्त न होता हो। अपने मनमें ऐसा विचार करके कल्याणकामी पुरुषोंको सर्वोत्कृष्ट प्रयत्नसे सुशोभित होना चाहिये। सम्पूर्ण सुख-दुःख आदि अवस्थाओंकी भ्रम-दृष्टियोंका मूलोच्छेद करनेवाला परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही है। अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये साधनका अतिशय अभ्यास करना चाहिये। संसार-सागरको पार करनेके लिये सत्पुरुषोंके सङ्ग और सेवाके बिना तप, तीर्थ तथा शास्त्राभ्यास आदि कोई भी साधन सफल नहीं होते। जिसके सेवनसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हों और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।

जबतक अन्तःकरणके आकाशमें चैतन्यरूपी चाँदनी अहंकाररूपी मेघमालासे आच्छादित है, तब-तक वह परमार्थरूपिणी कुमुदिनीको विकसित नहीं कर सकती। जबतक हृदयाकाशमें अहम्भावका बादल उमड़-घुमड़कर बढ़ता जाता है, तभीतक तृणारूपी कुटज-कुसुमकी मञ्जरी विकासको प्राप्त होती है। वह मिथ्याकल्पित अहंकार दूषित अन्तःकरणमें अनन्त संसार-बन्धनमें डालनेवाले मोहको जन्म देता है। 'यह देह मैं हूँ' इस प्रबल मोहसे बढ़कर अनर्थकारी दूसरा अज्ञान इस संसारमें न कभी हुआ है और न होगा ही। इस संसारमें यह जो कुछ भी सुख-दुःखरूपी विकार आता है, उसके रूपमें अहंकार-चक्रका ही