भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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स्थिति-प्रकरण ] * ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण * २३३

करता है और तेजरूप होकर उसे अपना रूप देता है, जिससे वह दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार वह परमात्मा स्थावर-जङ्गम जगत्‌पर अनुग्रह करता है। वही परमात्मा हेमन्त आदि कालरूपसे प्रकट होकर जौ आदि अङ्कुरोंके विरोधी तृण आदिकी उत्पत्तिमें बाधक बनता है और उन अङ्कुरोंकी उत्पत्तिके अनुकूल वातावरण तैयार करता है। वह चेतन तत्त्व परमात्मा ही फूलोंमें धीरे-धीरे केसरका संचय करके गन्धरूपमें प्रकट होता है। मिट्टीके भीतर रसरूपताको प्राप्त हो वही वृक्षकी वृद्धिके द्वारा स्थाणुभाव (मूल और तनेके रूप) को प्राप्त होता है। उस मूलमें स्थित हुए सुन्दर रसलेश ही फलके रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही पल्लवोंमें प्रविष्ट हो रेखाएँ बनकर पत्र आदिके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। वह चेतन तत्त्व परमात्मा ही वृक्षोंमें इन्द्रधनुषके समान नूतनताका सम्पादन करता हुआ उनपर अनुग्रह करता है। स्थिरतारूप चतुरताको प्रकट करनेवाली नियतिरूपसे वही स्थितिको प्राप्त होता है। उसी परमात्माके अनुग्रहसे धारणरूप धर्मवाली यह धीर वसुन्धरा प्रलयकालतक स्थित रहती है।

इस प्रकार सब ओर स्थित और सुस्थिर आकारवाली ये समस्त संसार-पंक्तियाँ, जो ब्रह्मकी स्वभावभूत हैं, बार-बार आती-जाती रहती हैं। यह सारा जगत् एक दूसरेके प्रति कारणभावको प्राप्त होकर अपने अधिष्ठानभूत चैतन्यके सकाशसे स्वयं ही उत्पन्न हुआ है और एक-दूसरेके द्वारा नष्ट होता हुआ यह उस अधिष्ठानभूत चैतन्यमें स्वयं ही लीन होता है। जैसे अगाध जलमें होनेवाला स्पन्दन भी स्वतः अस्पन्दन ही है; क्योंकि वहाँ जलसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार चेतन आत्मामें प्रकट हुआ सद्सद्रूप जगत् भी वास्तवमें अप्रकट ही है; क्योंकि वह सब ज्ञानसे चेतन-स्वरूप ही अनुभूत होता है। (सर्ग ३६-३७)


ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, वासनाके कारण ही कर्तृत्वका प्रतिपादन

तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसी परिस्थितिमें सुख-दुःख आदि भोग देनेवाले कर्मोंमें या ध्यान-समाधिमें तत्त्वज्ञानियोंका जो यह कर्म या कर्तृत्व दिखायी देता है, वह वास्तवमें असत् है; क्योंकि उसमें कर्तापन नहीं है। परंतु मूर्खोंका वह कर्म (कर्तृत्वाभिमान होनेके कारण) असत् नहीं है (यही ज्ञानी और अज्ञानीमें अन्तर है)। पहले यह विचार करना चाहिये कि कर्तृत्व किसका नाम है। अन्तःकरणमें स्थित जो मनकी वृत्ति है, उसका निश्चय—अमुक वस्तु ग्रहण करने योग्य है, इसका विश्वास वासना कहलाता है। वह वासना ही 'कर्तृत्व' शब्दसे प्रतिपादित होती है; क्योंकि वासनाके अनुसार ही मनुष्य चेष्टा करता है और चेष्टाके अनुसार ही फल भोगता है। अतः कर्तृत्वसे फलभोक्तृत्व होता है—यह सिद्धान्त है। कहा भी है—'पुरुष कर्म करे या न करे, वह स्वर्गमें या नरकमें, सर्वत्र उसीका अनुभव करता है जैसी उसके मनमें वासना होती है। इसलिये जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, वे पुरुष कर्म करें या न करें, तो भी उनमें वासना होनेके कारण कर्तृत्व अवश्य है। इसके विपरीत जिन्हें तत्त्वज्ञान हो गया है, वे कर्म करें तो भी उनमें कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि वे वासनासे सर्वथा शून्य हैं। तत्त्वज्ञानीकी वासना शिथिल हो जाती है, इसलिये वह कर्म करता हुआ भी उसके फलकी इच्छा नहीं रखता। उसकी बुद्धि कर्तृत्वाभिमान और आसक्तिसे रहित होती है, अतः वह अनासक्त भावसे केवल चेष्टामात्र करता है। उसे जो कुछ भी प्रारब्धके अनुसार कर्मोंका फल प्राप्त होता है, वह उस सारे कर्म-फलको यह आत्मा ही है—ऐसा अनुभव करता है। परंतु जिसका मन फलासक्तिमें डूबा हुआ है, वह कर्म न करके भी कर्ता ही माना जाता