संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ * अविच्छिन्नविदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
है। मन जो कुछ करता है, वही किया हुआ होता है। मन जिसे नहीं करता, वह किया हुआ नहीं होता; अतः मन ही कर्ता है, शरीर नहीं। चित्तसे ही यह संसार प्राप्त हुआ है, इसलिये यह चित्तमय ही है, केवल चित्तमात्र होकर चित्तमें स्थित है—यह बात पहले विचार-पूर्वक निर्णीत हो चुकी है। सम्पूर्ण विषय और विभिन्न प्रकारकी चित्तवृत्तियाँ—ये सब शान्त होकर जब वासनारूप हो जाते हैं, तब उस वासनारूप उपाधिसे युक्त जीवात्मा ही रहता है। उनमेंसे जो आत्मतत्त्वके ज्ञाता हैं, उनका मन वर्षाकालमें मृगतृष्णाके जल और प्रचण्ड धूपमें हिमकणके समान गलकर जब परम शान्त हो जाता है, तब तुरीय दशाको प्राप्त हो, उसी परमात्मरूपमें स्थित हो जाता है। विद्वान् लोग ज्ञानियोंके मनको न तो आनन्दमय मानते हैं और न अनानन्दमय ही। उनका मन न चल है, न अचल है। न सत् है, न असत् है और न इनका मध्य ही है। बल्कि वह इन सबसे विलक्षण अनिर्वचनीय है। जैसे हाथी छोटी तलैयामें नहीं डूबता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष वासनामय चेष्टारसमें नहीं मग्न होता। मूर्खका मन तो भोगोंको ही देखता है, परमार्थ-तत्त्वको नहीं। तत्त्वज्ञानीकी चित्तवृत्ति सांसारिक विपत्तिमें भी प्रसन्न ही रहती है। वह चाँदनीकी तरह भुवनमात्रको प्रकाशित करती है। चित्तके संयोगके बिना कर्म करता हुआ भी ज्ञानी अकर्ता ही है; क्योंकि वह कर्म मनको लिप्त नहीं करता। वह यत्नपूर्वक किये हुए हाथ-पैर आदिके संचालनरूप कर्मके फलको भी नहीं भोगता। बालक मनसे ही नगरका निर्माण और उसकी सफाई एवं सजावट करता है तथा उस मनःकल्पित नगरको खेल-खेलमें ही अकृत-सा अनुभव करता है; उसको उपादेयरूपसे नहीं ग्रहण करता। उसके सुख-दुःखको स्वाभाविक-सा देखता है। मनके द्वारा किये गये नगरके विध्वंसको वास्तविक विध्वंस समझकर खेल-खेलमें दुःखका-सा भी अनुभव करता है। साथ ही यह भी समझता रहता है कि यह वास्तविक दुःख नहीं है। उसी प्रकार ज्ञानी कर्म करता हुआ भी वास्तवमें उससे लिप्त नहीं होता। जिनका मन पूर्ण आत्मामें ही संलग्न है, उन ज्ञानियोंकी दृष्टिसे तो वस्तुतः संसारमें मोक्ष नहीं है। जिनका मन आत्मामें संलग्न नहीं है, उन्हीं लोगोंकी दृष्टिसे यह बन्धन-मोक्ष आदि सब कुछ है।
किंतु वास्तवमें तो न बन्धन है न मोक्ष है, न बन्धनका अभाव है और न बन्धनके कारणभूत वासना आदि ही हैं। परमात्मतत्त्वका ज्ञान न होनेसे ही यह दुःख है। यथार्थ ज्ञानसे उसका लय हो जाता है।
(सर्ग ३८)
सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी परब्रह्मरूपताका प्रतिपादन; अत्यन्त मूढको नहीं, विवेकी जिज्ञासुको ही 'सर्वं ब्रह्म'का उपदेश देनेकी आवश्यकता तथा बाजीगरके दिखाये हुए खेलकी भाँति मायामय जगत्के मिथ्यात्वका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! महात्मन् ! ऐसी स्थितिमें यदि वस्तुतः बन्धन और मोक्ष कल्पित ही हैं, एकमात्र परब्रह्म ही सर्वत्र विद्यमान हैं तो बिना दीवारके चित्रकी भाँति इस निराधार सृष्टिका आगमन कहाँसे हुआ ? यह कृपापूर्वक बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राजकुमार ! ब्रह्मतत्त्व ही इस सारी सृष्टिके रूपमें विद्यमान है; क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है। इसलिये उस ब्रह्ममें सारी शक्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। सत्त्व, असत्त्व, द्वित्व, एकत्व, अनेकत्व, आदित्व और अन्तत्व—ये परस्पर विरुद्ध-से प्रतीत होनेवाले सारे भाव परब्रह्ममें हैं। परंतु वे उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे समुद्रका जल-प्रवाह उल्लास एवं विकासको प्राप्त हो उत्ताल तरङ्गों-