संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थिति-प्रकरण ] ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन २३५
द्वारा अपनी नानाकारताका दर्शन कराता हुआ प्रकट होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्म चित्तका तथा चित्तस्वरूप होनेके कारण कर्ममयी, वासनामयी और मनोमयी सारी शक्तियोंका संचय, प्रदर्शन, धारण, उत्पादन और संहार करता है। समस्त जीवोंकी सब ओर फैली हुई सारी दृष्टियोंकी और समस्त पदार्थोंकी परब्रह्मसे ही निरन्तर उत्पत्ति होती है। जैसे लहरें समुद्रसे ही उत्पन्न होती और उसीमें लीन हो जाती हैं, इसलिये सदा समुद्ररूप ही हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ परमात्मासे उत्पन्न होकर उसीमें लीन होते हैं। फलतः चिन्मय परमात्मासे उत्पन्न होनेके कारण वे परमात्मरूप ही हैं।
निष्पाप रघुनन्दन ! यह सब निर्मल ब्रह्म ही विराजमान है। यहाँ मल नामक कोई वस्तु नहीं है। समुद्रमें तरङ्ग-समूहोंके रूपसे जल ही स्फुरित होता है, मिट्टी नहीं। रघुकुलतिलक ! यहाँ एकमात्र परब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी कल्पना ही नहीं है, जैसे अग्निमें उष्णताके सिवा और कोई कल्पना ही नहीं है। जिसकी बुद्धि पूर्णरूपसे व्युत्पन्न नहीं हुई है—जिसमें आधी समझ और आधी मूढ़ता है, उसे 'यह सब ब्रह्म ही है' यह उपदेश अच्छा नहीं लगता। वह दृश्योंको उपस्थित करनेवाली भोगदृष्टिसे सदा दृश्य पदार्थोंकी ही भावना करता हुआ नष्ट (तत्त्वज्ञानरूप परमार्थसे भ्रष्ट) हो जाता है। किंतु जो तत्त्वज्ञानरूप परमार्थ-दृष्टिको प्राप्त है, उस पुरुषके भीतर विषय-भोगकी इच्छा नहीं उत्पन्न होती। उसके लिये तो 'यह सब ब्रह्म ही है' ऐसा समयोचित उपदेश भी उपयुक्त होता है। जिसकी बुद्धि पूर्णतया व्युत्पन्न नहीं है, ऐसे शिष्यको उन सद्गुणोंद्वारा शुद्ध करे, जिनमें शम (मनोनिग्रह) और दम (इन्द्रियनिग्रह) की प्रधानता हो। तत्पश्चात् यह उपदेश दे कि यह सब कुछ ब्रह्म है तथा तुम भी विशुद्ध ब्रह्म ही हो। जो अज्ञानीको अथवा आधी समझवाले पुरुषको 'सर्वं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म है) यह उपदेश देता है, उसने मानो उस शिष्यको महान् नरकोंके जालमें डाल दिया। जिसकी बुद्धि पूर्णतया व्युत्पन्न है, जिसकी भोगेच्छा नष्ट हो गयी है और कामना सर्वथा मिट गयी है, उस महात्मामें अविद्यारूपी मल नहीं है। अतः उसीके लिये 'सर्वं ब्रह्म' का उपदेश देना उचित है। जो शिष्यकी परीक्षा लिये बिना ही उसे उपदेश देता है, वह अत्यन्त मूढ़ बुद्धिवाला उपदेशक महाप्रलय-पर्यन्त नरकको प्राप्त होता है।
ब्रह्म सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वगत और सर्व-स्वरूप है। यह ब्रह्म मैं ही हूँ, यों समझना चाहिये। अपनी मायाद्वारा विचित्र कार्य करनेवाले ऐन्द्रजालिकों (बाजीगरों) को तो तुम देखते ही हो। वे मायाके द्वारा सत्को असत् और असत्को सत् बना देते हैं। उसी प्रकार परमात्मा अमायामयी होकर भी मायामय महान् ऐन्द्र-जालिककी भाँति बनकर सङ्कल्पके द्वारा घटको पट बनाता है और पटको घट। मेरुके सुवर्णमय तटप्रान्तमें लहराते हुए नन्दनवनकी भाँति पत्थरपर लता पैदा करता है और कल्पवृक्षोंपर प्रकट हुए रत्नके गुच्छोंकी भाँति लतामें प्रस्तर पैदा कर देता है तथा आकाशमें सुन्दर वन लगा देता है। गन्धर्वनगरमें दीखनेवाले उद्यानकी भाँति उस भावी जगत्में कल्पनाद्वारा आकाशमें ही नगरकी रचना कर देता है—आकाशको ही नगररूपमें दिखा देता है। व्योमकी नीलिमाको नष्ट-सी करके उसे भूतल बना देता है। गन्धर्वनगरके राजमहलमें बहुत-सी महिषियोंकी भाँति भूतलमें आकाशकी स्थापना कर देता है। पद्मराग-मणिके बने हुए लाल फर्शमें प्रतिबिम्बित हुआ आकाश जैसे आधारकी लालिमासे ही लाल दिखायी देता है, उसी प्रकार जगत्में जो कुछ है, होगा या था, वह सब ब्रह्मकी सत्तासे ही सत्-सा प्रतीत होता है; क्योंकि ईश्वर संकल्पके द्वारा स्वयं व्यक्तरूप हो विचित्र वेश-भूषाको अपनाकर स्वयं अपने आपको दिखलाता है। श्रीराम ! जब कि इस जगत्में एक ही वस्तु सब प्रकारसे सर्वत्र सब रूपोंमें