भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

स्थिति-प्रकरण ] * परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * २३९


प्रकट हुआ। (तात्पर्य यह है कि वह परमात्मनिष्ठ जीव इस शरीर आदिको स्वप्नके तुल्य मिथ्या मानता हुआ ही इसमें रहता है)। निष्पाप श्रीराम ! यह प्रपञ्च दीर्घ-कालतक बने रहनेवाले स्वप्नके समान मिथ्या ही दीखता है, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान तथा पहाड़ी भूमिमें घूमते हुए पुरुषको घूमते दीखनेवाले पर्वतके समान मिथ्या ही दृष्टिगोचर होता है। जिसकी अज्ञानमयी निद्रा टूट गयी है और वासनात्मक भावना गल गयी है, वह ज्ञानवान् पुरुष इस संसाररूपी स्वप्नको देखता हुआ भी नहीं देखता—इसे मिथ्या समझता है। श्रीराम ! जीवोंके स्वभावसे कल्पित यह संसार, जिसकी मोक्ष होनेसे पहले-तक निरन्तर प्राप्ति होती रहती है, अनात्मज्ञानीके ही अंदर सदा सत्य-सा विद्यमान रहता है।

रघुनन्दन ! यह जगत् यद्यपि सब प्रकारसे सम्पन्न दिखायी देता है, तथापि यहाँ वास्तवमें कुछ भी सम्पन्न नहीं है। यह आभासमात्र एवं मनका विलासमात्र है; अतः शून्य (असत्) रूपमें ही स्थित है। मनका संकल्पमात्र ही इसका स्वरूप है। जहाँ भी यह प्रतीत होता है, वहाँ स्वप्नमें देखे गये नगरके समान शून्यरूप ही है, केवल आकाशरूपमें ही स्थित है। शरीर आदिके रूपमें जो ये तीनों लोक दिखायी देते हैं, वे सब-के-सब मनसे ही कल्पित हैं। जैसे पदार्थोंके देखनेमें नेत्र कारण है, उसी प्रकार उनके स्मरणमात्रमें मन कारण है (अतः मनःकल्पित यह जगत् अतीतकी स्मृतिके ही तुल्य है। स्मरणकालमें वह पदार्थरूपसे विद्यमान या उपलब्ध नहीं है)। श्रीराम ! मनकी इस अद्भुत शक्तिको तो देखो; उसने अपनेसे उत्पन्न हुए इस शरीरको अपनी भावना या संकल्पके द्वारा ही प्राप्त किया है। इसलिये लोग उस मनकी कल्पनाको सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न समझते हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्राणी मनके द्वारा अपने संकल्पसे ही रचे गये हैं। अपने संकल्पके शान्त होनेपर तैलरहित दीपककी भाँति वे सब शान्त हो जाते हैं। महामते ! देखो, यह सारा जगत् आकाशके समान शून्य, मनकी कल्पनामात्रसे विकसित तथा दीर्घकालीन स्वप्नके तुल्य मिथ्या ही प्रकट हुआ है। विशुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! इस जगत्में कभी कोई वस्तु वास्तवमें न उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है। यहाँ जो जन्म और मरण दीखते हैं, वे सब मिथ्या ही हैं। जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंका ताप बढ़नेसे उसमें मृगतृष्णा (जल) का दर्शन होता है, उसी प्रकार मनके संकल्पसे ये ब्रह्मा आदि सभी प्राणी बिना हुए ही दिखायी देते हैं। संसारमें जितनी आकार राशियाँ दिखायी देती हैं, वे सब-की-सब दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति असत् हैं, मिथ्याज्ञानकी घनीभूत मूर्तियाँ हैं तथा मनोरथकी भाँति संकल्पमें ही प्रकट हुई हैं (वास्तवमें इनकी सत्ता नहीं है)। जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले पुरुषको नदीके तटवर्ती वृक्ष और पहाड़ आदि मिथ्या ही चलते हुए प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार इन दृश्य आकारोंकी परम्परा नित्य असत्य होती हुई ही सत्य-सी प्रकट दिखायी देती है। मायासे ही जिसकी ठठरी रची गयी है और मनके मननसे ही जिसका निर्माण हुआ है, ऐसा जो यह दृश्य जगत् है, इसे इन्द्रजाल ही समझो। यह सत्य नहीं है, तो भी सत्यके समान स्थित है। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है। फिर इसके लिये उससे भिन्न होनेका प्रसङ्ग ही कहाँ है। यदि कोई प्रसङ्ग है तो कौन और कैसा है ! वह भिन्नता या भेदभावना कहाँ स्थित है ? 'यह पर्वत है, यह ठूँठा वृक्ष है' इत्यादि रूपसे जो जगत्के आडम्बरका विलास है, वह मनकी भावनाके दृढ़ होनेसे असत् होता हुआ भी सत्-सा दृष्टिगोचर होता है। जैसे महान् आयोजनोंसे पूर्ण स्वप्न भ्रम ही है, वास्तविक नहीं, उसी प्रकार मनके द्वारा रचे गये इस जगत्को भी दीर्घकालीन स्वप्न ही समझो। जो मूढ़ चित्त मानव अपने संकल्पसे उत्पन्न हुई मनोरथमयी सम्पत्तिको स्वरूपसे युक्त (सत्य) समझकर उसका अनुसरण करता है, वह एक-