भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२३८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मनका स्वरूप धारण करती है। फिर संकल्पमय मन नाना प्रकारके शरीरोंको धारण करनेमें संलग्न होता है। जैसे गौएँ मदमत्त साँड़के पीछे दौड़ती हैं और जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर भागी जाती हैं, उसी प्रकार इच्छा आदि शक्तियाँ मनका अनुसरण करती हैं, जिससे काम-क्रोध-लोभ-मोहादि दोषोंकी ही वृद्धि होती है। इस प्रकार इच्छा-द्वेष आदि शक्तियोंके बाहुल्यसे युक्त मन शाखा-प्रशाखारूपसे अभिमानकी वृद्धि होनेके कारण घनीभूत अहंकारभावको प्राप्त हो रेशमके कीड़ेकी भाँति स्वेच्छासे ही बन्धनको प्राप्त होता है। जैसे पक्षी स्वयं ही अपने शरीरको जाल आदि फंदोंमें फँसाकर कष्टकारी बन्धनमें डालते और पछताते हैं, उसी तरह मन अपने संकल्पोंके अनुसंधानसे स्वयं ही दुःखदायी बन्धनमें पड़कर इस लोकमें संतप्त होता है।

जैसे पक्षी समुद्रमें गिरा हो, उसी तरह मन घोर दुःखके महासागरमें पड़ा हुआ है, गन्धर्वनगरके समान शून्य जगत्-जालमें अपने बन्धनके हेतुरूप देह आदिपर आसक्ति रखता है, विषयोंकी ओर दौड़ा जाता है और तत्त्वज्ञान आदिके प्रति अविश्वासके समुद्रमें निरन्तर बह रहा है।

जो अनन्त विषयोंमें अनन्त संकल्प-कल्पनाओंकी उत्पत्तिमें हेतु है, उस माया अथवा अविद्याके द्वारा इस जगत्रूपी विशाल इन्द्रजालका विस्तार करनेवाले मूढ़ जीव जलमें आवर्तों (भँवरों) के समान तबतक चक्कर काटते रहते हैं, जबतक उन्हें अपने अनिन्दित—विशुद्ध आत्मस्वरूपका साक्षात्कार नहीं हो जाता। किंतु जब वे साधन करते-करते काल पाकर आत्माका साक्षात्कार करके असत्‌को त्यागकर सत्य ज्ञानको अपनाते हैं, तब परम पदको प्राप्त होकर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते। कुछ अज्ञानी जीव सहस्रों जन्मोंका कष्ट भोगकर विवेकको प्राप्त करके भी मूर्खताके कारण उस संसाररूपी संकटमें ही गिर जाते हैं; कुछ लोग उच्च कुलमें जन्म और साधनकी शक्ति एवं सुविधाको पाकर भी अज्ञान और विषयासक्तिके कारण अपनी तुच्छ बुद्धिसे ही पुनः तिर्यग्योनियोंको प्राप्त होते हैं और तिर्यग्-योनिसे नरकोंमें भी गिरते हैं। कुछ महाबुद्धिमान् सत्पुरुष एक ही जन्मके द्वारा मोक्षरूप ब्रह्मपदमें शीघ्र ही प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रीराम ! कितने ही जीवसमूह तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेते हैं, कितने ही देवयोनियोंको प्राप्त होते हैं, कितने ही नागयोनिको प्राप्त करते हैं। जैसे यह जगत् विशाल दिखायी देता है, वैसे ही अन्यान्य जगत् भी हैं, थे और भविष्यमें भी बहुत-से होंगे। इस ब्रह्माण्डमें लोग जिस व्यवहारसे रहते हैं, उसी व्यवहारसे अन्य ब्रह्माण्डोंमें भी रहते हैं। केवल उनकी आकृतियोंमें अन्तर या विलक्षणता होती है। जैसे नदीकी लहरें परस्पर टकरानेसे परिवर्तित होती रहती हैं, उसी प्रकार विभिन्न सृष्टियाँ अपने सात्त्विक, राजस आदि स्वभाववश परस्पर संघर्षके कारण बदलती रहती हैं। जैसे जलराशि समुद्रमें अनन्त लहरें निरन्तर उठती और विलीन होती रहती हैं, उसी प्रकार उस परमपद-स्वरूप परमात्मामें यह तीनों लोकोंकी रचना आदि मोहमाया व्यर्थ ही विस्तारको प्राप्त हो अनवरत बढ़ती, परिणामको प्राप्त होती और विनष्ट होती रहती है।

( सर्ग ४२-४३ )


परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व, मनोमय होनेके कारण जगत्‌की असत्ता तथा ज्ञानीकी दृष्टिमें सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! इस क्रमसे जिस जीवने परमात्माके स्वरूपमें अपनी स्थिति प्राप्त कर ली, वह अस्थिपञ्जररूप देहको कैसे ग्रहण किये रहता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो यह शरीर आदिके रूपमें स्थावर-जङ्गम जगत् दिखायी देता है, यह आभास-मात्र ही है, अतएव स्वप्नके समान असत् होता हुआ ही

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