भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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स्थिति-प्रकरण ] -- * चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहंकार आदिके रूपमें विस्तार * २३७

कुछ केवल ब्रह्म ही है। सर्वस्वरूप एवं सर्वव्यापी उस अनन्त ब्रह्मपदसे दूसरी कोई वस्तु उत्पन्न हो, यह सम्भव नहीं। जो कुछ ब्रह्मसे प्रकट हुआ है, वह ब्रह्मरूप ही है। इस जगत्में ब्रह्मतत्त्वके बिना कुछ भी होना सम्भव नहीं। निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म ही है। यही परमार्थता—यथार्थ कथन है।

रघुनन्दन ! यह माया ऐसी है, जो अपने विनाशसे ही हर्ष देनेवाली होती है। इसके स्वभावका पता नहीं लगता। ज्ञानकी दृष्टिसे जब इसको देखनेका प्रयत्न किया जाता है, तब यह तत्काल नष्ट हो जाती है। अहो ! संसारको बाँधनेवाली यह माया बड़ी ही विचित्र है। यद्यपि यह असत्य ही है, तथापि इसने अत्यन्त सत्यकी भाँति अपना ज्ञान कराया है। जो पुरुष 'यह जगत् ब्रह्मरूपसे सत्य ही है' अथवा 'मिथ्या होनेके कारण असत्य ही है'—इन दो बातोंमेंसे किसी एकको दृढ़ निश्चयके साथ अपना लेता है और मनमें आसक्ति न रखकर जगत्को स्वप्नभूमिकी भाँति भ्रान्तिमात्र ही देखता है, वह कभी दुःखमें नहीं डूबता। जिसकी इन मिथ्याभूत देह-इन्द्रिय आदिरूप द्वैतभावनाओंमें अहंबुद्धि है, वही दुःखके सागरमें डूबता है। स्वरूप-ज्ञानसे शून्य उस मिथ्यादर्शी पुरुषके लिये सब ओर केवल अविद्या ही विद्यमान है। जैसे जलमें सूखी धूल नहीं होती, उसी प्रकार महान् पुरुष परमात्मामें विकार आदि कोई दोष नहीं होते। अविद्यारूपी नदीमें बहता हुआ आत्मा इस संसारमें आत्माके यथार्थज्ञानके बिना अनुभवमें नहीं आता और वह आत्मज्ञान शास्त्रके तात्पर्यका यथार्थ बोध होनेसे ही प्राप्त होता है। श्रीराम ! परमात्माकी प्राप्तिके बिना अविद्यारूपी नदीका पार नहीं मिलता। वह परमात्माकी प्राप्ति ही अक्षयपद कहलाती है।

(सर्ग ४०-४१)


चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहंकार आदिके रूपमें विस्तार तथा अविद्याके कारण जीवोंके कर्मानुसार नाना योनियोंमें जन्मोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! विभिन्न कल्पनाओं‌द्वारा ही जिसने आकार ग्रहण कर रखा है तथा जो देश, काल और क्रियाके अधीन है, चैतन्यका वही रूप क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्र कहते हैं शरीरको। उसे बाहर और भीतरसे वह पूर्णतया जानता है, इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ञ ही वासनाका संकलन करके अहंकारभावको प्राप्त होता है। अहंकार ही निश्चयात्मकवृत्तिसे युक्त होकर जब निर्णायक एवं विभिन्न कल्पनाओंसे युक्त होता है, तब उसे बुद्धि कहते हैं। संकल्पयुक्त बुद्धि ही मनका स्थान ग्रहण करती है तथा घनीभूत विकल्पोंसे युक्त मन ही धीरे-धीरे इन्द्रियभावको प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष इन्द्रियोंको ही हाथ-पैर आदिसे युक्त शरीर मानते हैं। वह शरीर लोकमें सभीके अनुभवमें आता है, उत्पन्न होता है और जीवित रहता है। इस प्रकार संकल्प-वासनारूपी रस्सीसे जकड़ा और दुःखोंके जालसे व्याप्त हुआ वह जीव अज्ञानसे चित्तता—दृश्यताको प्राप्त होता है। जैसे बेर आदिका फल परिपाकवश अवस्था (रूप, रस आदि गुणोंके परिवर्तन) से ही अन्यरूपताको प्राप्त होता है, उसकी आकृति (जाति) नहीं बदल जाती—वह बेरसे भिन्न कोई दूसरा फल नहीं हो जाता, उसी प्रकार जीव—क्षेत्रज्ञ भी अविद्यारूप मलके परिणामवश अवस्थाभेदसे ही कुछ अन्यरूप-सा हो जाता है, आकृति (परिणामरहित चेतन जाति) से नहीं। (तात्पर्य यह है कि अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, शरीरके संघातक अनात्म-वस्तुमें वह आत्माभिमान कर लेता है; किंतु वास्तवमें उसका स्वरूप चेतन ही है।) इस प्रकार जीव अहंकारभावको प्राप्त होता है। अहंकार बुद्धिरूपमें परिणत होता है और बुद्धि संकल्पोंके समूहसे व्याप्त