संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्थिति-प्रकरण ] * परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * २३९
प्रकट हुआ। (तात्पर्य यह है कि वह परमात्मनिष्ठ जीव इस शरीर आदिको स्वप्नके तुल्य मिथ्या मानता हुआ ही इसमें रहता है)। निष्पाप श्रीराम ! यह प्रपञ्च दीर्घ-कालतक बने रहनेवाले स्वप्नके समान मिथ्या ही दीखता है, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान तथा पहाड़ी भूमिमें घूमते हुए पुरुषको घूमते दीखनेवाले पर्वतके समान मिथ्या ही दृष्टिगोचर होता है। जिसकी अज्ञानमयी निद्रा टूट गयी है और वासनात्मक भावना गल गयी है, वह ज्ञानवान् पुरुष इस संसाररूपी स्वप्नको देखता हुआ भी नहीं देखता—इसे मिथ्या समझता है। श्रीराम ! जीवोंके स्वभावसे कल्पित यह संसार, जिसकी मोक्ष होनेसे पहले-तक निरन्तर प्राप्ति होती रहती है, अनात्मज्ञानीके ही अंदर सदा सत्य-सा विद्यमान रहता है।
रघुनन्दन ! यह जगत् यद्यपि सब प्रकारसे सम्पन्न दिखायी देता है, तथापि यहाँ वास्तवमें कुछ भी सम्पन्न नहीं है। यह आभासमात्र एवं मनका विलासमात्र है; अतः शून्य (असत्) रूपमें ही स्थित है। मनका संकल्पमात्र ही इसका स्वरूप है। जहाँ भी यह प्रतीत होता है, वहाँ स्वप्नमें देखे गये नगरके समान शून्यरूप ही है, केवल आकाशरूपमें ही स्थित है। शरीर आदिके रूपमें जो ये तीनों लोक दिखायी देते हैं, वे सब-के-सब मनसे ही कल्पित हैं। जैसे पदार्थोंके देखनेमें नेत्र कारण है, उसी प्रकार उनके स्मरणमात्रमें मन कारण है (अतः मनःकल्पित यह जगत् अतीतकी स्मृतिके ही तुल्य है। स्मरणकालमें वह पदार्थरूपसे विद्यमान या उपलब्ध नहीं है)। श्रीराम ! मनकी इस अद्भुत शक्तिको तो देखो; उसने अपनेसे उत्पन्न हुए इस शरीरको अपनी भावना या संकल्पके द्वारा ही प्राप्त किया है। इसलिये लोग उस मनकी कल्पनाको सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न समझते हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्राणी मनके द्वारा अपने संकल्पसे ही रचे गये हैं। अपने संकल्पके शान्त होनेपर तैलरहित दीपककी भाँति वे सब शान्त हो जाते हैं। महामते ! देखो, यह सारा जगत् आकाशके समान शून्य, मनकी कल्पनामात्रसे विकसित तथा दीर्घकालीन स्वप्नके तुल्य मिथ्या ही प्रकट हुआ है। विशुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! इस जगत्में कभी कोई वस्तु वास्तवमें न उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है। यहाँ जो जन्म और मरण दीखते हैं, वे सब मिथ्या ही हैं। जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंका ताप बढ़नेसे उसमें मृगतृष्णा (जल) का दर्शन होता है, उसी प्रकार मनके संकल्पसे ये ब्रह्मा आदि सभी प्राणी बिना हुए ही दिखायी देते हैं। संसारमें जितनी आकार राशियाँ दिखायी देती हैं, वे सब-की-सब दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति असत् हैं, मिथ्याज्ञानकी घनीभूत मूर्तियाँ हैं तथा मनोरथकी भाँति संकल्पमें ही प्रकट हुई हैं (वास्तवमें इनकी सत्ता नहीं है)। जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले पुरुषको नदीके तटवर्ती वृक्ष और पहाड़ आदि मिथ्या ही चलते हुए प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार इन दृश्य आकारोंकी परम्परा नित्य असत्य होती हुई ही सत्य-सी प्रकट दिखायी देती है। मायासे ही जिसकी ठठरी रची गयी है और मनके मननसे ही जिसका निर्माण हुआ है, ऐसा जो यह दृश्य जगत् है, इसे इन्द्रजाल ही समझो। यह सत्य नहीं है, तो भी सत्यके समान स्थित है। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है। फिर इसके लिये उससे भिन्न होनेका प्रसङ्ग ही कहाँ है। यदि कोई प्रसङ्ग है तो कौन और कैसा है ! वह भिन्नता या भेदभावना कहाँ स्थित है ? 'यह पर्वत है, यह ठूँठा वृक्ष है' इत्यादि रूपसे जो जगत्के आडम्बरका विलास है, वह मनकी भावनाके दृढ़ होनेसे असत् होता हुआ भी सत्-सा दृष्टिगोचर होता है। जैसे महान् आयोजनोंसे पूर्ण स्वप्न भ्रम ही है, वास्तविक नहीं, उसी प्रकार मनके द्वारा रचे गये इस जगत्को भी दीर्घकालीन स्वप्न ही समझो। जो मूढ़ चित्त मानव अपने संकल्पसे उत्पन्न हुई मनोरथमयी सम्पत्तिको स्वरूपसे युक्त (सत्य) समझकर उसका अनुसरण करता है, वह एक-
२४० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मात्र दुःखका ही भागी होता है। यदि परमात्मस्वरूप यथार्थ वस्तु न हो तो लोग भले ही अवस्तुरूप संसारका अनुसरण करें; परंतु जो यथार्थ वस्तु—परमात्माका परित्याग करके अवस्तुरूप संसारका अनुगमन करता है, वह नष्ट हो जाता है—परमात्माकी प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थसे वञ्चित रह जाता है। जैसे रज्जुमें सर्पका भय मनका व्यामोह (भ्रम) मात्र ही है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनका भ्रम ही है। मनकी भावनाओंकी विचित्रतासे जगत् चिरकालतक प्रतीतिका विषय बना रहता है। जलके भीतर प्रतिबिम्बित हुए चन्द्रमाके समान चञ्चल (क्षणभङ्गुर) जो मिथ्या उदित हुए पदार्थ हैं, उनसे इस लोकमें मूर्ख बालक ही धोखा खा सकता है, तुम-जैसा तत्त्वज्ञानी नहीं। यह जडसंघात देह-आदिरूप जो विशाल जगत् दिखायी देता है, मिथ्या ही है। मनके मननसे ही इसका निर्माण हुआ है। जैसे हृदयमें स्वप्न या संकल्पमय नगर निर्मित होता है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनके संकल्पमें ही निर्मित हुआ है (वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं है)। यह दृश्य-प्रपञ्च मनके संकल्पसे उत्पन्न होता है और उसके संकल्परहित हो जानेसे विलीन हो जाता है। इस तरह यह समृद्धिशाली गन्धर्वनगरकी भाँति बिना हुए ही दिखायी देता है। हृदयमें मनके संकल्पद्वारा कल्पित विशाल नगरका विध्वंस अथवा अभ्युदय हो जानेपर तुम्हीं बताओ, किसकी क्या हानि होती है या किसको क्या लाभ हो जाता है? जैसे बालकोंके मनमें खेलके लिये बने हुए गुड़ियों या खिलौनोंके द्वारा पुत्र-पशु आदि व्यवहारोंकी कल्पना होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी सदा मनसे ही प्रकट होता है। जैसे इन्द्रजालके द्वारा रचित जलके नष्ट-भ्रष्ट होनेपर किसीका कुछ भी नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार मिथ्या प्रकट हुए इस संसारके नष्ट हो जानेपर भी किसीका कुछ नहीं बिगड़ता। जो वास्तवमें असत् ही है, वह यदि अविद्यमान हो जाय तो किसका क्या बिगड़ गया? इसलिये संसारमें हर्ष और शोकका आधार कुछ भी नहीं है। महामते! जिसका सदासे ही अत्यन्त अभाव है, उसके नष्ट होनेसे क्या नष्ट हो जाता है? और जब किसीका नाश ही नहीं होता, तब उसके लिये दुःखका क्या प्रसङ्ग है?
एकमात्र प्रपञ्चका ही विस्तार करनेवाले इस असत्यभूत समस्त संसारमें ग्रहण करने योग्य कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसे विद्वान् पुरुष ग्रहण करनेकी इच्छा करे? इसी प्रकार जो सर्वथा सत्यभूत ब्रह्मतत्त्वमय है, उस समस्त त्रिलोकीमें कौन ऐसा हेय पदार्थ है, जिसका विद्वान् पुरुष त्याग करे? अर्थात् तीनों लोक ब्रह्मभूत होनेके कारण चिन्मय हैं; उनमें विज्ञानानन्दघन परमात्माके सिवा अन्य कोई पदार्थ नहीं है, जिसका त्याग किया जा सके। आदि और अन्तमें जिसका अभाव है, उसका वर्तमानमें भी अभाव ही है। अतः श्रीराम! जो अज्ञानी इस असत् संसारकी इच्छा करता है, उसको असत् (जड संसार) ही प्राप्त होता है। आदि और अन्तमें जो सत्य है, वर्तमानमें भी वह सत्य ही है; अतः जिसकी दृष्टिमें सब सत् परमात्मा ही है, उसे सर्वत्र परमात्म-सत्ताका ही दर्शन होता है। जलके भीतर जो असत्यभूत चन्द्रमा और आकाश-तल आदि दिखायी देते हैं, उन्हें अपने मनके मोहके लिये मूर्ख बालक ही पाना चाहते हैं, उत्तम ज्ञानी पुरुष नहीं। मूर्ख ही विशाल आकारवाले अर्थशून्य कार्योंमें सुख समझकर संतुष्ट होता है; किंतु अज्ञानके कारण उसे अनन्त दुःख ही प्राप्त होता है; सुख नहीं।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! वसिष्ठ मुनिके यों कहनेपर दिन बीत गया। सूर्य अस्ताचलको चले गये। सारी सभाके लोग मुनिको नमस्कार करके सायंकालकी उपासनाके लिये स्नान करनेके उद्देश्यसे उठ गये और रात बीतनेपर दूसरे दिन उदित हुए सूर्यदेवकी किरणोंके साथ-साथ फिर सभाभवनमें आ गये! (सर्ग ४४-४५)
स्थिति-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश * २४१
सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारंबार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध-भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! रमणीय स्त्री आदि तथा धनके नष्ट होनेपर शोकका कौन-सा अवसर है ? इन्द्रजालकी दृष्टिसे देखे गये पदार्थके नष्ट होनेपर क्या कोई विलाप करता है ? अविद्याके अंशभूत पुत्र आदिके प्राप्त होनेपर सुख और नष्ट होनेपर दुःखका प्रसार होना क्या कभी उचित है ? रमणीय धन और स्त्री आदिकी प्राप्ति एवं वृद्धि होनेपर हर्षसे फूल उठनेका क्या अवसर है ? क्या मृगतृष्णाके जलकी वृद्धि होनेपर जलार्थी पुरुषोंको आनन्द प्राप्त होता है ? कदापि नहीं । धन और स्त्री आदिके बढ़नेपर तो उन्हें परमार्थमें बाधक समझकर दुःखका अनुभव करना चाहिये, संतोष मानना तो कदापि उचित नहीं । संसारमें मोह-मायाकी वृद्धि होनेपर भला, कौन सुखी एवं स्वस्थ रह सकता है। जिन भोगोंके बढ़ जानेपर मूढ़ मनुष्यको राग होता है, उन्हींकी वृद्धिसे विवेकशील पुरुषके मनमें वैराग्य होता है । नश्वर धन और स्त्री आदिके सुलभ होनेमें हर्षका क्या कारण है ? जो इनके परिणामको देख पाते हैं, उन साधु पुरुषोंको तो इनसे वैराग्य ही होता है । अतः रघुनन्दन ! संसारके व्यवहारोंमें जो-जो वस्तु नश्वर प्रतीत हो, उसकी तो तुम उपेक्षाकरो और जो न्यायतः प्राप्त हो जाय, उसे यथायोग्य व्यवहारमें लाओ; क्योंकि तुम तत्त्वज्ञ हो। अप्राप्त भोगोंकी स्वभावतः कभी इच्छा न होना और दैवात् प्राप्त हुए भोगोंको यथायोग्य व्यवहारमें लाना—यह ज्ञानवान्का लक्षण है।
जिस किसी भी युक्ति अथवा साधनसे जिस पुरुषका जड़ दृश्यसे राग चला जाता है, उसकी परमात्मामें दृढ़ विश्राम रहनेवाली विमल बुद्धि कभी मोहरूपी सागरमें नहीं डूबती । यह असत् है, ऐसा समझकर जिसकी समस्त सांसारिक वस्तुओंमें आस्था नहीं रह गयी है, उस सर्वज्ञको मिथ्या अविद्या अपने अङ्कमें नहीं ले सकती—चंगुलमें नहीं फँसा सकती । श्रीराम ! अत्यन्त विरक्त, अपने पारमार्थिक स्वरूपमें स्थित और वासस्थानमें सब प्रकारकी अहंता-ममतासे रहित हो तथा न्यायप्राप्त कार्यमें तत्पर रहते हुए भी रागरहित हो तुम आकाशके समान निर्लिप्त हो जाओ; क्योंकि कर्ममें लगे रहनेपर भी जिस ज्ञानी महापुरुषकी उसमें न तो इच्छा (राग) है और न अनिच्छा (द्वेष) ही है, उसकी बुद्धि जलसे कमलदलकी भाँति कभी लिप्त नहीं होती । तुम्हारी इन्द्रियाँ और मन गौणी वृत्तिसे दर्शन और स्पर्श आदि कार्य करें या न करें, तुम सर्वथा इच्छारहित हो अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित रहो। यह संसार-सागर वासनाओंके जलसे भरा हुआ है । जो शुद्ध बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ हैं, वे ही इसके पार जा सके हैं । दूसरे लोग तो डूब ही गये हैं । जो नित्य तृप्त, शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाले जीवन्मुक्त महात्मा हैं, उन्हींके आचारोंका अनुसरण करना चाहिये, भोग-लम्पट दीन-हीन शठोंके आचरणोंका नहीं । महात्मा पुरुष सब कुछ नष्ट हो जानेपर भी खिन्न नहीं होते, देवताओंके उद्यानमें भी आसक्त नहीं होते और शास्त्र-मर्यादाका कभी त्याग नहीं करते । महात्मा पुरुष इच्छारहित तथा न्यायप्राप्त व्यवहारका अनासक्तभावसे अनुसरण करनेवाले होते हैं । वे देहरूपी रथका-आश्रय ले परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो आसक्तिशून्य होकर विचरते हैं । परम सुन्दर श्रीराम ! तुम भी यथार्थ एवं विस्तृत विवेकको प्राप्त कर चुके हो। अपनी इस पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिके बलसे सदा विज्ञानानन्दघन आत्मस्वरूपमें स्थित हो ।
श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और समस्त वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् हैं । आपके पवित्र
२४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उपदेशसे मैं अग्रस्त पुरुषके समान अपने स्वरूपमें निश्च स्थित हूँ। प्रवचन करते समय आपके मुखसे जो उदार भावोंसे युक्त, सुस्पष्ट, सुन्दर तथा परमात्माके स्वरूप को प्रकाशित करनेवाले वचन निकलते हैं, उन्हें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती—अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है। आपने श्रुति-पुराण आदि शास्त्रोंके आधारपर कमलयोनि ब्रह्माकी जो उत्पत्ति कही थी, उसका पुनः स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! इस ब्रह्माण्डमें तथा दूसरे-दूसरे विचित्र ब्रह्माण्डोंमें भी बहुत-से विभिन्न आचार व्यवहारवाले सहस्रों प्राणी विचरते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य समयोंमें उत्पन्न होनेवाले अनन्त भुवनोंमें दूसरे-दूसरे बहुत से प्राणी एक ही समय अधिक संख्यामें उत्पन्न होंगे। महाबाहो! उन ब्रह्माण्डोंमें उन ब्रह्मा आदि देवताओंकी उत्पत्तियाँ विचित्र-सी हुई बतायी गयी हैं। महासर्गके आरम्भकालमें कभी तो ब्रह्मा कमलसे उत्पन्न होते हैं, कभी जलसे, कभी अण्डसे और कभी आकाशसे प्रादुर्भूत होते हैं। विभिन्न सृष्टियोंमें कोई भूमि केवल मिट्टीके रूपमें प्रकट हुई तो कोई पथरीली थी, कोई सुवर्णमयी थी और कोई ताम्रमयी थी। इस ब्रह्माण्डमें भी भिन्न भिन्न प्रकारके कितने ही आश्चर्यमय जगत् हैं। इस सच्चिदानन्दघन परब्रह्मस्वरूप महाकाशमें अनन्त जगत् महासागरकी तरङ्गोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। जैसे समुद्रमें लहरें और मरु-मरीचिकामें जलकी धाराएँ उत्पन्न होती हैं; उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें अगणित विश्वकी शोभा प्रकट होती है। (तात्पर्य यह कि जैसे सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति मिथ्या है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्मामें इस जड जगत्का वैभव मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है।) जैसे वर्षा आदि ऋतुओंमें मच्छरोंके समूह उत्पन्न हो-होकर सब ओर भर जाते हैं और फिर नष्ट भी हो जाते हैं, उसी प्रकार ये संसारकी सृष्टियाँ उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं; यह नहीं ज्ञात होता कि ये सदा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली सृष्टि परम्पराएँ परमात्मामें कबसे आरम्भ हुईं। ये सृष्टियों पूर्व-से-पूर्व कालमें थीं और उससे भी पहले विद्यमान थीं। इस प्रकार अनादिकालसे इनकी परम्पराएँ चल रही हैं। जैसे समुद्रमें निरन्तर लहरें उठती रहती हैं, उसी तरह परमात्मामें सदा ही ये सृष्टियों उत्पन्न एवं विलीन होती रहती हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदिसे युक्त ये समस्त प्राणी नदीकी तरङ्गोंके समान उत्पन्न हो-होकर विलीन होते रहते हैं। जैसे मिट्टीकी राशिमें घड़े और अङ्कुरमें पत्ते विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार भविष्यमें होनेवाली अन्य सृष्टि-परम्पराएँ भी परब्रह्म परमात्मामें स्थित हैं।
श्रीराम ! परमात्माके स्वरूपमें जो वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं—बिना हुए ही प्रतीत होती हैं, ऐसी इन विलक्षण सृष्टियोंमें ब्रह्माकी विविध विचित्र उत्पत्तियाँ बीत चुकी हैं। वास्तवमें यह संसार मनके संकल्पका विस्तारमात्र है। यही सर्वसम्मत सिद्धान्त है। मैंने केवल समझानेके लिये तुम्हारे समक्ष इस सृष्टि-क्रमका वर्णन किया है। फिर सत्ययुग, फिर त्रेता, फिर द्वापर और फिर कलियुग—इस प्रकार सारा जगत् घूमते हुए चक्रकी तरह बारंबार आता-जाता रहता है। जैसे प्रत्येक प्रातःकालके बाद दिन आता है, उसी प्रकार पुनः मन्वन्तरोंके आरम्भ होते हैं। एकके बाद पुनः दूसरे कल्पोंकी परम्पराएँ चलती हैं और बारबार कार्यावस्थाएँ प्राप्त होती रहती हैं। जैसे वृक्षमें विभिन्न ऋतुओंके अनुसार सारे फल-फूल आदि कभी अप्रकट रहते हैं और कभी समय पाकर प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार परम तत्त्व परमात्मामें यह सारा जगत् कभी अव्यक्त रहता है और कभी व्यक्त हो जाता है। श्रीराम ! यह संसार कभी भी सत् नहीं है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् परमात्मामें स्वभावसे ही सदा संसारका अत्यन्ताभाव है। महामते ! ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सब कुछ ब्रह्म ही है । इसलिये संसार नहीं है, यह कथन सर्वथा युक्तियुक्त ही है।
स्थिति-प्रकरण ] * विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर * २४३
अज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका कभी विच्छेद नहीं होता, वह सदा बना रहता है । इसलिये यह संसार-माया मिथ्या होती हुई भी मूढ़के लिये नित्य है, यह कथन भी युक्तिसंगत ही है । रघुनन्दन ! जगत् बारंबार उत्पन्न होता रहता है, इसलिये कभी इसका अभाव नहीं है—ऐसा जो कुछ लोगोंका कथन है, वह भी उनकी दृष्टिसे मिथ्या नहीं है। यह सब दृश्य पुनः-पुनः प्रकट होता है । बारंबार जन्म और मरण होते रहते हैं । सुख-दुःख, करण और कर्म भी बारंबार हुआ करते हैं । दिशाएँ, आकाश, समुद्र और पर्वत भी बारंबार उत्पन्न होते हैं । जैसे खिड़कीवाले घरोंमें एक ही सूर्यकी प्रभा बारंबार अनेक रूपोंमें प्राप्त होती है, वैसे ही यह सृष्टि प्रवाहरूपसे पुनः-पुनः चक्रकी भाँति चलती रहती है । फिर दैत्य और देवता जन्म लेते हैं, पुनः लोक-लोकान्तरोंके क्रम प्रकट होते हैं, फिर स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करनेकी चेष्टाएँ चालू होती हैं तथा पुनः इन्द्र और चन्द्रमाका आविर्भाव होता है । अनेकानेक दानव भी बारंबार जन्म लेते हैं तथा बारंबार सम्पूर्ण दिशाओंमें मनोहर चन्द्रमा, सूर्य, वरुण एवं वायुका संचार होता रहता है। कालरूपी कुम्हार नाना प्रकारके प्राणीरूप प्यालोंको बनानेके लिये पुनः बड़े वेगसे निरन्तर कल्प नामक चाकको चलाने लगता है । (सर्ग ४६-४७)
विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर; जगत्को मिथ्या मानकर उसमें आस्था न रखने, देहाभिमानको छोड़ने और अपने विशुद्ध स्वरूप (परमात्मपद) में स्थित होनेका उपदेश
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि भोग और ऐश्वर्यके द्वारा नष्ट हो गयी है तथा जो ऐहिक और पारलौकिक भोग एवं ऐश्वर्यके लिये सकामभावसे नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, ऐसे मूढ़ पुरुष सच्चिदानन्दघन परमात्माकी ओर ध्यान नहीं देते, इस कारण उनको परमात्माके यथार्थ स्वरूपका अनुभव नहीं होता (अर्थात् वे परम पुरुषार्थरूप परमात्माकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाते हैं)। जो पुरुष विवेकयुक्त तीक्ष्णबुद्धिकी चरम सीमाको पहुँचे हुए हैं तथा जिन्हें इन्द्रियोंने अपने वशमें नहीं कर रखा है, वे इस जगत्की मायाका हाथपर रखे हुए बेलके समान प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। जो जीव विवेकपूर्ण विचारसे युक्त है, वह इस जगत्की अहङ्कारमूलक मायाको तुच्छ जानकर उसी तरह त्याग देता है, जैसे साँप केंचुलको । श्रीराम ! जैसे आगसे भुना हुआ बीज चिरकालतक खेतोंमें रहनेपर भी जमता नहीं, उसी प्रकार वह विवेकी पुरुष अनासक्तिको प्राप्त हो दीर्घकालतक शरीरमें रहनेपर भी फिर जन्म नहीं लेता । किंतु अज्ञानी मनुष्य आधि-व्याधिसे घिरे हुए तथा आज या कल प्रातःकाल नष्ट हो जानेवाले इस क्षणभङ्गुर शरीरके हितके लिये ही प्रयत्न करते हैं, आत्माके लिये नहीं ।
इसके बाद दाशूर मुनिका उपाख्यान सुनाकर वसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! यह जड जगत् वास्तवमें है ही नहीं, ऐसा निश्चय करके इसमें सब ओरसे आसक्तिका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि जो वस्तु है ही नहीं, उसके प्रति विवेकशील पुरुषोंका विश्वास कैसे होगा । जैसे मनके संकल्पद्वारा कल्पित पुरुष अथवा मनोराज्यको, स्वप्नगत जन-समुदायको तथा भ्रमसे प्रतीत होनेवाले दो चन्द्रमाओंकी आकृतियोंको तुम देखते हो, उसी प्रकार मनकी भावनासे ही उत्पन्न हुए इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चको भी देखना चाहिये (अर्थात् इसे मिथ्या समझकर इसके प्रति राग-द्वेष नहीं करना
२४४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
चाहिये)। निष्पाप रघुनन्दन ! पदार्थोंके सौन्दर्यका चिन्तन करनेसे जो उनके प्रति आन्तरिक आस्था होती है, उसका पूर्णतः परित्याग करके तुम जिस चिन्मय स्वरूपसे स्थित हो, वही तुम्हारा वास्तविक रूप है। उसी रूपसे इस जगत्में तुम लीलापूर्वक विचरण करो। सब पदार्थोंके भीतर विद्यमान रहते हुए भी जो सबसे अतीत है, वह परमात्मा तुम्हीं हो। तुम्हारे सकाशमात्रसे यह नियति विस्तारको प्राप्त होती है। जैसे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित सूर्यदेवके आकाशमें स्थित होनेपर जगत्के सब व्यवहार होने लगते हैं, उसी प्रकार इच्छारहित परमात्माकी सत्तासे ही समस्त कार्य सम्पन्न होते हैं। जैसे रत्न (सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणि आदि) में प्रकाश करनेकी इच्छा न होनेपर भी उसकी स्थितिमात्रसे स्वतः प्रकाश होने लगता है, उसी प्रकार इच्छारहित परमात्माके सकाशसे ही इस जगत्-समुदायकी प्रवृत्ति (व्यवहारचेष्टा) होती रहती है। सच्चिदानन्द परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे अतीत होनेके कारण वास्तवमें कर्ता और भोक्ता नहीं है, किंतु इन्द्रियोंमें व्यापक होनेके कारण वही कर्ता और भोक्ता भी माना जाता है। 'मैं सबके भीतर स्थित और अकर्ता हूँ'—ऐसी सुदृढ धारणाके साथ विवेकी पुरुष प्रवाहरूपसे प्राप्त हुए कार्यको करता रहे, तो भी वह उससे लिप्त (बद्ध) नहीं होता। चित्तमें प्रवृत्तिका अभाव होनेसे मनुष्य उपरतिका प्राप्त होता है। जिसको यह निश्चय हो गया है कि मैं यहाँ कुछ भी नहीं करता, अर्थात् जो कर्तापनके अभिमानसे रहित हो गया है, ऐसा कौन पुरुष भोग-समूहोंकी कामना मनमें लेकर किसी कार्यको करेगा अथवा छोड़ेगा। इसलिये सदा 'मैं कर्ता नहीं हूँ' इस भावनाको जगाये रखनेसे पुरुषके लिये परम अमृतमयी समता ही शेष रहती है। 'मैं यह हूँ, मैं यह नहीं हूँ; मैं इसे करता हूँ और इसे नहीं करता' इस तरहके भावोंका अनुसंधान करनेवाली दृष्टि वास्तवमें संतोपजनक नहीं होती। 'मैं शरीर हूँ'—ऐसी धारापूर्वक जो स्थिति है, वही कालसूत्र नामक नरकका मार्ग है। वही महावीचि नरकका जाल है और वही असिपत्रवनकी पंक्तियाँ हैं। उस देहाभिमानका सर्वथा प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। मैं यह दृश्यरूप कुछ भी नहीं हूँ, किंतु साक्षात् सच्चिदानन्द परमात्मा हूँ—ऐसा निश्चय करके तुम अपने उस सर्वोत्तम स्वरूपमें सदा स्थित रहो, जिसमें श्रेष्ठ साधु, ब्रह्मवेत्ता पुरुष स्थित हुए हैं।
(सर्ग ४८—५६)
वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वज्ञानी महात्माकी महत्तम स्थितिका वर्णन
**श्रीरामचन्द्रजीने कहा—**ब्रह्मन् ! आपने अपनी उत्तम उक्तियोंद्वारा जो यह सुन्दर बात कही है, वह सर्वथा सत्य है। समस्त भूतोंकी सृष्टि करनेवाले परमात्मा अकर्ता होते हुए ही कर्ता हैं और अभोक्ता होते हुए ही भोक्ता हैं। प्रभो ! जो सबका अधिष्ठान और समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित है, उस सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्द निर्मल पदस्वरूप ब्रह्मका मेरे हृदयमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
**श्रीवसिष्ठजी बोले—**रघुनन्दन ! आत्मा ही आत्माको जानता है, आत्माने ही आत्माको संसारी बनाया है अर्थात् इसने स्वयं ही अज्ञानके कारण अपने-आपको संसार-बन्धनमें बाँधा है। आत्मा ही अपने ज्ञानके द्वारा पवित्र होकर सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त होता है। जो वासनाओंके बन्धनमें बँधा है, उसीको बद्ध कहा गया है। वासनाका अभाव ही मोक्ष है। (वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जानेपर साधक संसारके बन्धनोंसे सदाके
स्थिति-प्रकरण ] * वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा * २४५
लिये मुक्त हो जाता है ।) अतः मन, बुद्धि आदिसे युक्त सम्पूर्ण वासनाओंका त्याग करके जिस वृत्तिके द्वारा उन सबका त्याग किया जाता है, उस बुद्धिवृत्तिका भी त्याग कर दो अर्थात् उसमें सम्बन्धरहित हो जाओ और सबका अभाव हो जानेपर जो एकमात्र नित्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही शेष रहता है, उसीमें अविचलभावसे स्थित रहो । शुद्ध बुद्धिसे युक्त रघुनन्दन ! प्राणोंके स्पन्दनपूर्वक कलना (चेष्टा एवं सङ्कल्प), काल, प्रकाश एवं तिमिर आदिका तथा वासना और विषयोंका (इन्द्रियों तथा समूल अहङ्कारका) सर्वथा त्याग करके उनसे सम्बन्धरहित होकर जो तुम आकाशके समान सौम्य (निर्मल), प्रशान्त-चित्त तथा चिन्मयरूपसे विराज रहे हो, उसी सर्वसम्मानित रूपमें स्थित रहो । जो परम बुद्धिमान् पुरुष सबका हृदयसे परित्याग करके सब विक्षेपोंके कारणभूत अभिमानसे रहित हो जाता है, वह साक्षात् शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप परमेश्वर हैं । जिसके हृदयमें अभिमानका अत्यन्त अभाव हो गया है, ऐसा विशुद्ध अन्तःकरणवाला ज्ञानी महात्मा ध्यान, समाधि अथवा कर्म करे या न करे, सदा मुक्त ही है; क्योंकि जिसका मन सर्वथा वासनारहित हो गया है, उसे न तो कर्मोंके त्यागसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके अनुष्ठानसे ही । जप, ध्यान और समाधिसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं है । मैंने शास्त्रका अच्छी तरह विचार किया और चिरकालतक सत्पुरुषोंके साथ परामर्श करके यही सार निकाला कि सम्पूर्ण वासनाओंसे रहित हुए सच्चिदानन्दघन परमात्माके निरन्तर मननरूप मौनसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम पद नहीं है । दसों दिशाओंमें घूम-घूमकर मैंने सारी दर्शनीय वस्तुओंको देख लिया; उनमें कुछ ही लोग ऐसे दिखायी दिये, जो परमात्माके स्वरूपका यथार्थ अनुभव करनेवाले हैं ।
मनुष्यके जो कोई भी लौकिक शुभ आयोजन हैं और जो भी उनके व्यावहारिक सत्कर्म हैं, वे सब केवल शरीरका निर्वाह करनेके लिये ही हैं, आत्माके लिये नहीं । पाताल, भूतल, स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक और आकाशमें कुछ ही ऐसे प्राणी दृष्टिगोचर होते हैं, जिन्हें सच्चिदानन्द परमात्माका यथार्थ बोध हो गया हो । जिस ज्ञानीके 'यह ग्राह्य है, यह त्याज्य है' इस तरहसे अज्ञानजनित निश्चय नष्ट हो गये हैं, ऐसा कर्तव्याकर्तव्य-दृष्टिसे रहित ज्ञानी महात्मा अत्यन्त दुर्लभ हैं । प्राणी चाहे लोकमें राज्य करे, चाहे मेघ या जलमें प्रवेश कर जाय; परंतु परमात्माकी प्राप्तिके बिना उसे परम शान्ति नहीं मिल सकती । जो इन्द्रियरूपी शत्रुओंका दमन करनेमें शूरवीर हैं, जन्मरूपी ज्वरका विनाश करनेके लिये उन्हीं महाबुद्धिमान् महापुरुषोंकी सेवा करनी चाहिये । पातालमें और स्वर्गमें सर्वत्र पाँच ही भूत हैं, छठा कुछ भी नहीं है । फिर धीर मनुष्योंकी बुद्धि कहाँ अनुरक्त हो (क्योंकि सर्वत्र क्षणभङ्गुर पदार्थोंकी ही उपलब्धि होती है) । शास्त्रके अनुसार निष्कामभाव-रूप युक्तिसे व्यवहार करनेवाले विवेकी पुरुषके लिये संसार गौके खुरके समान अनायास ही लाँघ जाने योग्य है । परंतु जिसने उपर्युक्त युक्तिका दूरसे ही परित्याग कर दिया है, उस अज्ञानीके लिये यह संसार महाप्रलयकालीन महासागरके समान दुस्तर है । पातालसे लेकर स्वर्गपर्यन्त इस जगत्में ज्ञानी महात्मा पुरुषके लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है । जैसे मन्द-मन्द वायुके चलनेसे पर्वत नहीं हिलता, वैसे ही भोग-समूहोंसे तत्त्वज्ञानी पुरुष नहीं विचलित होता । जैसे बादल आकाशमें बारंबार छा जानेपर भी उसे अपने रंगमें नहीं रँग सकते, उसी प्रकार संसारके ये विषय-भोगरूप कोई भी पदार्थ पुनः-पुनः प्राप्त होनेपर भी विशाल-हृदय तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषको आसक्त नहीं कर सकते । (सर्ग ५७)
२४६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परमात्मभावमें स्थित हुए कचके द्वारा सर्वात्मत्वका बोध करानेवाली गाथाओंका गान, भोगोंसे वैराग्यका उपदेश तथा सबकी परमात्मामें स्थितिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी पूर्वोक्त वस्तुके विषयमें पहले बृहस्पतिके पुत्र कचने जो पवित्र गाथाएँ गायी थीं, उनका मैं वर्णन करता हूँ; सुनो। एक समय मेरु पर्वतके किसी वनप्रान्तमें देवगुरु बृहस्पतिके पुत्र कच ब्रह्मविचारमें तत्पर होकर रहते थे। वहाँ उन्होंने सुनी हुई ब्रह्मविद्याका बारंवार मनन और निदिध्यासन करके आत्मामें परम शान्ति प्राप्त कर ली थी। इसलिये उनकी बुद्धि परमात्माके यथार्थज्ञानरूपी अमृतसे परिपूर्ण थी। विरक्त एवं विवेकी पुरुषोंके लिये अनादरके योग्य जो यह आपातरमणीय पाञ्चभौतिक दृश्य जगत् है, इसमें उनकी बुद्धि नहीं लगती थी। दृश्य-प्रपञ्चके प्रति आदर न होनेके कारण उसमें उनका मन नहीं लगता था। इसलिये एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्माके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुको न देखते हुए उन्होंने अत्यन्त विरक्त पुरुषकी भाँति अकेले एकान्त स्थानमें हर्ष-गद्गद वाणीद्वारा यह उद्गार प्रकट किया।
अहो ! जैसे महाप्रलयके जलसे समस्त संसार भरा रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व परमात्मासे परिपूर्ण है। दुःख, जीवात्मा और सुख एवं दिशाओंसे घिरा हुआ सुमहान् आकाश—ये सब परमात्मा ही हैं, ऐसा मुझे अनुभव हो गया; अतः उसी आनन्दमय परमात्माके ज्ञानसे मेरे सारे दुःख नष्ट हो गये हैं। बाह्य एवं आभ्यन्तर भावोंसे युक्त इस देहमें, ऊपर-नीचे और पूर्व आदि दिशाओंमें तथा इधर-उधर परमात्मा ही हैं। परमात्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु कहीं नहीं है*। सभी जगह परमात्मा स्थित हैं। सब कुछ परमात्ममय ही है। यह सब जगत् परमात्मा ही है, अतः मैं सदा परमात्मामें ही स्थित हूँ। मैं नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मस्वरूप हूँ और एकार्णवके समान सर्वत्र सुखपूर्वक विराजमान हूँ—इस प्रकारकी भावना करके क्रमशः घण्टानादकी तरह ओंकारका उच्चारण करते हुए वे उस मेरु पर्वतके कुञ्जमें बैठे रहे। श्रीराम ! वे कल्पनारूपी कलङ्कसे रहित होनेके कारण शुद्धरूपमें स्थित थे। उनके प्राणोंका स्पन्दन हृदयमें निरन्तर लीन था और वे शरत्कालके मेघरहित आकाशकी भाँति निर्विकार भावसे स्थित थे। ऐसी स्थितिमें पहुँचे हुए महात्मा कचने उपर्युक्त गाथाओंका गान किया था।
रघुनन्दन ! इस जगत्में खाने-पीने और स्त्री-समागमके अतिरिक्त उत्तम पुरुषार्थरूप शुभ वस्तु कुछ भी नहीं है—अज्ञानियोंके इस कथनपर विचार करके परम पदमें आरूढ़ हुआ महान् पुरुष यहाँ किस वस्तुकी वाञ्छा कर सकता है? जो मूढ़ एवं असाधु पुरुष कृपणोंके सर्वस्वभूत—आदि, मध्य एवं अन्तमें भी विनाशशील भोगोंद्वारा संतुष्ट होते हैं, वे पशुओं और पक्षियोंके समान गये-बीते हैं। जो संसारमें इन मिथ्या विषयभोगोंको सत् मानते हैं—इनकी स्थिरतापर विश्वास करते हैं, वे मनुष्योंमें गदहोंके समान हैं, उनका जीवन व्यर्थ है। सारी पृथ्वी मिट्टी ही है। समस्त वृक्ष काष्ठमय ही हैं और सभी शरीर हड्डी-मांसके पुतले ही हैं। नीचे पृथ्वी है तथा ऊपर और आगे-पीछे आकाश है; फिर यहाँ सुख देनेके लिये कौन-सी अपूर्व वस्तु है ? उत्पन्न और विनष्ट होनेवाली, अनित्य तथा मन और इन्द्रियोंके संयोगसे प्रकट हुए समस्त भोग वास्तवमें मिथ्या ही हैं। हड्डियोंके समूहको अपने शरीरकी संज्ञा देनेवाले पुरुषके द्वारा अपनी प्रेयसी कहकर एक रक्त-मांसकी पुतलीका सादर आलिङ्गन किया जाता है। यह संसारको मोहित करनेवाले कामका ही क्रीडा-विलास है। श्रीराम ! यह सारा जगत् मूढ़ पुरुषोंकी दृष्टिमें ही सत्य और स्थिर है। उन अज्ञानी मनुष्योंके लिये ही यह संतोषदायक होता है। विवेकशील
* इस विषयमें श्रुतिका भी कथन है—आत्मैवाधस्ता-दात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति (छा० उ० ७ । २५ । २)। अर्थात् परमात्मा ही नीचे है, परमात्मा ही ऊपर है, परमात्मा ही पीछे है, परमात्मा ही आगे है, परमात्मा ही दायीं ओर है, परमात्मा ही बायीं ओर है और परमात्मा ही यह सब है।
स्थिति-प्रकरण ] * राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन * २४७
एवं विरक्तको इससे संतोष नहीं प्राप्त होता; क्योंकि उनकी दृष्टिमें यह समस्त संसार क्षणभङ्गुर एवं विनाशशील है। भोगोंकी वासना ऐसी विषैली होती है कि उन विषयोंका उपभोग न करनेपर भी विषकी तरह मूर्च्छा (मोह) पैदा कर देती है।
महाबाहु श्रीराम ! सृष्टिकी व्यवस्था करनेवाले पितामह भगवान् ब्रह्मा जब समाधिसे उत्थित होते हैं, जब यह जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र अपनी व्यवस्थाके अनुसार चालू होता है और प्राणीरूपी घट वासनारूपी रस्सीसे बँधकर जीवनकी इच्छासे अपने कर्मानुसार नीचे-ऊपर आने-जाने लगते हैं, तबसे निरन्तर कुछ जीव इस भवकूपसे निकलते हैं और कुछ इसके भीतर प्रवेश करते हैं। श्रीराम ! अनादि-अनन्त ब्रह्मपदसे उत्पन्न हुए जीव-समुदाय उसी तरह ब्रह्ममें स्थित हैं, जैसे तरङ्गोंके समूह समुद्रमें। पुण्यात्मा रघुनन्दन ! संसारमें उत्पन्न हुए जो-जो पुरुष केवल सात्त्विक भावसे सम्पन्न हैं, वे फिर कभी यहाँ जन्म ग्रहण नहीं करते—सर्वथा मुक्त हो जाते हैं; परंतु जो सत्त्वगुणप्रधान राजस-प्रकृतिके पुरुष हैं, उनका इस जगत्में पुनर्जन्म लेना सम्भव है। जो परमात्मासे अधिकार प्राप्त करके प्रधानरूपसे यहाँ आते हैं, ऐसे महान् गुणशाली पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं।
( सर्ग ५८—६० )
राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन; जगत्की अनित्यता एवं परमात्माकी सर्वव्यापकताकी भावनाके लिये उपदेश; श्रीरामके आदर्श गुणोंको अपनाने एवं पौरुष-प्रयत्न करनेसे जीवन्मुक्त पदकी प्राप्तिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो पूर्वजन्मकी राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए हैं, वे महान् गुणशाली पुरुष आकाशमें प्रकाशित चन्द्रमाके समान सदा मनोहर कान्तिसे युक्त एवं आनन्दमग्न रहते हैं। जैसे आकाशका भाग मेघ आदिसे मलिन नहीं होता, उसी प्रकार वे सांसारिक दुःखोंसे दुखी नहीं होते। जैसे सुवर्णनिर्मित कमल रात्रिमें संकुचित या मलिन नहीं होता, उसी प्रकार वे आपत्तिमें पड़नेपर भी शोकसे कातर नहीं होते। जैसे स्थावर वृक्ष आदि प्रारब्धभोगके अतिरिक्त दूसरी कोई चेष्टा नहीं करते, उसी प्रकार वे भी ज्ञान और ज्ञानके साधनोंके अतिरिक्त और कोई चेष्टा नहीं करते। जैसे वृक्ष अपने पुष्प और फल आदिसे सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार वे भी अपने सदाचारोंसे शोभायमान होते हैं। जैसे चन्द्रमा क्षीण होनेपर भी कभी शीतलताका त्याग नहीं करता, उसी प्रकार वे आपत्तिकालमें भी अपने सौम्य स्वभावको नहीं छोड़ते। मैत्री * आदि गुणोंसे कमनीयताको प्राप्त हुई अपनी प्रकृतिसे ही वे नूतन पुष्पगुच्छोंसे विभूषित लतासे शोभायमान वनके वृक्षोंकी भाँति बहुत शोभा पाते हैं। वे पुरुष सबपर समान भाव रखते, समता-रूप रसका अनुभव करते, सदा सौम्यभावका आश्रय लेते, साधुओंसे भी बढ़कर साधु होते और अपनी मर्यादामें स्थित रहनेवाले समुद्रकी भाँति शास्त्र-मर्यादामें स्थित रहते हैं। अतः महाबाहो ! आपत्तियोंकी पहुँचसे परे जो उनका पद (स्थान) है, उसकी ओर सदा चलना चाहिये। मनुष्यको इस जगत्में सत्त्वगुणप्रधान राजस पुरुषोंकी भाँति ऐसा बर्ताव तथा सत्-शास्त्रोंका विचार करना चाहिये, जिससे परमात्माकी प्राप्ति हो। इस प्रकार भावना करनेवाले पुरुषको सब वस्तुओंकी अनित्यताका भी विचार करना चाहिये। विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष अज्ञानको बढ़ानेवाले मिथ्याभूत अनात्मदर्शनका त्याग करके सांसारिक पदार्थोंके विषयमें यह भावना करे कि ये सब-के-सब आपत्ति ही हैं; उनमें सम्पत्तिभावना कभी न करे। उस (यो० द० १ । ३३) 'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्माओंके प्रति क्रमशः मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त शुद्ध होता है।'
* योगदर्शनमें बताया गया है—'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।'
२४८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परम पुरुषार्थरूप अनन्त नित्य-विज्ञानानन्दघन ब्रह्मका भलीभाँति चिन्तन करना चाहिये। कर्मोंमें अत्यन्त आसक्त नहीं होना चाहिये और अनर्थकारी जन-समुदायके साथ कभी नहीं रहना चाहिये। 'संसारकी सभी वस्तुओंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद अवश्यम्भावी है' ऐसा विचार करके सदा श्रेष्ठ पुरुषोंका ही अनुसरण अथवा (अनुकरण) करना चाहिये। जैसे सूतमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उस नित्य विस्तृत सर्वव्यापी सर्वभावित शिवस्वरूप परमपद (परमात्मा) में यह समस्त जगत् पिरोया हुआ है (अर्थात् इस सम्पूर्ण जगत्में परमात्मा व्याप्त हैं)। जो चेतन परमात्मा विशाल भुवनमण्डलको विभूषित करनेवाले आकाशवर्ती सूर्यदेवमें विराजमान हैं, वे ही धरतीमें बिलके भीतर रहनेवाले कीड़ेके पेटमें भी हैं। निष्पाप रघुनन्दन ! जैसे यहाँ घटाकाशका महाकाशसे वास्तविक भेद नहीं है, उसी प्रकार शरीरवर्ती जीवोंका परमात्मासे परमार्थतः भेद नहीं है। श्रीराम ! जो उत्पन्न होकर विलीन हो जाती है, वह वस्तु वास्तवमें है ही नहीं। अतः यह जड संसार प्रतीतिमात्र है। यह सदा स्थिर नहीं रहता, इसलिये इसे सत् नहीं कहा जा सकता। किंतु प्रतीत होता है, इसलिये इसे असत् भी नहीं कहा जा सकता। अतएव यह अनिर्वचनीय है।
पहले विवेक और विचारसे युक्त धीर साधक शास्त्रके अनुसार परम बुद्धिमान् तत्त्वज्ञानी श्रेष्ठ महापुरुषोंसे मिलकर उनके साथ सत्शास्त्र-विषयक विचार करे। विषय-तृष्णासे रहित तत्त्वज्ञानसम्पन्न साधु महापुरुषके साथ परमात्मविषयक विचार करके परमात्माका ध्यान करनेसे परमपद प्राप्त होता है। शास्त्रोंके विचार, महापुरुषोंके सङ्ग, वैराग्य और अभ्यासरूप सत्कार्यसे युक्त पुरुष परमात्माके ज्ञानका पात्र होकर तुम्हारे समान शोभा पाता है। तुम ज्ञानवान् तथा नाना प्रकारके दिव्यगुणोंकी खान हो। तुम्हारा आचार-व्यवहार उदार है तथा तुम समस्त दोषोंसे रहित एवं दुःखरहित परमपदमें स्थित हो। तुम उत्तम अनुभवसे सम्पन्न हो। अतः इस समय संसारमें पूर्वोक्त साधक मनुष्य राग-द्वेषहीन व्यवहारद्वारा तुम्हारी चेष्टाका अनुसरण करेंगे। जो लोकोचित आचारसे युक्त हो बाहर विचरण करेंगे, वे ज्ञानरूपी नौकासे युक्त बुद्धिमान् पुरुष संसार-सागरसे पार हो जायेंगे। जो तुम्हारे समान विशुद्ध बुद्धिसे युक्त और समदर्शी है, वह उत्तम दृष्टिवाला सत्पुरुष मेरी बतायी हुई ज्ञानदृष्टियोंको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। जबतक तुम्हारा शरीर है, तबतक राग-द्वेष और इच्छा आदिसे रहित हो शास्त्रके अनुसार आचरण करते हुए स्थित रहो। शुद्ध सात्त्विक जन्मवाले जीवन्मुक्त पुरुषोंके जो परम सत्य एवं स्वाभाविक शम, दम आदि गुण हैं, उनका सेवन करता हुआ साधारण पुरुष भी मरकर दूसरे जन्ममें जीवन्मुक्त-पदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि जीव इस जगत्में जिन जाति-गुणोंका सदा सेवन करता है, दूसरे जन्ममें उत्पन्न होकर वह उसके अनुसार उसी जातिको प्राप्त होता है। (तात्पर्य यह कि उत्कृष्ट जातिके गुणोंका सेवन करनेपर वह उत्तम जातिमें जन्म पाता है। और अधम जातिके गुणोंका सेवन करनेपर अधम जातिमें ही जन्म ग्रहण करता है।) कर्मोंके अधीन हुए जीव पूर्वजन्मके सब भावोंको कर्मोंके अनुसार ही पाते हैं। पर्वतोंको भी लोग पराक्रमसे जीत लेते हैं, इसलिये मनुष्यको आत्मकल्याणके लिये तत्परतापूर्वक परम पुरुषार्थ करना चाहिये। जीव सात्त्विक, राजस और तामस—किसी भी योनिमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो, उसे कीचड़में फँसी हुई भोली-भाली गायकी तरह अपनी बुद्धिका धैर्यके साथ परम उद्योगपूर्वक संसाररूपी पङ्कसे उद्धार करना चाहिये। पुरुषोचित प्रयत्नसे ही उत्तमोत्तम गुणोंद्वारा सुशोभित होनेवाले मुमुक्षु पुरुष दूसरे जन्ममें जीवन्मुक्त-पदको प्राप्त होते हैं। पृथ्वीपर, स्वर्गमें, देवनागोंमें अथवा अन्यत्र भी कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे सद्गुणसम्पन्न पुरुष अपने पुरुषार्थ या प्रयत्नसे प्राप्त न कर सके। (सर्ग ६१-६२)
स्थिति-प्रकरण सम्पूर्ण
उपशम-प्रकरण
श्रीवसिष्ठजीका मध्याह्नकालमें प्रवचन समाप्त करके सबको विदा देनेके पश्चात् अपने आश्रममें जाना और दैनिक कर्मके अनुष्ठानमें तत्पर होना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—वत्स भरद्वाज ! राजा दशरथकी वह सुन्दर सभा शरद्-ऋतुमें तारोंसे भरे हुए आकाशकी भाँति निश्चल थी। महर्षि वसिष्ठ हृदयको आह्लाद प्रदान करनेवाला परम पवित्र प्रवचन कर रहे थे। श्रीरामचन्द्रजी प्रातःकालके प्रफुल्ल पङ्कजकी भाँति प्रसन्नतासे खिल उठे थे। महाराज दशरथ वसिष्ठजीके वचनोंको उसी तरह रसके साथ सुन रहे थे, जैसे मयूर वृष्टिके कारण हुई आर्द्रतासे युक्त हो मेघ-गर्जनकी मधुर ध्वनिको सुनते रहते हैं। उनके मन्त्री भी अपने चञ्चल मनको समस्त भोगोंसे हटाकर दृढ़ प्रयत्नके द्वारा उपदेश-श्रवणमें लगे हुए थे। चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल लक्ष्मण वसिष्ठजीके उपदेश-वचनोंसे आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर चुके थे। उनके हृदयमें लक्ष्यभूत ब्रह्मका स्फुरण हो रहा था तथा वे शिक्षाबलसे विचक्षण हो गये थे। शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न भी चित्तके द्वारा पूर्णताको प्राप्त हो चुके थे और पूर्ण आनन्दको प्राप्त हो पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। मन्त्री सुमित्रके हृदयमें पहले दुःखोंकी ही चिन्ता बनी रहती थी, परंतु वह उपदेश सुनकर सुमित्र मित्रभाव ( सूर्यस्वरूपता ) को प्राप्त हो गये। उनका हृदय-पङ्कज सूर्योदयकालके कमलकी भाँति खिल उठा। वहाँ बैठे हुए दूसरे-दूसरे ऋषियों तथा राजाओंके चित्तरूपी रत्न भलीभाँति घुल गये थे। उनमें विवेकजनित उल्लास-सा छा गया था। इतनेमें ही दसों दिशाओंको पूर्ण करती हुई मध्याह्नकालीन शङ्खध्वनि प्रकट हुई, जो प्रलयकालके मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर और महासागरकी जलराशिके उद्घोषकी भाँति दूरतक सुनायी देनेवाली थी। वह शङ्खनाद सुनते ही महर्षिने अपना प्रवचन बंद कर दिया। दो घड़ीतक विश्राम कर लेनेके पश्चात् जब वह घनीभूत कोलाहल शान्त हो गया, तब वसिष्ठ मुनि पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—'रघुनन्दन ! आजका दैनिक प्रवचन यहींतक कहा जा सका है। शत्रुसूदन ! इसके बाद जो कुछ कहना है, उसे मैं कल प्रातःकाल कहूँगा। मध्याह्नकालमें नियमतः करने योग्य जो कर्तव्य द्विजातियोंके लिये प्राप्त हैं, उसे हमलोगोंको भी करना चाहिये, जिससे वह कर्म-परम्परा नष्ट न हो जाय। अतः सौभाग्यशाली राजकुमार ! तुम भी उठो। आचारचतुर श्रीराम ! स्नान, दान और पूजन आदि समस्त आचारों तथा सत्कर्मोंका अनुष्ठान करो।'
यों कहकर महर्षि वसिष्ठ उठ गये। साथ ही राजा दशरथ भी सभासदोंसहित उठकर खड़े हो गये। राजालोग महाराज दशरथको प्रणाम करके राजभवनसे
| २५० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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बाहर निकले। फिर सुमन्त्र और दूसरे-दूसरे मन्त्री महर्षि वसिष्ठ तथा राजा दशरथको प्रणाम करके स्नान आदिके लिये चले गये। तदनन्तर वामदेव और विश्वामित्र आदि ऋषि-महर्षि वसिष्ठको आगे करके उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षामें खड़े रहे। शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा दशरथ मुनिसमुदायका सत्कार करके उनसे बिदा ले अपने कार्यका सम्पादन करनेके लिये चले गये।
वनवासी मुनि वनमें और पुरवासी मनुष्य नगरमें दूसरे दिन प्रातःकाल लौटनेके लिये चले गये। राजा दशरथ और वसिष्ठ मुनिके प्रेमपूर्वक अनुरोध करनेपर विश्वामित्रने वसिष्ठजीके घरमें रात्रि बितायी। श्रेष्ठ ब्राह्मणों, राजाओं, मुनियों तथा श्रीराम आदि समस्त दशरथ-राजकुमारोंसे घिरे हुए सर्वलोकवन्दित श्रीमान् वसिष्ठजी—उसी तरह अपने आश्रमको गये, जैसे कमल्योनि ब्रह्मा देव-समुदायके साथ ब्रह्मलोकमें पदार्पण करते हैं। तदनन्तर अपने चरणोंपर गिरे हुए श्रीराम आदि समस्त दशरथ-राजकुमारों-को वसिष्ठजीने अपने आश्रमसे विदा किया और अपने घरमें प्रवेश करके उन उदारचेता महर्षिने द्विजजनोचित दैनिक कृत्य—पञ्च महायज्ञोंका अनुष्ठान सम्पन्न किया।
(सर्ग १)
श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या, वसिष्ठजी तथा अन्य सभासदोंका पुनः सभामें प्रवेश, राजा दशरथद्वारा मुनिके उपदेशकी प्रशंसा तथा श्रीरामकी उनसे पुनः उपदेश देनेके लिये प्रार्थना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! चन्द्रमाके समान मनोरम कान्तिवाले उन राजकुमारोंने घरमें जाकर अपने-अपने भवनमें समस्त आह्निक कृत्य पूर्णरूपसे सम्पन्न किया। महर्षि वसिष्ठ, महाराज दशरथ, अन्यान्य राजा, मुनि तथा ब्राह्मणोंने अपने-अपने घरों तथा गलियोंमें अपने-अपने कार्योंका इस प्रकार सम्पादन किया। उन सबने जलाशयोंमें स्नान किया और ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या,
उपशम-प्रकरण ] * श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या * २५१
आसन, वस्त्र और बर्तन आदिका दान दिया। सुवर्ण
और मणियोंसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करनेवाले अपने घरों और देवालयोंमें उन्होंने भगवान् विष्णु, शंकर, अग्नि और सूर्य आदि देवताओंका पूजन
किया। तत्पश्चात् पुत्र, पौत्र, सुहृद्, सखा, भृत्य और बन्धु-बान्धवोंके साथ अपनी रुचिके अनुरूप भोज्य
पदार्थोंका आस्वादन किया। फिर सायंकालतकका समय उन्होंने कालोचित चेष्टा (पुराण एवं धर्मशास्त्रके श्रवण आदि) के द्वारा व्यतीत किया। सूर्यास्त होनेपर उन्होंने विधिपूर्वक संध्या-वन्दन, अघमर्षण-मन्त्रोंका जप, पवित्र स्तोत्रोंका पाठ और मनोहर गाथाओंका गान किया। फिर धीरे-धीरे वे रघुवंशी राजकुमार दीर्घ चन्द्रबिम्बके समान रमणीय शय्याओंपर, जहाँ फूल बिछाये गये थे और मुट्ठियोंसे कपूरका चूर्ण बिखेरा गया था, सोये।
तदनन्तर प्रातःकालके तूर्यघोषके साथ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी शय्यासे उठे, मानो कमलमण्डन सरोवरसे प्रफुल्ल कमल प्रकट हो गया हो। तत्पश्चात् प्रातःकालकी स्नानविधि सम्पन्न करके संध्या-वन्दन आदिसे निवृत्त हो थोड़े-से परिजनोंके आगे भेजकर पीछे स्वयं श्रीराम भी भाइयोंके साथ वसिष्ठजीके निवासस्थानपर गये। मुनिवर वसिष्ठ एकान्तमें समाधि लगाये बैठे थे और परमात्म का चिन्तन करने थे। श्रीरामने
दूरसे ही कंधा झुकाकर मुनिको प्रणाम किया। उन्हें प्रणाम करके वे विनययुक्त राजकुमार तबतक उस आँगनमें खड़े रहे, जबतक अन्धकारका नाश होकर दिगङ्गनाओंका मुखमण्डल स्पष्ट दिखायी न देने लगा।
२५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तदनन्तर अनेक राजा, राजकुमार, ऋषि और ब्राह्मण मौनभावसे वसिष्ठजीके निवासस्थानपर आये। ऐसा लगता था मानो देवता लोग ब्रह्मलोकमें एकत्र हो रहे हों। वसिष्ठजीका वह निवासस्थान समागत जन-समुदायसे भर गया और राजाओंके संचरणसे राजभवनके समान सुशोभित होने लगा। फिर एक ही क्षणमें भगवान् वसिष्ठ समाधिसे विरत हुए और अपने चरणोंमें प्रणत हुए लोगोंको उचित आचार एव उपचारसे अनुगृहीत करने लगे। तत्पश्चात् मुनियों और विश्वामित्रजीके साथ श्रीमान् मुनिवर वसिष्ठ उसी प्रकार सहसा रथपर आरूढ हुए, जैसे कमलयोनि ब्रह्मा कमलके आसनपर विराजमान हुए हों। राजाके महलमें पहुँचकर उन्होंने नतमस्तक हुई राजा दशरथकी उस रमणीय सभा में प्रवेश किया। उस समय महावीर राजा दशरथ तुरंत अपने सिंहासनसे उठकर मुनिके स्वागतार्थ तीन पग आगे बढ़ आये थे। तदनन्तर वहाँ दशरथ आदि समस्त नरेशों, वसिष्ठ आदि ऋषियों, ब्राह्मणों, सुमन्त्र आदि मन्त्रियों, गौम्य आदि विद्वानों, श्रीराम आदि राजकुमारों, शुभ आदि मन्त्रिपुत्रों, मन्त्री आदि प्रकृतियों, सुहोत्र आदि नागरिकों, मालव आदि भृत्यों तथा पौर आदि मालियोंने सभामें प्रवेश किया।
तत्पश्चात् जब वे सब-के-सब अपने-अपने आसनपर बैठ गये, उन सबकी दृष्टि वसिष्ठजीके मुखकी ओर लग गयी और सभाका कोलाहल शान्त हो गया, तब राजा दशरथने मेघ-गर्जनके समान गम्भीर वाणीद्वारा मुनिके उपदेशमें विश्वास प्रकट करनेवाली पदावलियोंसे युक्त यह सुन्दर वचन मुनीश्वर वसिष्ठजीसे कहा— 'भगवन् ! कल आपने जो आनन्ददायिनी विशद वचनावली सुनायी थी, उससे हमलोगोंको ऐसा आश्वासन मिला मानो हमारे ऊपर अमृतराशिकी वर्षा हुई हो। जैसे अमृतराशिसे पूर्ण चन्द्रमाकी निर्मल किरणें अन्धकार-को हटाकर अन्तःकरणको शीतल कर देती हैं; उसी प्रकार आप-जैसे महात्माओंके अमृततुल्य मधुर और निर्मल ये उपदेश-वाक्य अज्ञानान्धकारको दूर करके श्रोताओंके अन्तःकरणको परम शान्ति प्रदान करते हैं। जैसे शीतरश्मि शशीकी किरणें अन्धकार-राशिको दूर कर देती हैं, उसी तरह सज्जनोंके सदुपदेश मनके दुर्विचारों तथा शरीरकी सारी दुश्चेष्टाओंको मिटा देते हैं। मुने ! जैसे शरद्ऋतुमें वर्षाके काले मेघ क्षीण होने लगते हैं, उसी प्रकार हमारे तृष्णा और लोभ आदि दोष जो संसारमें बाँधनेके लिये शृङ्खलारूप हैं, आपके उपदेश-वाक्यसे क्षीण हो चले हैं। आपके उपदेशरूपी शरद्ऋतुसे हमारे हृदयाकाशमें स्थित संसार-वासना नामक कुहरा अब क्षीण होने लगा है।'
श्रीवसिष्ठजीने कहा—'रघुनन्दन ! महामते ! मैंने पूर्वापर-विचारसे युक्त जो वाक्यार्थ तुम्हारे समक्ष उपस्थित किया था, क्या तुम्हें उसका स्मरण है? साधुवादके एकमात्र भाजन साधुपुरुष ! क्या तुम्हें स्मरण है कि यह जगत् सर्वशक्तिसम्पन्न परब्रह्म परमात्मासे किस प्रकार प्रकट हुआ है! श्रीराम ! बार-बार विचारपूर्वक हृदयमें दृढ़तापूर्वक स्थापित किया हुआ तत्त्वज्ञान मनुष्यको मोक्षरूप सिद्धि देता है, किन्तु जिसने उपदेशसे प्राप्त हुए तत्त्वचिन्तनको अवहेलनावश नष्ट कर दिया—
उपशम-प्रकरण] * संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम तथा आत्माके अज्ञानसे दुःखका कथन * ३५३
भुला दिया, उस मनुष्यको उससे मोक्षरूपी फल नहीं प्राप्त होता । रघुनन्दन ! जैसे विशाल वक्षःस्थलवाला धनवान् पुरुष अपने कण्ठमें उत्तम जातिके मोतियोंकी माला धारण करनेका अधिकारी होता है, उसी प्रकार जिसका हृदय विवेकसे सम्पन्न है, वह तुम्हारे-जैसा पुरुष ही सुविचारित एवं विशुद्ध उपदेश-वचनोंका योग्य पात्र होता है।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कमलासन ब्रह्माजीके पुत्र महातेजस्वी श्रीवसिष्ठ मुनिने जब श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार कुछ बोलनेका अवसर दिया, तब वे इस प्रकार बोले।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता मुनीश्वर ! मैं परम उदार होकर जो आपके उपदेशको समझ सका हूँ, यह आपके ही प्रभावका विस्तार है। आप मेरे लिये जो-जो आदेश देते हैं, वह सब मैं उसी रूपमें ग्रहण करता हूँ, उसके विपरीत कुछ नहीं करता। उदारहृदय महर्षे ! आपने पहले जो मनोहर, पुण्यमय और पवित्र उपदेश दिया है, वह सब मैंने अपने अन्तःकरणमें क्रमशः धारण कर लिया है—ठीक
उसी तरह, जैसे कोई सुन्दर और पवित्र रत्नसमूहको मालाके रूपमें गूँथकर अपने कण्ठमें धारण कर ले। आपका अनुशासन हितकारक, मनोरम, पुण्यदायक और परमानन्द-प्राप्तिका साधन है। भला, कौन ऐसे सिद्ध पुरुष हैं, जो इसे शिरोधार्य नहीं करेंगे। आपका यह पवित्र उपदेश पहले श्रवणकालमें ही परम मधुर लगता है, फिर मध्यकालमें—मनन और निदिध्यासनके समय शम आदिके सौभाग्यकी वृद्धि करता है तथा अन्तमें परम उत्तम मोक्षरूपी फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है। आपका उपदेश कल्पवृक्षके पुष्पकी भाँति सदा विकासयुक्त, उज्ज्वल, अम्लान, शुभ और अशुभ—देव दानव, सभीको आनन्दमय बना देनेवाला और अक्षय शोभासे सम्पन्न है। यह हम सब लोगोंको अभीष्ट फल देनेवाला हो। भगवन् ! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विचारमें विशारद हैं। विस्तृत पुण्यरूपी जलराशिके एकमात्र महान् सरोवर हैं। महान् व्रतधारी और पाप-तापसे रहित हैं। इस समय मेरे प्रति आप पुनः अपनी उपदेश-वाणीके प्रवाहका प्रसार कीजिये—सदुपदेशरूपी अमृतका निर्झर बहाइये।
(सर्ग २-४)
संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम, आत्माके अज्ञानसे दुःख और ज्ञानसे ही सुखका कथन, आत्माकी निर्लेपता और जगत्की असत्ताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजीने कहा—परम सुन्दर आकृतिवाले रघुनन्दन ! अब तुम सावधान होकर इस उपशम-प्रकरणको सुनो, जो उत्तम सिद्धान्तोंके कारण सुन्दर और मोक्ष-प्रद होनेके कारण हितकारक है। श्रीराम ! जैसे सुदृढ खंभे मण्डपको धारण करते हैं, उसी तरह राजस-तामस जीव सदा इस विशाल संसार-मायाको धारण करते हैं। शास्त्रोंके अभ्यास, साधु-पुरुषोंके सङ्ग तथा सत्कर्मोंके अनुष्ठानसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, उन्हीं पुरुषोंके अन्तःकरणमें प्रज्वलित दीपकके समान सार वस्तुका दर्शन करानेवाली उत्तम बुद्धि उत्पन्न होती है। स्वयं
ही विवेक-विचारद्वारा अपने स्वरूपकी पर्यालोचना करके जबतक उसका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त किया जाता, तबतक ज्ञेय वस्तुकी उपलब्धि नहीं होती। जो वस्तु आदि और अन्तमें भी नहीं है, उसकी सत्यता कैसी ! जो वस्तु आदि और अन्तमें भी नित्य है, वही सत्य है, दूसरी नहीं। आदि और अन्तमें भी जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी मिथ्या वस्तुमें जिसका मन आसक्त होता है, उस मूढ पशुतुल्य जन्तुके हृदयमें किस उपायसे विवेक पैदा किया जा सकता है ?
६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
रघुनन्दन ! पहले शास्त्रके अभ्याससे, उत्तम वैराग्यसे तथा सत्पुरुषोंके सङ्गसे मनको पवित्र करना चाहिये । सौजन्यसे युक्त चित्त जब वैराग्यको प्राप्त हो जाय, तब शास्त्रोंके ज्ञान-विज्ञानसे गौरवशाली गुरुजनोंका अनुसरण करना चाहिये । फिर गुरुदेवके बताये हुए मार्गसे पहले सगुण परमेश्वरका ध्यान-पूजन आदि करे । यों करनेसे साधक उस परम पावन परमात्मपदको प्राप्त होता है । अपने अन्तःकरणमें निर्मल विचारके द्वारा स्वयं ही आत्माका साक्षात्कार करे । मनुष्य तबतक संसाररूपी महासागरमें तिनकेके समान बहता रहता है, जबतक वह बुद्धिरूपी नौकाद्वारा विचाररूपी तटपर पहुँचकर स्थिर नहीं हो जाता । जिसने विवेक-विचारके द्वारा जानने योग्य वस्तुको जान लिया है, उस पुरुषकी बुद्धि उसकी सारी मानसिक चिन्ताओंको उसी तरह शान्त कर देती है, जैसे सुस्थिर जल बालूके कणोंको नीचे दबा देता है । जैसे सुवर्णका ज्ञान रखनेवाला सुनार राखमें पड़े हुए सोनेको 'यह सोना है, यह राख है' इस तरह साफ-साफ समझ लेता है, अतः उसे सुवर्णकी अप्राप्तिके कारण होनेवाला मोह नहीं सताता, उसी तरह यह जीव चिरकालतक विचारद्वारा अपने स्वरूपका परिज्ञान कर लेनेपर स्वतः अपने अविनाशी स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है । इस दशामें उसके लिये यहाँ मोहका अवसर ही कहाँ रह जाता है। जिस पुरुषने तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, उसका मन यदि मोहग्रस्त होता है तो हो। किंतु जिसे सारतत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो चुका है, उसमें तो मूढ़ताकी सम्भावना ही नहीं है—यह बात निश्चित रूपसे कही जा सकती है । जगत्के लोगो ! जिसका यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ, वह आत्मा ही तुम्हारे दुःखोंकी सिद्धिका कारण है । यदि उसका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाय तो वह तुम्हें अक्षय सुख एवं शान्ति दे सकता है। मनुष्यो ! जिसने आत्मापर आवरण डाल रक्खा है, ऐसे इस शरीरसे मिले-जुले हुए-से अपने आत्माका विवेक-द्वारा साक्षात्कार करके तुमलोग शीघ्र स्वस्थ हो जाओ । मानवो ! जैसे कीचड़में गिरे होनेपर भी सोनेका उस कीचड़के साथ तनिक भी सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार इस निर्मल आत्माका देहके साथ थोड़ा-सा भी सम्बन्ध नहीं है । प्रबुद्ध हुआ मन जब अपनी पारमार्थिक स्थितिको मिथ्याभूत प्रपञ्चसे पृथक् करके देखता है, तब हृदयका अज्ञानान्धकार उसी प्रकार भाग जाता है, जैसे सूर्योदय होनेपर रात्रिका अँधेरा दूर हो जाता है ।
जैसे धूलसे आकाश और जलसे कमल लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीरोंसे सम्बन्ध होनेपर भी आत्मा उनसे लिप्त नहीं होता । जैसे नेत्रदोषके कारण आकाशमें विन्दुओंके समान आकृतिवाले तिरमिरे दिखायी देते हैं और आकाशके निर्मल होनेपर भी उसमें मलिनताकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार आत्मामें सुख-दुःखका अनुभव मलिन बुद्धि-वृत्तिरूप अज्ञानके कारण ही होता है । सुख और दुःख न तो जड देहके धर्म हैं और न सर्वातीत विशुद्ध आत्माके । ये अज्ञानके कारण ही अज्ञानीके अनुभवमें आते हैं और यथार्थ ज्ञानके द्वारा अज्ञानका नाश हो जानेपर किसीके भी अनुभवमें नहीं आते । रघुनन्दन ! वास्तवमें न तो किसीको कुछ सुख है और न किसीको कुछ दुःख ही है । सबको शान्त, अनन्त आत्मस्वरूप ही देखो । ये जो विस्तृत सृष्टियोंके दर्शन होते हैं, इन्हें जलमें तरङ्गों और आकाशमें मोरपंखोंके समान आत्मामें ही देखना चाहिये । अर्थात् जैसे जल ही तरङ्गरूपमें दीखता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगत्के रूपमें दृष्टिगोचर होता है तथा जैसे नेत्रोंके दोषसे मनुष्यको आकाशमें मयूर-पुच्छ-सा दिखायी देता है, पर वास्तवमें वह वहाँ होता नहीं, उसी प्रकार यह संसार वस्तुतः न होनेपर भी अज्ञानके कारण परमात्मामें दीखता है । सच्ची बात तो यह है कि एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं ।
शुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! आत्मा और जगत् न
उपशम-प्रकरण ] * कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा * २५५
तो एक हैं और न अनेक ही हैं; क्योंकि जगत् असत् है अर्थात् ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु न होनेसे द्वैत भी नहीं है तथा ब्रह्मसे संसार पृथक् दीखता है, इसलिये एक भी नहीं कहा जा सकता । वास्तवमें अज्ञानके कारण अज्ञानी को बिना हुए ही यह संसार प्रतीत हो रहा है । निष्पाप श्रीराम ! यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। इस प्रकार सब परमात्मा ही है। वही सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। मैं पृथक् हूँ और यह जगत् मुझसे पृथक् है, इस भ्रमपूर्ण कल्पनाका परित्याग करो। जैसे अग्निमें हिमकणकी कल्पना नहीं हो सकती, उसी प्रकार एकमात्र अद्वितीय सर्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मतत्त्वमें उससे भिन्न दूसरी वस्तुकी कल्पना ही नहीं हो सकती। रघुनन्दन ! इस परमात्मामें न शोक है न मोह है, न जन्म है और न कोई जन्म लेनेवाला ही है। यहाँ जो है, वही है—ऐसा निश्चय करके तुम दुःख-सुख आदि द्वन्द्वोंसे रहित, नित्य सत्त्वमें स्थित, योगक्षेमरहित, अद्वितीय, शोक-शून्य और संतापहीन हो जाओ। परम सुन्दर श्रीराम ! इस समस्त विस्तृत संसारकी रचना असत्यरूप है। इसकी असत्यताको जाननेवाला तत्त्वज्ञानी पुरुष इस मिथ्याभूत प्रपञ्चके पीछे नहीं दौड़ता । तुम तत्त्वज्ञ हो । तुम्हारी कल्पनाएँ शान्त हैं। तुम रोग-दोषसे रहित हो और नित्य प्रकाशस्वरूप हो; अतः शोक-शून्य हो जाओ । अपने समस्त गुणोंसे राजाओं तथा प्रजाजनोंको आनन्दित करते हुए तुम इस भूतलपर पिताके दिये हुए इस एकच्छत्र राज्यका चिरकालतक सर्वत्र समतापूर्ण दृष्टिके द्वारा भलीभाँति पालन करते रहो। यहाँ कर्मोंका न तो त्याग उचित है और न उनमें राग होना ही उचित है । ( सर्ग ५ )
कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा, सकाम-कर्मीकी दुर्गति और आत्मज्ञानीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन तथा राजा जनकके द्वारा सिद्धगीताका श्रवण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मैं श्रुति, स्मृति और सदाचारसे युक्त समस्त व्यवहारको वासनाशून्य होकर करता हूँ—इस प्रकार जो पुरुष कर्तव्य-बुद्धिसे कार्योंमें प्रवृत्त होता है, वह मुक्त है। ऐसी मेरी मान्यता है । मानव-शरीरका आश्रय लेकर भी कोई मूढ़ पुरुष सकामभावसे कर्मोंमें रत हैं, इसलिये वे स्वर्गसे नरकमें और नरकसे पुनः स्वर्गमें आते-जाते रहते हैं । कुछ लोग न करनेयोग्य कर्मोंमें आसक्त हैं और करनेयोग्य कर्तव्यसे विरत हैं; ऐसे पुरुष मरकर नरकसे नरकको, दुःखसे दुःखको और भयसे भयको प्राप्त होते रहते हैं। उनमेंसे कितने ही जीव अपने वासनारूप तन्तुओंसे बँधे रहकर उपर्युक्त कर्मोंके फल भोगते हुए तिर्यग्-योनिसे स्थावरयोनिको और स्थावरयोनिसे तिर्यग्-योनिको आते-जाते रहते हैं। कोई-कोई ही मनके साक्षी आत्माका विचारके द्वारा अनुभव करके तृणारूपी बन्धनको तोड़कर परम कैवल्यरूप पदको प्राप्त होते हैं। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष धन्य हैं । ऐसे पुरुषोंका श्रेष्ठता, मनोरमता, मैत्री, सौम्यभाव, करुणा और ज्ञान आदि सद्गुण सदा ही आश्रय लेते हैं। जो पुरुष समस्त कार्योंको कर्तव्य-बुद्धिसे करता रहता है तथा उन कार्योंके फलके पुष्ट या नष्ट होनेपर सब कार्योंमें समभाव रखता हुआ हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता, उसके भीतर सारे द्वन्द्व उसी तरह मिट जाते हैं, जैसे दिनमें अन्धकार ।
श्रीराम ! विदेह देशमें जनक नामसे प्रसिद्ध एक पराक्रमी राजा राज्य करते थे, जिनकी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो चुकी थीं और सम्पत्तियाँ दिनों-दिन बढ़ रही थीं । उनका हृदय बड़ा उदार था । वे याचक-समूहोंके लिये कल्पवृक्ष थे ( उनकी सारी इच्छाएँ पूर्ण करते थे, मित्ररूपी कमलोंको विकसित करनेके
२५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
लिये सूर्यदेवके समान थे ), बन्धु-बान्धवरूपी फूलोंके विकासके लिये ऋतुराज वसन्तके तुल्य थे, ब्राह्मणरूपी कुमुदोंके लिये शीतरश्मि चन्द्रमा थे और भगवान् विष्णुके समान प्रजावर्गके पालनमें तत्पर रहनेवाले थे। एक दिनकी बात है, वे वसन्त ऋतुमें खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित रमणीय उपवनमें गये। उस मनोरम उद्यानमें अनुचरोंको दूर रखकर राजा पर्वतशिखरपर उगे हुए कुञ्जोंमें विचरण करने लगे। कमलनयन श्रीराम ! वहाँ किसी तमाल-वनके निकुञ्जमें कुछ सिद्ध पुरुष बैठे हुए थे, जो दूसरोंको दिखायी नहीं देते थे। पर्वतों और उनकी कन्दराओंमें विचरनेवाले वे सिद्ध सदा एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उनके मुखसे कुछ ऐसे उपदेशात्मक गीत निकले, जो श्रोताके हृदयमें परमात्मभावको जगानेवाले थे। राजाने उन गीतोंको सुना, मानो वे उन्हींपर अनुग्रह करनेके लिये गाये गये थे। उन गीतोंके भाव क्रमशः इस प्रकार हैं—
कुछ सिद्ध बोले—द्रष्टाका नेत्र आदि इन्द्रियोंद्वारा जो दृश्य—विषयके साथ संयोग होता है, उससे जो विषय-सुखकी प्रतीति होती है, उसके द्वारा बुद्धिवृत्तिमें स्वयं सहज आनन्दरूपसे जो निश्चय प्रकट होता है, वही जिसका स्वभाव है तथा जो आत्मतत्त्वके परिशोधसे निरतिशय भूमारूपमें आविर्भूत हुआ है, उस विशुद्ध आत्मा या परमात्माकी हम निश्चय समाधिके द्वारा उपासना करते हैं।
दूसरे सिद्ध बोले—वासनासहित द्रष्टा, दर्शन और दृश्यकी त्रिपुटीको त्याग देनेपर जो विशुद्ध दर्शन या ज्ञानके रूपमें प्रकाशित होता है, उस विशुद्ध आत्माकी हम उपासना करते हैं।
अन्य सिद्धोंने कहा—अस्ति और नास्ति—इन दोनों पक्षोंके बीचमें उनके साक्षीरूपसे जो सदा विद्यमान है, प्रकाशनीय वस्तुओंको प्रकाशित करनेवाले उन परमात्माकी हम उपासना करते हैं।
दूसरे सिद्ध बोले—जिसमें सब है, जिसका सब है, जिससे सब हैं, जिसके लिये यह सब है, जिसके द्वारा सब है तथा जो स्वयं ही सब कुछ है, उस परम सत्य आत्माकी हम उपासना करते हैं।
अन्य सिद्धोंने कहा—जो अकारसे लेकर हकारतक समस्त वर्णोंके रूपमें स्थित हो निरन्तर उच्चारित हो रहा है, अपने आत्मरूप उस परमात्माकी हम उपासना करते हैं।
दूसरे सिद्ध बोले—जो हृदय-गुफामें विराजमान दीप्तिमान् परमेश्वरको छोड़कर दूसरेका आश्रय लेते हैं, वे हाथमें आये हुए कौस्तुभ मणिको त्यागकर दूसरे तुच्छ रत्नोंकी इच्छा करते हैं।
अन्य सिद्धोंने कहा—सम्पूर्ण आशाओंका त्याग करनेपर हृदयमें स्थित ज्ञानका फलरूप यह ब्रह्म प्राप्त होता है, जिससे आशारूप विष-वल्लरीकी मूल-परम्परा ही कट जाती है।
दूसरे सिद्ध बोले--जो दुर्बुद्धि पुरुष भोग्यपदार्थोंकी अत्यन्त नीरसताको जानकर भी उनमें बारंबार अपने मनकी भावनाको बाँधता है वह मनुष्य नहीं, गदहा है।
अन्य सिद्धोंने कहा--जैसे इन्द्रने वज्रके द्वारा पर्वतोंको मारा था, उसी प्रकार बारंबार उठने और गिरने-वाले इन इन्द्रियरूपी सर्पोंपर विवेकरूपी डंडेसे प्रहार करना चाहिये !
दूसरे सिद्ध बोले—उपशम या शान्तिके पवित्र सुखको प्राप्त करना चाहिये; जो उत्तम शम (मनोनिग्रह) से सम्पन्न है, उस पुरुषका विशुद्ध चित्त ही शान्तिको प्राप्त होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया है, उसीको अपने परमानन्दमय स्वरूपमें दीर्घकालके लिये उत्तम स्थिति प्राप्त होती है। (सर्ग ६-८)
उपशम-प्रकरण ] * सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करना * २७७
सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका एकान्तमें स्थित हो संसारकी नश्वरता एवं आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अपने आन्तरिक उद्गार एवं निश्चयको प्रकट करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उन सिद्धगणोंके मुखसे निकले हुए उन उपदेशात्मक गीतों (वचनों) को सुनकर राजा शीघ्र ही निर्वेदको प्राप्त हो गये । वे अपने साथके सब लोगोंको घरकी ओर खींचते हुए उस उपवनसे चले और समस्त परिवारको अपने-अपने स्थानपर छोड़कर अकेले ही अपने ऊँचे महलपर चढ़ गये । वहाँ लोककी वर्तमान अवस्थाओंका अवलोकन करते हुए वे व्याकुल हो इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट करने लगे—'हाय ! बड़े दुःखकी बात है कि जन्म, जरा, रोग और मरण आदिके कारण समस्त लोकोंकी जो अत्यन्त कष्टप्रद चञ्चल दशाएँ हैं, उन्हींमें मैं वशपूर्वक लोट-पोट रहा हूँ—आवागमनके चक्करमें पड़ा हुआ हूँ । जिस कालका कभी अन्त नहीं होना, उसका एक अत्यन्त अल्पतम अंश मेरा जीवन है । उस क्षणिक जीवनमें मैं आसक्त हो रहा हूँ, अपने मनको बाँधे रखता हूँ । केवल जीवन-कालतक रहनेवाला मेरा यह राज्य कितना है ? कुछ भी तो नहीं है ! परंतु इतनेसे ही संतुष्ट होकर मैं मूर्ख मनुष्यके समान क्यों निश्चिन्त बैठा हूँ ?—मुझे अपनी इस मूढ़तापर दुःख क्यों नहीं होता ? इस जगत्में ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, जो सत्य हो, रमणीय हो, उदार हो और किसीसे उत्पन्न न होकर नित्य निर्विकाररूपसे स्थित हो । फिर मेरी बुद्धि यहाँ किसमें लगे ?—कहाँ शान्ति प्राप्त करे ? जो वस्तु दूरस्थ कही जाती है, वह भी वास्तवमें दूर नहीं है; क्योंकि वह मेरे मनमें वर्तमान है । ऐसा निश्चय करके मैं बाह्य पदार्थोंकी भावना (चिन्तन) का त्याग कर रहा हूँ । प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन और प्रतिक्षण जो दुःखसे भरे हुए सांसारिक सुख बारबार उत्पन्न होते हैं, वे वास्तवमें दुःखरूप ही हैं । आज जो बड़े-बड़े लोगोंके सिरमौर बने हुए हैं वे ही कुछ दिनोंमें नीचे गिर जाते हैं । ऐ मेरे अभागे चित्त ! फिर इस जगत्की महत्तामें तुम्हारा यह कैसा विश्वास है ? यद्यपि मैं बुद्धिमान् हूँ, तो भी जैसे सूर्यदेवके समक्ष उनके प्रकाशको ढक लेनेवाला काला मेघ आ जाता है, उसी प्रकार मेरे सामने यह आत्माके प्रकाशको छिपा देनेवाला मोह सहसा कहाँसे आ गया ? ये महान् भोग मेरे कौन हैं ? ये भाई-बन्धु भी मेरे कौन हैं ? जैसे बालक मिथ्या ही भूतके भयसे व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार मैं इनमें ममतारूपी झूठे सम्बन्धकी कल्पना करके व्याकुल हो रहा हूँ ।
'मैं इन भोगों और सम्बन्धियोंमें स्वयं ही यह आस्था क्यों बाँध रहा हूँ ? यह आस्था तो जरा और मृत्युकी सहेली है—उनकी प्राप्ति करानेवाली है । साथ ही सदा उद्वेगमें डाले रखनेवाली है । यह भोगों और बन्धु-बान्धवोंकी सम्पत्ति चली जाय या भलीभाँति स्थिर होकर रहे, इसके प्रति मेरा क्या आग्रह है ! जलमें उठनेवाले बुद्बुदकी शोभा जैसे मिथ्या होता है, उसी तरह यह
२५८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भोग आदि सम्पत्ति, जो इस रूपमें उपस्थित हुई है, मिथ्या ही है। प्राचीन नरेशोंके वे महान् वैभव, वे भोग और वे अच्छे-अच्छे स्नेही बन्धु-बान्धव आज कहाँ हैं? वे सब इस समय स्मृतिपथको प्राप्त हो गये हैं—अब उनका केवल स्मरणमात्र यहाँ शेष रह गया है। वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं हैं। इस दृष्टान्तको सामने रखते हुए वर्तमान भोग आदि सम्पत्तिपर भी क्या आस्था हो सकती है ? पूर्ववर्ती भूमिपालोंके वे धन कहाँ हैं ? पूर्वकल्पोंमें ब्रह्माजीने जिनकी सृष्टि की थी, वे जगत् कहाँ चले गये ? जब पहलेका सब कुछ नष्ट हो गया, तब आजके इन वैभव-भोगोंपर मेरा यह कैसा विश्वास है ? जैसे जलमें अनन्त बुद्बुद उठते और विलीन होते हैं, उसी तरह लाखों इन्द्र कालके गालमें चले गये, तो भी मैं इस जीवनमें आस्था बाँधे बैठा हूँ! साधु पुरुष मेरी इस मूढ़ता-पर हँसेंगे। करोड़ों ब्रह्मा चले गये। कितनी ही सृष्टि-परम्पराएँ आयीं और चली गयीं। असंख्य भूपाल धूलके समान उड़ गये। फिर मेरे इस तुच्छ जीवनपर क्या आस्था हो सकती है ? यह, वह और मैं—यह तीन प्रकारकी कल्पना असत्यरूप ही है। अहंकाररूपी पिशाचसे ग्रस्त हुए मनुष्यकी भाँति मैं क्यों अबतक मूर्खके समान विचारशून्य होकर बैठा रहा ? मैं इस व्याप्त हुई कालकी सूक्ष्म रेखासे प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली अपनी आयुको देखता हुआ भी नहीं देखता ! यद्यपि दिन-पर-दिन निरन्तर अब भी आते-जाते रहते हैं; फिर भी आजतक एक दिन भी ऐसा नहीं देखा, जिसमें मुझे नित्य एक सत्य परमात्मवस्तुका साक्षात्कार हुआ हो। मैं कष्टसे भी अत्यन्त कष्टको प्राप्त हुआ, एक दुःखसे दूसरे महान् दुःखमें फँसता गया; परंतु आज भी इस जगत्के भोगोंसे विरक्त नहीं हुआ। जिन-जिन सुन्दर वस्तुओंमें मैंने दृढ़तापूर्वक स्नेह बाँधा, वे सब-की-सब नष्ट होती दिखायी दीं। फिर इस संसारमें उत्तम वस्तु क्या है ? मनुष्य जगत्के जिन-जिन पदार्थोंमें आस्था बाँधता है—विश्वास करता है, उन-उन पदार्थोंमें उस मनुष्यके दुःखका प्रादुर्भाव बारंबार देखा गया है। मूढ़ मनुष्य बाल्यावस्था में एकमात्र अज्ञानसे पीड़ित रहता है, युवावस्था में कामदेवके बाणोंसे घायल रहता है तथा अन्तिम अवस्था में स्त्री आदि कुटुम्बके पालन-पोषणकी चिन्तासे जलता रहता है। भला, अपने उद्धारका साधन वह कब करे ? दुर्बुद्धि पुरुष इस उत्पत्ति-विनाश-शील, रसहीन, विषम दुर्दशाओंसे दूषित तथा असार संसारमें क्या सार वस्तु देख रहा है ! कोई सामर्थ्यशाली पुरुष राजसूय और अश्वमेध आदि सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी अधिक-से-अधिक महाकल्पपर्यन्त उपभोगमें आनेवाले स्वर्गको ही पाता है, जो महाकालकी दृष्टिसे उसका एक अत्यन्त अल्पतम अंश है। स्वर्गसे अधिक जो अनन्त, नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म है, उसकी प्राप्ति उसे नहीं होती। कौन-सा वह स्वर्ग है और इस पृथ्वीपर या पातालमें कौन-सा ऐसा प्रदेश है, जहाँ दुष्ट अमरियोंकी भाँति ये आपत्तियाँ जीवको अभिभूत नहीं करतीं। ये आधियाँ (मानसी व्यथाएँ) अपने ही चित्तरूपी बिलमें रहनेवाले सर्प हैं और ये व्याधियाँ शरीररूपी स्थलके खुदे हुए क्षुद्र जलाशय हैं। इनका निवारण कैसे किया जा सकता है।
'सत् (वर्तमानकालिक दृश्य) के सिरपर असत्ता (विनाशशीलता) बैठी है। रमणीय पदार्थोंके मस्तक-पर अरम्यता विराज रही है और सुखोंके माथेपर दुःख चढ़े हुए हैं। भला, इनमें कौन-सी ऐसी एकमात्र सत्य वस्तु है, जिसका मैं आश्रय लूँ ? (तात्पर्य यह कि ये सभी वस्तुएँ मिथ्या हैं) अज्ञानसे मोहित क्षुद्र प्राणी जन्म लेते और मरते हैं। यह पृथ्वी उन्हीं लोगोंसे ठसा-ठस भरी है। जो साधुओंसे भी बढ़कर साधु हैं, ऐसे महापुरुष इस संसारमे दुर्लभ हैं। नील कमलके समान मनोहर और भ्रमरके समान चञ्चल नेत्रवाली जो उत्कृष्ट प्रेमसे विभूषित विलासिनी वनिताएँ हैं, वे भी क्षणभङ्गुर होनेके कारण उपहासके ही योग्य हैं। संसारमें रमणीयसे