भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा * २५५

तो एक हैं और न अनेक ही हैं; क्योंकि जगत् असत् है अर्थात् ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु न होनेसे द्वैत भी नहीं है तथा ब्रह्मसे संसार पृथक् दीखता है, इसलिये एक भी नहीं कहा जा सकता । वास्तवमें अज्ञानके कारण अज्ञानी को बिना हुए ही यह संसार प्रतीत हो रहा है । निष्पाप श्रीराम ! यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। इस प्रकार सब परमात्मा ही है। वही सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। मैं पृथक् हूँ और यह जगत् मुझसे पृथक् है, इस भ्रमपूर्ण कल्पनाका परित्याग करो। जैसे अग्निमें हिमकणकी कल्पना नहीं हो सकती, उसी प्रकार एकमात्र अद्वितीय सर्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मतत्त्वमें उससे भिन्न दूसरी वस्तुकी कल्पना ही नहीं हो सकती। रघुनन्दन ! इस परमात्मामें न शोक है न मोह है, न जन्म है और न कोई जन्म लेनेवाला ही है। यहाँ जो है, वही है—ऐसा निश्चय करके तुम दुःख-सुख आदि द्वन्द्वोंसे रहित, नित्य सत्त्वमें स्थित, योगक्षेमरहित, अद्वितीय, शोक-शून्य और संतापहीन हो जाओ। परम सुन्दर श्रीराम ! इस समस्त विस्तृत संसारकी रचना असत्यरूप है। इसकी असत्यताको जाननेवाला तत्त्वज्ञानी पुरुष इस मिथ्याभूत प्रपञ्चके पीछे नहीं दौड़ता । तुम तत्त्वज्ञ हो । तुम्हारी कल्पनाएँ शान्त हैं। तुम रोग-दोषसे रहित हो और नित्य प्रकाशस्वरूप हो; अतः शोक-शून्य हो जाओ । अपने समस्त गुणोंसे राजाओं तथा प्रजाजनोंको आनन्दित करते हुए तुम इस भूतलपर पिताके दिये हुए इस एकच्छत्र राज्यका चिरकालतक सर्वत्र समतापूर्ण दृष्टिके द्वारा भलीभाँति पालन करते रहो। यहाँ कर्मोंका न तो त्याग उचित है और न उनमें राग होना ही उचित है । ( सर्ग ५ )


कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा, सकाम-कर्मीकी दुर्गति और आत्मज्ञानीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन तथा राजा जनकके द्वारा सिद्धगीताका श्रवण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मैं श्रुति, स्मृति और सदाचारसे युक्त समस्त व्यवहारको वासनाशून्य होकर करता हूँ—इस प्रकार जो पुरुष कर्तव्य-बुद्धिसे कार्योंमें प्रवृत्त होता है, वह मुक्त है। ऐसी मेरी मान्यता है । मानव-शरीरका आश्रय लेकर भी कोई मूढ़ पुरुष सकामभावसे कर्मोंमें रत हैं, इसलिये वे स्वर्गसे नरकमें और नरकसे पुनः स्वर्गमें आते-जाते रहते हैं । कुछ लोग न करनेयोग्य कर्मोंमें आसक्त हैं और करनेयोग्य कर्तव्यसे विरत हैं; ऐसे पुरुष मरकर नरकसे नरकको, दुःखसे दुःखको और भयसे भयको प्राप्त होते रहते हैं। उनमेंसे कितने ही जीव अपने वासनारूप तन्तुओंसे बँधे रहकर उपर्युक्त कर्मोंके फल भोगते हुए तिर्यग्-योनिसे स्थावरयोनिको और स्थावरयोनिसे तिर्यग्-योनिको आते-जाते रहते हैं। कोई-कोई ही मनके साक्षी आत्माका विचारके द्वारा अनुभव करके तृणारूपी बन्धनको तोड़कर परम कैवल्यरूप पदको प्राप्त होते हैं। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष धन्य हैं । ऐसे पुरुषोंका श्रेष्ठता, मनोरमता, मैत्री, सौम्यभाव, करुणा और ज्ञान आदि सद्गुण सदा ही आश्रय लेते हैं। जो पुरुष समस्त कार्योंको कर्तव्य-बुद्धिसे करता रहता है तथा उन कार्योंके फलके पुष्ट या नष्ट होनेपर सब कार्योंमें समभाव रखता हुआ हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता, उसके भीतर सारे द्वन्द्व उसी तरह मिट जाते हैं, जैसे दिनमें अन्धकार ।

श्रीराम ! विदेह देशमें जनक नामसे प्रसिद्ध एक पराक्रमी राजा राज्य करते थे, जिनकी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो चुकी थीं और सम्पत्तियाँ दिनों-दिन बढ़ रही थीं । उनका हृदय बड़ा उदार था । वे याचक-समूहोंके लिये कल्पवृक्ष थे ( उनकी सारी इच्छाएँ पूर्ण करते थे, मित्ररूपी कमलोंको विकसित करनेके