संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
रघुनन्दन ! पहले शास्त्रके अभ्याससे, उत्तम वैराग्यसे तथा सत्पुरुषोंके सङ्गसे मनको पवित्र करना चाहिये । सौजन्यसे युक्त चित्त जब वैराग्यको प्राप्त हो जाय, तब शास्त्रोंके ज्ञान-विज्ञानसे गौरवशाली गुरुजनोंका अनुसरण करना चाहिये । फिर गुरुदेवके बताये हुए मार्गसे पहले सगुण परमेश्वरका ध्यान-पूजन आदि करे । यों करनेसे साधक उस परम पावन परमात्मपदको प्राप्त होता है । अपने अन्तःकरणमें निर्मल विचारके द्वारा स्वयं ही आत्माका साक्षात्कार करे । मनुष्य तबतक संसाररूपी महासागरमें तिनकेके समान बहता रहता है, जबतक वह बुद्धिरूपी नौकाद्वारा विचाररूपी तटपर पहुँचकर स्थिर नहीं हो जाता । जिसने विवेक-विचारके द्वारा जानने योग्य वस्तुको जान लिया है, उस पुरुषकी बुद्धि उसकी सारी मानसिक चिन्ताओंको उसी तरह शान्त कर देती है, जैसे सुस्थिर जल बालूके कणोंको नीचे दबा देता है । जैसे सुवर्णका ज्ञान रखनेवाला सुनार राखमें पड़े हुए सोनेको 'यह सोना है, यह राख है' इस तरह साफ-साफ समझ लेता है, अतः उसे सुवर्णकी अप्राप्तिके कारण होनेवाला मोह नहीं सताता, उसी तरह यह जीव चिरकालतक विचारद्वारा अपने स्वरूपका परिज्ञान कर लेनेपर स्वतः अपने अविनाशी स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है । इस दशामें उसके लिये यहाँ मोहका अवसर ही कहाँ रह जाता है। जिस पुरुषने तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, उसका मन यदि मोहग्रस्त होता है तो हो। किंतु जिसे सारतत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो चुका है, उसमें तो मूढ़ताकी सम्भावना ही नहीं है—यह बात निश्चित रूपसे कही जा सकती है । जगत्के लोगो ! जिसका यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ, वह आत्मा ही तुम्हारे दुःखोंकी सिद्धिका कारण है । यदि उसका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाय तो वह तुम्हें अक्षय सुख एवं शान्ति दे सकता है। मनुष्यो ! जिसने आत्मापर आवरण डाल रक्खा है, ऐसे इस शरीरसे मिले-जुले हुए-से अपने आत्माका विवेक-द्वारा साक्षात्कार करके तुमलोग शीघ्र स्वस्थ हो जाओ । मानवो ! जैसे कीचड़में गिरे होनेपर भी सोनेका उस कीचड़के साथ तनिक भी सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार इस निर्मल आत्माका देहके साथ थोड़ा-सा भी सम्बन्ध नहीं है । प्रबुद्ध हुआ मन जब अपनी पारमार्थिक स्थितिको मिथ्याभूत प्रपञ्चसे पृथक् करके देखता है, तब हृदयका अज्ञानान्धकार उसी प्रकार भाग जाता है, जैसे सूर्योदय होनेपर रात्रिका अँधेरा दूर हो जाता है ।
जैसे धूलसे आकाश और जलसे कमल लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीरोंसे सम्बन्ध होनेपर भी आत्मा उनसे लिप्त नहीं होता । जैसे नेत्रदोषके कारण आकाशमें विन्दुओंके समान आकृतिवाले तिरमिरे दिखायी देते हैं और आकाशके निर्मल होनेपर भी उसमें मलिनताकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार आत्मामें सुख-दुःखका अनुभव मलिन बुद्धि-वृत्तिरूप अज्ञानके कारण ही होता है । सुख और दुःख न तो जड देहके धर्म हैं और न सर्वातीत विशुद्ध आत्माके । ये अज्ञानके कारण ही अज्ञानीके अनुभवमें आते हैं और यथार्थ ज्ञानके द्वारा अज्ञानका नाश हो जानेपर किसीके भी अनुभवमें नहीं आते । रघुनन्दन ! वास्तवमें न तो किसीको कुछ सुख है और न किसीको कुछ दुःख ही है । सबको शान्त, अनन्त आत्मस्वरूप ही देखो । ये जो विस्तृत सृष्टियोंके दर्शन होते हैं, इन्हें जलमें तरङ्गों और आकाशमें मोरपंखोंके समान आत्मामें ही देखना चाहिये । अर्थात् जैसे जल ही तरङ्गरूपमें दीखता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगत्के रूपमें दृष्टिगोचर होता है तथा जैसे नेत्रोंके दोषसे मनुष्यको आकाशमें मयूर-पुच्छ-सा दिखायी देता है, पर वास्तवमें वह वहाँ होता नहीं, उसी प्रकार यह संसार वस्तुतः न होनेपर भी अज्ञानके कारण परमात्मामें दीखता है । सच्ची बात तो यह है कि एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं ।
शुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! आत्मा और जगत् न