भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण] * संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम तथा आत्माके अज्ञानसे दुःखका कथन * ३५३


भुला दिया, उस मनुष्यको उससे मोक्षरूपी फल नहीं प्राप्त होता । रघुनन्दन ! जैसे विशाल वक्षःस्थलवाला धनवान् पुरुष अपने कण्ठमें उत्तम जातिके मोतियोंकी माला धारण करनेका अधिकारी होता है, उसी प्रकार जिसका हृदय विवेकसे सम्पन्न है, वह तुम्हारे-जैसा पुरुष ही सुविचारित एवं विशुद्ध उपदेश-वचनोंका योग्य पात्र होता है।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कमलासन ब्रह्माजीके पुत्र महातेजस्वी श्रीवसिष्ठ मुनिने जब श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार कुछ बोलनेका अवसर दिया, तब वे इस प्रकार बोले।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता मुनीश्वर ! मैं परम उदार होकर जो आपके उपदेशको समझ सका हूँ, यह आपके ही प्रभावका विस्तार है। आप मेरे लिये जो-जो आदेश देते हैं, वह सब मैं उसी रूपमें ग्रहण करता हूँ, उसके विपरीत कुछ नहीं करता। उदारहृदय महर्षे ! आपने पहले जो मनोहर, पुण्यमय और पवित्र उपदेश दिया है, वह सब मैंने अपने अन्तःकरणमें क्रमशः धारण कर लिया है—ठीक

उसी तरह, जैसे कोई सुन्दर और पवित्र रत्नसमूहको मालाके रूपमें गूँथकर अपने कण्ठमें धारण कर ले। आपका अनुशासन हितकारक, मनोरम, पुण्यदायक और परमानन्द-प्राप्तिका साधन है। भला, कौन ऐसे सिद्ध पुरुष हैं, जो इसे शिरोधार्य नहीं करेंगे। आपका यह पवित्र उपदेश पहले श्रवणकालमें ही परम मधुर लगता है, फिर मध्यकालमें—मनन और निदिध्यासनके समय शम आदिके सौभाग्यकी वृद्धि करता है तथा अन्तमें परम उत्तम मोक्षरूपी फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है। आपका उपदेश कल्पवृक्षके पुष्पकी भाँति सदा विकासयुक्त, उज्ज्वल, अम्लान, शुभ और अशुभ—देव दानव, सभीको आनन्दमय बना देनेवाला और अक्षय शोभासे सम्पन्न है। यह हम सब लोगोंको अभीष्ट फल देनेवाला हो। भगवन् ! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विचारमें विशारद हैं। विस्तृत पुण्यरूपी जलराशिके एकमात्र महान् सरोवर हैं। महान् व्रतधारी और पाप-तापसे रहित हैं। इस समय मेरे प्रति आप पुनः अपनी उपदेश-वाणीके प्रवाहका प्रसार कीजिये—सदुपदेशरूपी अमृतका निर्झर बहाइये।

(सर्ग २-४)


संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम, आत्माके अज्ञानसे दुःख और ज्ञानसे ही सुखका कथन, आत्माकी निर्लेपता और जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजीने कहा—परम सुन्दर आकृतिवाले रघुनन्दन ! अब तुम सावधान होकर इस उपशम-प्रकरणको सुनो, जो उत्तम सिद्धान्तोंके कारण सुन्दर और मोक्ष-प्रद होनेके कारण हितकारक है। श्रीराम ! जैसे सुदृढ खंभे मण्डपको धारण करते हैं, उसी तरह राजस-तामस जीव सदा इस विशाल संसार-मायाको धारण करते हैं। शास्त्रोंके अभ्यास, साधु-पुरुषोंके सङ्ग तथा सत्कर्मोंके अनुष्ठानसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, उन्हीं पुरुषोंके अन्तःकरणमें प्रज्वलित दीपकके समान सार वस्तुका दर्शन करानेवाली उत्तम बुद्धि उत्पन्न होती है। स्वयं

ही विवेक-विचारद्वारा अपने स्वरूपकी पर्यालोचना करके जबतक उसका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त किया जाता, तबतक ज्ञेय वस्तुकी उपलब्धि नहीं होती। जो वस्तु आदि और अन्तमें भी नहीं है, उसकी सत्यता कैसी ! जो वस्तु आदि और अन्तमें भी नित्य है, वही सत्य है, दूसरी नहीं। आदि और अन्तमें भी जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी मिथ्या वस्तुमें जिसका मन आसक्त होता है, उस मूढ पशुतुल्य जन्तुके हृदयमें किस उपायसे विवेक पैदा किया जा सकता है ?