भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तदनन्तर अनेक राजा, राजकुमार, ऋषि और ब्राह्मण मौनभावसे वसिष्ठजीके निवासस्थानपर आये। ऐसा लगता था मानो देवता लोग ब्रह्मलोकमें एकत्र हो रहे हों। वसिष्ठजीका वह निवासस्थान समागत जन-समुदायसे भर गया और राजाओंके संचरणसे राजभवनके समान सुशोभित होने लगा। फिर एक ही क्षणमें भगवान् वसिष्ठ समाधिसे विरत हुए और अपने चरणोंमें प्रणत हुए लोगोंको उचित आचार एव उपचारसे अनुगृहीत करने लगे। तत्पश्चात् मुनियों और विश्वामित्रजीके साथ श्रीमान् मुनिवर वसिष्ठ उसी प्रकार सहसा रथपर आरूढ हुए, जैसे कमलयोनि ब्रह्मा कमलके आसनपर विराजमान हुए हों। राजाके महलमें पहुँचकर उन्होंने नतमस्तक हुई राजा दशरथकी उस रमणीय सभा में प्रवेश किया। उस समय महावीर राजा दशरथ तुरंत अपने सिंहासनसे उठकर मुनिके स्वागतार्थ तीन पग आगे बढ़ आये थे। तदनन्तर वहाँ दशरथ आदि समस्त नरेशों, वसिष्ठ आदि ऋषियों, ब्राह्मणों, सुमन्त्र आदि मन्त्रियों, गौम्य आदि विद्वानों, श्रीराम आदि राजकुमारों, शुभ आदि मन्त्रिपुत्रों, मन्त्री आदि प्रकृतियों, सुहोत्र आदि नागरिकों, मालव आदि भृत्यों तथा पौर आदि मालियोंने सभामें प्रवेश किया।

तत्पश्चात् जब वे सब-के-सब अपने-अपने आसनपर बैठ गये, उन सबकी दृष्टि वसिष्ठजीके मुखकी ओर लग गयी और सभाका कोलाहल शान्त हो गया, तब राजा दशरथने मेघ-गर्जनके समान गम्भीर वाणीद्वारा मुनिके उपदेशमें विश्वास प्रकट करनेवाली पदावलियोंसे युक्त यह सुन्दर वचन मुनीश्वर वसिष्ठजीसे कहा— 'भगवन् ! कल आपने जो आनन्ददायिनी विशद वचनावली सुनायी थी, उससे हमलोगोंको ऐसा आश्वासन मिला मानो हमारे ऊपर अमृतराशिकी वर्षा हुई हो। जैसे अमृतराशिसे पूर्ण चन्द्रमाकी निर्मल किरणें अन्धकार-को हटाकर अन्तःकरणको शीतल कर देती हैं; उसी प्रकार आप-जैसे महात्माओंके अमृततुल्य मधुर और निर्मल ये उपदेश-वाक्य अज्ञानान्धकारको दूर करके श्रोताओंके अन्तःकरणको परम शान्ति प्रदान करते हैं। जैसे शीतरश्मि शशीकी किरणें अन्धकार-राशिको दूर कर देती हैं, उसी तरह सज्जनोंके सदुपदेश मनके दुर्विचारों तथा शरीरकी सारी दुश्चेष्टाओंको मिटा देते हैं। मुने ! जैसे शरद्ऋतुमें वर्षाके काले मेघ क्षीण होने लगते हैं, उसी प्रकार हमारे तृष्णा और लोभ आदि दोष जो संसारमें बाँधनेके लिये शृङ्खलारूप हैं, आपके उपदेश-वाक्यसे क्षीण हो चले हैं। आपके उपदेशरूपी शरद्ऋतुसे हमारे हृदयाकाशमें स्थित संसार-वासना नामक कुहरा अब क्षीण होने लगा है।'

श्रीवसिष्ठजीने कहा—'रघुनन्दन ! महामते ! मैंने पूर्वापर-विचारसे युक्त जो वाक्यार्थ तुम्हारे समक्ष उपस्थित किया था, क्या तुम्हें उसका स्मरण है? साधुवादके एकमात्र भाजन साधुपुरुष ! क्या तुम्हें स्मरण है कि यह जगत् सर्वशक्तिसम्पन्न परब्रह्म परमात्मासे किस प्रकार प्रकट हुआ है! श्रीराम ! बार-बार विचारपूर्वक हृदयमें दृढ़तापूर्वक स्थापित किया हुआ तत्त्वज्ञान मनुष्यको मोक्षरूप सिद्धि देता है, किन्तु जिसने उपदेशसे प्राप्त हुए तत्त्वचिन्तनको अवहेलनावश नष्ट कर दिया—