भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या * २५१


आसन, वस्त्र और बर्तन आदिका दान दिया। सुवर्ण

और मणियोंसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करनेवाले अपने घरों और देवालयोंमें उन्होंने भगवान् विष्णु, शंकर, अग्नि और सूर्य आदि देवताओंका पूजन

किया। तत्पश्चात् पुत्र, पौत्र, सुहृद्, सखा, भृत्य और बन्धु-बान्धवोंके साथ अपनी रुचिके अनुरूप भोज्य

पदार्थोंका आस्वादन किया। फिर सायंकालतकका समय उन्होंने कालोचित चेष्टा (पुराण एवं धर्मशास्त्रके श्रवण आदि) के द्वारा व्यतीत किया। सूर्यास्त होनेपर उन्होंने विधिपूर्वक संध्या-वन्दन, अघमर्षण-मन्त्रोंका जप, पवित्र स्तोत्रोंका पाठ और मनोहर गाथाओंका गान किया। फिर धीरे-धीरे वे रघुवंशी राजकुमार दीर्घ चन्द्रबिम्बके समान रमणीय शय्याओंपर, जहाँ फूल बिछाये गये थे और मुट्ठियोंसे कपूरका चूर्ण बिखेरा गया था, सोये।

तदनन्तर प्रातःकालके तूर्यघोषके साथ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी शय्यासे उठे, मानो कमलमण्डन सरोवरसे प्रफुल्ल कमल प्रकट हो गया हो। तत्पश्चात् प्रातःकालकी स्नानविधि सम्पन्न करके संध्या-वन्दन आदिसे निवृत्त हो थोड़े-से परिजनोंके आगे भेजकर पीछे स्वयं श्रीराम भी भाइयोंके साथ वसिष्ठजीके निवासस्थानपर गये। मुनिवर वसिष्ठ एकान्तमें समाधि लगाये बैठे थे और परमात्म का चिन्तन करने थे। श्रीरामने

दूरसे ही कंधा झुकाकर मुनिको प्रणाम किया। उन्हें प्रणाम करके वे विनययुक्त राजकुमार तबतक उस आँगनमें खड़े रहे, जबतक अन्धकारका नाश होकर दिगङ्गनाओंका मुखमण्डल स्पष्ट दिखायी न देने लगा।