संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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बाहर निकले। फिर सुमन्त्र और दूसरे-दूसरे मन्त्री महर्षि वसिष्ठ तथा राजा दशरथको प्रणाम करके स्नान आदिके लिये चले गये। तदनन्तर वामदेव और विश्वामित्र आदि ऋषि-महर्षि वसिष्ठको आगे करके उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षामें खड़े रहे। शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा दशरथ मुनिसमुदायका सत्कार करके उनसे बिदा ले अपने कार्यका सम्पादन करनेके लिये चले गये।
वनवासी मुनि वनमें और पुरवासी मनुष्य नगरमें दूसरे दिन प्रातःकाल लौटनेके लिये चले गये। राजा दशरथ और वसिष्ठ मुनिके प्रेमपूर्वक अनुरोध करनेपर विश्वामित्रने वसिष्ठजीके घरमें रात्रि बितायी। श्रेष्ठ ब्राह्मणों, राजाओं, मुनियों तथा श्रीराम आदि समस्त दशरथ-राजकुमारोंसे घिरे हुए सर्वलोकवन्दित श्रीमान् वसिष्ठजी—उसी तरह अपने आश्रमको गये, जैसे कमल्योनि ब्रह्मा देव-समुदायके साथ ब्रह्मलोकमें पदार्पण करते हैं। तदनन्तर अपने चरणोंपर गिरे हुए श्रीराम आदि समस्त दशरथ-राजकुमारों-को वसिष्ठजीने अपने आश्रमसे विदा किया और अपने घरमें प्रवेश करके उन उदारचेता महर्षिने द्विजजनोचित दैनिक कृत्य—पञ्च महायज्ञोंका अनुष्ठान सम्पन्न किया।
(सर्ग १)
श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या, वसिष्ठजी तथा अन्य सभासदोंका पुनः सभामें प्रवेश, राजा दशरथद्वारा मुनिके उपदेशकी प्रशंसा तथा श्रीरामकी उनसे पुनः उपदेश देनेके लिये प्रार्थना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! चन्द्रमाके समान मनोरम कान्तिवाले उन राजकुमारोंने घरमें जाकर अपने-अपने भवनमें समस्त आह्निक कृत्य पूर्णरूपसे सम्पन्न किया। महर्षि वसिष्ठ, महाराज दशरथ, अन्यान्य राजा, मुनि तथा ब्राह्मणोंने अपने-अपने घरों तथा गलियोंमें अपने-अपने कार्योंका इस प्रकार सम्पादन किया। उन सबने जलाशयोंमें स्नान किया और ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या,