भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
२५०* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बाहर निकले। फिर सुमन्त्र और दूसरे-दूसरे मन्त्री महर्षि वसिष्ठ तथा राजा दशरथको प्रणाम करके स्नान आदिके लिये चले गये। तदनन्तर वामदेव और विश्वामित्र आदि ऋषि-महर्षि वसिष्ठको आगे करके उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षामें खड़े रहे। शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा दशरथ मुनिसमुदायका सत्कार करके उनसे बिदा ले अपने कार्यका सम्पादन करनेके लिये चले गये।

वनवासी मुनि वनमें और पुरवासी मनुष्य नगरमें दूसरे दिन प्रातःकाल लौटनेके लिये चले गये। राजा दशरथ और वसिष्ठ मुनिके प्रेमपूर्वक अनुरोध करनेपर विश्वामित्रने वसिष्ठजीके घरमें रात्रि बितायी। श्रेष्ठ ब्राह्मणों, राजाओं, मुनियों तथा श्रीराम आदि समस्त दशरथ-राजकुमारोंसे घिरे हुए सर्वलोकवन्दित श्रीमान् वसिष्ठजी—उसी तरह अपने आश्रमको गये, जैसे कमल्योनि ब्रह्मा देव-समुदायके साथ ब्रह्मलोकमें पदार्पण करते हैं। तदनन्तर अपने चरणोंपर गिरे हुए श्रीराम आदि समस्त दशरथ-राजकुमारों-को वसिष्ठजीने अपने आश्रमसे विदा किया और अपने घरमें प्रवेश करके उन उदारचेता महर्षिने द्विजजनोचित दैनिक कृत्य—पञ्च महायज्ञोंका अनुष्ठान सम्पन्न किया।

(सर्ग १)


श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या, वसिष्ठजी तथा अन्य सभासदोंका पुनः सभामें प्रवेश, राजा दशरथद्वारा मुनिके उपदेशकी प्रशंसा तथा श्रीरामकी उनसे पुनः उपदेश देनेके लिये प्रार्थना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! चन्द्रमाके समान मनोरम कान्तिवाले उन राजकुमारोंने घरमें जाकर अपने-अपने भवनमें समस्त आह्निक कृत्य पूर्णरूपसे सम्पन्न किया। महर्षि वसिष्ठ, महाराज दशरथ, अन्यान्य राजा, मुनि तथा ब्राह्मणोंने अपने-अपने घरों तथा गलियोंमें अपने-अपने कार्योंका इस प्रकार सम्पादन किया। उन सबने जलाशयोंमें स्नान किया और ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या,

उपशम-प्रकरण ] * श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या * २५१


आसन, वस्त्र और बर्तन आदिका दान दिया। सुवर्ण

और मणियोंसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करनेवाले अपने घरों और देवालयोंमें उन्होंने भगवान् विष्णु, शंकर, अग्नि और सूर्य आदि देवताओंका पूजन

किया। तत्पश्चात् पुत्र, पौत्र, सुहृद्, सखा, भृत्य और बन्धु-बान्धवोंके साथ अपनी रुचिके अनुरूप भोज्य

पदार्थोंका आस्वादन किया। फिर सायंकालतकका समय उन्होंने कालोचित चेष्टा (पुराण एवं धर्मशास्त्रके श्रवण आदि) के द्वारा व्यतीत किया। सूर्यास्त होनेपर उन्होंने विधिपूर्वक संध्या-वन्दन, अघमर्षण-मन्त्रोंका जप, पवित्र स्तोत्रोंका पाठ और मनोहर गाथाओंका गान किया। फिर धीरे-धीरे वे रघुवंशी राजकुमार दीर्घ चन्द्रबिम्बके समान रमणीय शय्याओंपर, जहाँ फूल बिछाये गये थे और मुट्ठियोंसे कपूरका चूर्ण बिखेरा गया था, सोये।

तदनन्तर प्रातःकालके तूर्यघोषके साथ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी शय्यासे उठे, मानो कमलमण्डन सरोवरसे प्रफुल्ल कमल प्रकट हो गया हो। तत्पश्चात् प्रातःकालकी स्नानविधि सम्पन्न करके संध्या-वन्दन आदिसे निवृत्त हो थोड़े-से परिजनोंके आगे भेजकर पीछे स्वयं श्रीराम भी भाइयोंके साथ वसिष्ठजीके निवासस्थानपर गये। मुनिवर वसिष्ठ एकान्तमें समाधि लगाये बैठे थे और परमात्म का चिन्तन करने थे। श्रीरामने

दूरसे ही कंधा झुकाकर मुनिको प्रणाम किया। उन्हें प्रणाम करके वे विनययुक्त राजकुमार तबतक उस आँगनमें खड़े रहे, जबतक अन्धकारका नाश होकर दिगङ्गनाओंका मुखमण्डल स्पष्ट दिखायी न देने लगा।

२५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तदनन्तर अनेक राजा, राजकुमार, ऋषि और ब्राह्मण मौनभावसे वसिष्ठजीके निवासस्थानपर आये। ऐसा लगता था मानो देवता लोग ब्रह्मलोकमें एकत्र हो रहे हों। वसिष्ठजीका वह निवासस्थान समागत जन-समुदायसे भर गया और राजाओंके संचरणसे राजभवनके समान सुशोभित होने लगा। फिर एक ही क्षणमें भगवान् वसिष्ठ समाधिसे विरत हुए और अपने चरणोंमें प्रणत हुए लोगोंको उचित आचार एव उपचारसे अनुगृहीत करने लगे। तत्पश्चात् मुनियों और विश्वामित्रजीके साथ श्रीमान् मुनिवर वसिष्ठ उसी प्रकार सहसा रथपर आरूढ हुए, जैसे कमलयोनि ब्रह्मा कमलके आसनपर विराजमान हुए हों। राजाके महलमें पहुँचकर उन्होंने नतमस्तक हुई राजा दशरथकी उस रमणीय सभा में प्रवेश किया। उस समय महावीर राजा दशरथ तुरंत अपने सिंहासनसे उठकर मुनिके स्वागतार्थ तीन पग आगे बढ़ आये थे। तदनन्तर वहाँ दशरथ आदि समस्त नरेशों, वसिष्ठ आदि ऋषियों, ब्राह्मणों, सुमन्त्र आदि मन्त्रियों, गौम्य आदि विद्वानों, श्रीराम आदि राजकुमारों, शुभ आदि मन्त्रिपुत्रों, मन्त्री आदि प्रकृतियों, सुहोत्र आदि नागरिकों, मालव आदि भृत्यों तथा पौर आदि मालियोंने सभामें प्रवेश किया।

तत्पश्चात् जब वे सब-के-सब अपने-अपने आसनपर बैठ गये, उन सबकी दृष्टि वसिष्ठजीके मुखकी ओर लग गयी और सभाका कोलाहल शान्त हो गया, तब राजा दशरथने मेघ-गर्जनके समान गम्भीर वाणीद्वारा मुनिके उपदेशमें विश्वास प्रकट करनेवाली पदावलियोंसे युक्त यह सुन्दर वचन मुनीश्वर वसिष्ठजीसे कहा— 'भगवन् ! कल आपने जो आनन्ददायिनी विशद वचनावली सुनायी थी, उससे हमलोगोंको ऐसा आश्वासन मिला मानो हमारे ऊपर अमृतराशिकी वर्षा हुई हो। जैसे अमृतराशिसे पूर्ण चन्द्रमाकी निर्मल किरणें अन्धकार-को हटाकर अन्तःकरणको शीतल कर देती हैं; उसी प्रकार आप-जैसे महात्माओंके अमृततुल्य मधुर और निर्मल ये उपदेश-वाक्य अज्ञानान्धकारको दूर करके श्रोताओंके अन्तःकरणको परम शान्ति प्रदान करते हैं। जैसे शीतरश्मि शशीकी किरणें अन्धकार-राशिको दूर कर देती हैं, उसी तरह सज्जनोंके सदुपदेश मनके दुर्विचारों तथा शरीरकी सारी दुश्चेष्टाओंको मिटा देते हैं। मुने ! जैसे शरद्ऋतुमें वर्षाके काले मेघ क्षीण होने लगते हैं, उसी प्रकार हमारे तृष्णा और लोभ आदि दोष जो संसारमें बाँधनेके लिये शृङ्खलारूप हैं, आपके उपदेश-वाक्यसे क्षीण हो चले हैं। आपके उपदेशरूपी शरद्ऋतुसे हमारे हृदयाकाशमें स्थित संसार-वासना नामक कुहरा अब क्षीण होने लगा है।'

श्रीवसिष्ठजीने कहा—'रघुनन्दन ! महामते ! मैंने पूर्वापर-विचारसे युक्त जो वाक्यार्थ तुम्हारे समक्ष उपस्थित किया था, क्या तुम्हें उसका स्मरण है? साधुवादके एकमात्र भाजन साधुपुरुष ! क्या तुम्हें स्मरण है कि यह जगत् सर्वशक्तिसम्पन्न परब्रह्म परमात्मासे किस प्रकार प्रकट हुआ है! श्रीराम ! बार-बार विचारपूर्वक हृदयमें दृढ़तापूर्वक स्थापित किया हुआ तत्त्वज्ञान मनुष्यको मोक्षरूप सिद्धि देता है, किन्तु जिसने उपदेशसे प्राप्त हुए तत्त्वचिन्तनको अवहेलनावश नष्ट कर दिया—

उपशम-प्रकरण] * संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम तथा आत्माके अज्ञानसे दुःखका कथन * ३५३


भुला दिया, उस मनुष्यको उससे मोक्षरूपी फल नहीं प्राप्त होता । रघुनन्दन ! जैसे विशाल वक्षःस्थलवाला धनवान् पुरुष अपने कण्ठमें उत्तम जातिके मोतियोंकी माला धारण करनेका अधिकारी होता है, उसी प्रकार जिसका हृदय विवेकसे सम्पन्न है, वह तुम्हारे-जैसा पुरुष ही सुविचारित एवं विशुद्ध उपदेश-वचनोंका योग्य पात्र होता है।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कमलासन ब्रह्माजीके पुत्र महातेजस्वी श्रीवसिष्ठ मुनिने जब श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार कुछ बोलनेका अवसर दिया, तब वे इस प्रकार बोले।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता मुनीश्वर ! मैं परम उदार होकर जो आपके उपदेशको समझ सका हूँ, यह आपके ही प्रभावका विस्तार है। आप मेरे लिये जो-जो आदेश देते हैं, वह सब मैं उसी रूपमें ग्रहण करता हूँ, उसके विपरीत कुछ नहीं करता। उदारहृदय महर्षे ! आपने पहले जो मनोहर, पुण्यमय और पवित्र उपदेश दिया है, वह सब मैंने अपने अन्तःकरणमें क्रमशः धारण कर लिया है—ठीक

उसी तरह, जैसे कोई सुन्दर और पवित्र रत्नसमूहको मालाके रूपमें गूँथकर अपने कण्ठमें धारण कर ले। आपका अनुशासन हितकारक, मनोरम, पुण्यदायक और परमानन्द-प्राप्तिका साधन है। भला, कौन ऐसे सिद्ध पुरुष हैं, जो इसे शिरोधार्य नहीं करेंगे। आपका यह पवित्र उपदेश पहले श्रवणकालमें ही परम मधुर लगता है, फिर मध्यकालमें—मनन और निदिध्यासनके समय शम आदिके सौभाग्यकी वृद्धि करता है तथा अन्तमें परम उत्तम मोक्षरूपी फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है। आपका उपदेश कल्पवृक्षके पुष्पकी भाँति सदा विकासयुक्त, उज्ज्वल, अम्लान, शुभ और अशुभ—देव दानव, सभीको आनन्दमय बना देनेवाला और अक्षय शोभासे सम्पन्न है। यह हम सब लोगोंको अभीष्ट फल देनेवाला हो। भगवन् ! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विचारमें विशारद हैं। विस्तृत पुण्यरूपी जलराशिके एकमात्र महान् सरोवर हैं। महान् व्रतधारी और पाप-तापसे रहित हैं। इस समय मेरे प्रति आप पुनः अपनी उपदेश-वाणीके प्रवाहका प्रसार कीजिये—सदुपदेशरूपी अमृतका निर्झर बहाइये।

(सर्ग २-४)


संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम, आत्माके अज्ञानसे दुःख और ज्ञानसे ही सुखका कथन, आत्माकी निर्लेपता और जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजीने कहा—परम सुन्दर आकृतिवाले रघुनन्दन ! अब तुम सावधान होकर इस उपशम-प्रकरणको सुनो, जो उत्तम सिद्धान्तोंके कारण सुन्दर और मोक्ष-प्रद होनेके कारण हितकारक है। श्रीराम ! जैसे सुदृढ खंभे मण्डपको धारण करते हैं, उसी तरह राजस-तामस जीव सदा इस विशाल संसार-मायाको धारण करते हैं। शास्त्रोंके अभ्यास, साधु-पुरुषोंके सङ्ग तथा सत्कर्मोंके अनुष्ठानसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, उन्हीं पुरुषोंके अन्तःकरणमें प्रज्वलित दीपकके समान सार वस्तुका दर्शन करानेवाली उत्तम बुद्धि उत्पन्न होती है। स्वयं

ही विवेक-विचारद्वारा अपने स्वरूपकी पर्यालोचना करके जबतक उसका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त किया जाता, तबतक ज्ञेय वस्तुकी उपलब्धि नहीं होती। जो वस्तु आदि और अन्तमें भी नहीं है, उसकी सत्यता कैसी ! जो वस्तु आदि और अन्तमें भी नित्य है, वही सत्य है, दूसरी नहीं। आदि और अन्तमें भी जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी मिथ्या वस्तुमें जिसका मन आसक्त होता है, उस मूढ पशुतुल्य जन्तुके हृदयमें किस उपायसे विवेक पैदा किया जा सकता है ?

६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रघुनन्दन ! पहले शास्त्रके अभ्याससे, उत्तम वैराग्यसे तथा सत्पुरुषोंके सङ्गसे मनको पवित्र करना चाहिये । सौजन्यसे युक्त चित्त जब वैराग्यको प्राप्त हो जाय, तब शास्त्रोंके ज्ञान-विज्ञानसे गौरवशाली गुरुजनोंका अनुसरण करना चाहिये । फिर गुरुदेवके बताये हुए मार्गसे पहले सगुण परमेश्वरका ध्यान-पूजन आदि करे । यों करनेसे साधक उस परम पावन परमात्मपदको प्राप्त होता है । अपने अन्तःकरणमें निर्मल विचारके द्वारा स्वयं ही आत्माका साक्षात्कार करे । मनुष्य तबतक संसाररूपी महासागरमें तिनकेके समान बहता रहता है, जबतक वह बुद्धिरूपी नौकाद्वारा विचाररूपी तटपर पहुँचकर स्थिर नहीं हो जाता । जिसने विवेक-विचारके द्वारा जानने योग्य वस्तुको जान लिया है, उस पुरुषकी बुद्धि उसकी सारी मानसिक चिन्ताओंको उसी तरह शान्त कर देती है, जैसे सुस्थिर जल बालूके कणोंको नीचे दबा देता है । जैसे सुवर्णका ज्ञान रखनेवाला सुनार राखमें पड़े हुए सोनेको 'यह सोना है, यह राख है' इस तरह साफ-साफ समझ लेता है, अतः उसे सुवर्णकी अप्राप्तिके कारण होनेवाला मोह नहीं सताता, उसी तरह यह जीव चिरकालतक विचारद्वारा अपने स्वरूपका परिज्ञान कर लेनेपर स्वतः अपने अविनाशी स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है । इस दशामें उसके लिये यहाँ मोहका अवसर ही कहाँ रह जाता है। जिस पुरुषने तत्त्वका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त किया है, उसका मन यदि मोहग्रस्त होता है तो हो। किंतु जिसे सारतत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो चुका है, उसमें तो मूढ़ताकी सम्भावना ही नहीं है—यह बात निश्चित रूपसे कही जा सकती है । जगत्के लोगो ! जिसका यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ, वह आत्मा ही तुम्हारे दुःखोंकी सिद्धिका कारण है । यदि उसका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाय तो वह तुम्हें अक्षय सुख एवं शान्ति दे सकता है। मनुष्यो ! जिसने आत्मापर आवरण डाल रक्खा है, ऐसे इस शरीरसे मिले-जुले हुए-से अपने आत्माका विवेक-द्वारा साक्षात्कार करके तुमलोग शीघ्र स्वस्थ हो जाओ । मानवो ! जैसे कीचड़में गिरे होनेपर भी सोनेका उस कीचड़के साथ तनिक भी सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार इस निर्मल आत्माका देहके साथ थोड़ा-सा भी सम्बन्ध नहीं है । प्रबुद्ध हुआ मन जब अपनी पारमार्थिक स्थितिको मिथ्याभूत प्रपञ्चसे पृथक् करके देखता है, तब हृदयका अज्ञानान्धकार उसी प्रकार भाग जाता है, जैसे सूर्योदय होनेपर रात्रिका अँधेरा दूर हो जाता है ।

जैसे धूलसे आकाश और जलसे कमल लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीरोंसे सम्बन्ध होनेपर भी आत्मा उनसे लिप्त नहीं होता । जैसे नेत्रदोषके कारण आकाशमें विन्दुओंके समान आकृतिवाले तिरमिरे दिखायी देते हैं और आकाशके निर्मल होनेपर भी उसमें मलिनताकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार आत्मामें सुख-दुःखका अनुभव मलिन बुद्धि-वृत्तिरूप अज्ञानके कारण ही होता है । सुख और दुःख न तो जड देहके धर्म हैं और न सर्वातीत विशुद्ध आत्माके । ये अज्ञानके कारण ही अज्ञानीके अनुभवमें आते हैं और यथार्थ ज्ञानके द्वारा अज्ञानका नाश हो जानेपर किसीके भी अनुभवमें नहीं आते । रघुनन्दन ! वास्तवमें न तो किसीको कुछ सुख है और न किसीको कुछ दुःख ही है । सबको शान्त, अनन्त आत्मस्वरूप ही देखो । ये जो विस्तृत सृष्टियोंके दर्शन होते हैं, इन्हें जलमें तरङ्गों और आकाशमें मोरपंखोंके समान आत्मामें ही देखना चाहिये । अर्थात् जैसे जल ही तरङ्गरूपमें दीखता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें दृष्टिगोचर होता है तथा जैसे नेत्रोंके दोषसे मनुष्यको आकाशमें मयूर-पुच्छ-सा दिखायी देता है, पर वास्तवमें वह वहाँ होता नहीं, उसी प्रकार यह संसार वस्तुतः न होनेपर भी अज्ञानके कारण परमात्मामें दीखता है । सच्ची बात तो यह है कि एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं ।

शुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! आत्मा और जगत् न

उपशम-प्रकरण ] * कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा * २५५

तो एक हैं और न अनेक ही हैं; क्योंकि जगत् असत् है अर्थात् ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु न होनेसे द्वैत भी नहीं है तथा ब्रह्मसे संसार पृथक् दीखता है, इसलिये एक भी नहीं कहा जा सकता । वास्तवमें अज्ञानके कारण अज्ञानी को बिना हुए ही यह संसार प्रतीत हो रहा है । निष्पाप श्रीराम ! यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। इस प्रकार सब परमात्मा ही है। वही सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। मैं पृथक् हूँ और यह जगत् मुझसे पृथक् है, इस भ्रमपूर्ण कल्पनाका परित्याग करो। जैसे अग्निमें हिमकणकी कल्पना नहीं हो सकती, उसी प्रकार एकमात्र अद्वितीय सर्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मतत्त्वमें उससे भिन्न दूसरी वस्तुकी कल्पना ही नहीं हो सकती। रघुनन्दन ! इस परमात्मामें न शोक है न मोह है, न जन्म है और न कोई जन्म लेनेवाला ही है। यहाँ जो है, वही है—ऐसा निश्चय करके तुम दुःख-सुख आदि द्वन्द्वोंसे रहित, नित्य सत्त्वमें स्थित, योगक्षेमरहित, अद्वितीय, शोक-शून्य और संतापहीन हो जाओ। परम सुन्दर श्रीराम ! इस समस्त विस्तृत संसारकी रचना असत्यरूप है। इसकी असत्यताको जाननेवाला तत्त्वज्ञानी पुरुष इस मिथ्याभूत प्रपञ्चके पीछे नहीं दौड़ता । तुम तत्त्वज्ञ हो । तुम्हारी कल्पनाएँ शान्त हैं। तुम रोग-दोषसे रहित हो और नित्य प्रकाशस्वरूप हो; अतः शोक-शून्य हो जाओ । अपने समस्त गुणोंसे राजाओं तथा प्रजाजनोंको आनन्दित करते हुए तुम इस भूतलपर पिताके दिये हुए इस एकच्छत्र राज्यका चिरकालतक सर्वत्र समतापूर्ण दृष्टिके द्वारा भलीभाँति पालन करते रहो। यहाँ कर्मोंका न तो त्याग उचित है और न उनमें राग होना ही उचित है । ( सर्ग ५ )


कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा, सकाम-कर्मीकी दुर्गति और आत्मज्ञानीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन तथा राजा जनकके द्वारा सिद्धगीताका श्रवण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मैं श्रुति, स्मृति और सदाचारसे युक्त समस्त व्यवहारको वासनाशून्य होकर करता हूँ—इस प्रकार जो पुरुष कर्तव्य-बुद्धिसे कार्योंमें प्रवृत्त होता है, वह मुक्त है। ऐसी मेरी मान्यता है । मानव-शरीरका आश्रय लेकर भी कोई मूढ़ पुरुष सकामभावसे कर्मोंमें रत हैं, इसलिये वे स्वर्गसे नरकमें और नरकसे पुनः स्वर्गमें आते-जाते रहते हैं । कुछ लोग न करनेयोग्य कर्मोंमें आसक्त हैं और करनेयोग्य कर्तव्यसे विरत हैं; ऐसे पुरुष मरकर नरकसे नरकको, दुःखसे दुःखको और भयसे भयको प्राप्त होते रहते हैं। उनमेंसे कितने ही जीव अपने वासनारूप तन्तुओंसे बँधे रहकर उपर्युक्त कर्मोंके फल भोगते हुए तिर्यग्-योनिसे स्थावरयोनिको और स्थावरयोनिसे तिर्यग्-योनिको आते-जाते रहते हैं। कोई-कोई ही मनके साक्षी आत्माका विचारके द्वारा अनुभव करके तृणारूपी बन्धनको तोड़कर परम कैवल्यरूप पदको प्राप्त होते हैं। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष धन्य हैं । ऐसे पुरुषोंका श्रेष्ठता, मनोरमता, मैत्री, सौम्यभाव, करुणा और ज्ञान आदि सद्गुण सदा ही आश्रय लेते हैं। जो पुरुष समस्त कार्योंको कर्तव्य-बुद्धिसे करता रहता है तथा उन कार्योंके फलके पुष्ट या नष्ट होनेपर सब कार्योंमें समभाव रखता हुआ हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता, उसके भीतर सारे द्वन्द्व उसी तरह मिट जाते हैं, जैसे दिनमें अन्धकार ।

श्रीराम ! विदेह देशमें जनक नामसे प्रसिद्ध एक पराक्रमी राजा राज्य करते थे, जिनकी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो चुकी थीं और सम्पत्तियाँ दिनों-दिन बढ़ रही थीं । उनका हृदय बड़ा उदार था । वे याचक-समूहोंके लिये कल्पवृक्ष थे ( उनकी सारी इच्छाएँ पूर्ण करते थे, मित्ररूपी कमलोंको विकसित करनेके

२५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

लिये सूर्यदेवके समान थे ), बन्धु-बान्धवरूपी फूलोंके विकासके लिये ऋतुराज वसन्तके तुल्य थे, ब्राह्मणरूपी कुमुदोंके लिये शीतरश्मि चन्द्रमा थे और भगवान् विष्णुके समान प्रजावर्गके पालनमें तत्पर रहनेवाले थे। एक दिनकी बात है, वे वसन्त ऋतुमें खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित रमणीय उपवनमें गये। उस मनोरम उद्यानमें अनुचरोंको दूर रखकर राजा पर्वतशिखरपर उगे हुए कुञ्जोंमें विचरण करने लगे। कमलनयन श्रीराम ! वहाँ किसी तमाल-वनके निकुञ्जमें कुछ सिद्ध पुरुष बैठे हुए थे, जो दूसरोंको दिखायी नहीं देते थे। पर्वतों और उनकी कन्दराओंमें विचरनेवाले वे सिद्ध सदा एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उनके मुखसे कुछ ऐसे उपदेशात्मक गीत निकले, जो श्रोताके हृदयमें परमात्मभावको जगानेवाले थे। राजाने उन गीतोंको सुना, मानो वे उन्हींपर अनुग्रह करनेके लिये गाये गये थे। उन गीतोंके भाव क्रमशः इस प्रकार हैं—

कुछ सिद्ध बोले—द्रष्टाका नेत्र आदि इन्द्रियोंद्वारा जो दृश्य—विषयके साथ संयोग होता है, उससे जो विषय-सुखकी प्रतीति होती है, उसके द्वारा बुद्धिवृत्तिमें स्वयं सहज आनन्दरूपसे जो निश्चय प्रकट होता है, वही जिसका स्वभाव है तथा जो आत्मतत्त्वके परिशोधसे निरतिशय भूमारूपमें आविर्भूत हुआ है, उस विशुद्ध आत्मा या परमात्माकी हम निश्चय समाधिके द्वारा उपासना करते हैं।

दूसरे सिद्ध बोले—वासनासहित द्रष्टा, दर्शन और दृश्यकी त्रिपुटीको त्याग देनेपर जो विशुद्ध दर्शन या ज्ञानके रूपमें प्रकाशित होता है, उस विशुद्ध आत्माकी हम उपासना करते हैं।

अन्य सिद्धोंने कहा—अस्ति और नास्ति—इन दोनों पक्षोंके बीचमें उनके साक्षीरूपसे जो सदा विद्यमान है, प्रकाशनीय वस्तुओंको प्रकाशित करनेवाले उन परमात्माकी हम उपासना करते हैं।

दूसरे सिद्ध बोले—जिसमें सब है, जिसका सब है, जिससे सब हैं, जिसके लिये यह सब है, जिसके द्वारा सब है तथा जो स्वयं ही सब कुछ है, उस परम सत्य आत्माकी हम उपासना करते हैं।

अन्य सिद्धोंने कहा—जो अकारसे लेकर हकारतक समस्त वर्णोंके रूपमें स्थित हो निरन्तर उच्चारित हो रहा है, अपने आत्मरूप उस परमात्माकी हम उपासना करते हैं।

दूसरे सिद्ध बोले—जो हृदय-गुफामें विराजमान दीप्तिमान् परमेश्वरको छोड़कर दूसरेका आश्रय लेते हैं, वे हाथमें आये हुए कौस्तुभ मणिको त्यागकर दूसरे तुच्छ रत्नोंकी इच्छा करते हैं।

अन्य सिद्धोंने कहा—सम्पूर्ण आशाओंका त्याग करनेपर हृदयमें स्थित ज्ञानका फलरूप यह ब्रह्म प्राप्त होता है, जिससे आशारूप विष-वल्लरीकी मूल-परम्परा ही कट जाती है।

दूसरे सिद्ध बोले--जो दुर्बुद्धि पुरुष भोग्यपदार्थोंकी अत्यन्त नीरसताको जानकर भी उनमें बारंबार अपने मनकी भावनाको बाँधता है वह मनुष्य नहीं, गदहा है।

अन्य सिद्धोंने कहा--जैसे इन्द्रने वज्रके द्वारा पर्वतोंको मारा था, उसी प्रकार बारंबार उठने और गिरने-वाले इन इन्द्रियरूपी सर्पोंपर विवेकरूपी डंडेसे प्रहार करना चाहिये !

दूसरे सिद्ध बोले—उपशम या शान्तिके पवित्र सुखको प्राप्त करना चाहिये; जो उत्तम शम (मनोनिग्रह) से सम्पन्न है, उस पुरुषका विशुद्ध चित्त ही शान्तिको प्राप्त होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया है, उसीको अपने परमानन्दमय स्वरूपमें दीर्घकालके लिये उत्तम स्थिति प्राप्त होती है। (सर्ग ६-८)

उपशम-प्रकरण ] * सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करना * २७७

सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका एकान्तमें स्थित हो संसारकी नश्वरता एवं आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अपने आन्तरिक उद्गार एवं निश्चयको प्रकट करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उन सिद्धगणोंके मुखसे निकले हुए उन उपदेशात्मक गीतों (वचनों) को सुनकर राजा शीघ्र ही निर्वेदको प्राप्त हो गये । वे अपने साथके सब लोगोंको घरकी ओर खींचते हुए उस उपवनसे चले और समस्त परिवारको अपने-अपने स्थानपर छोड़कर अकेले ही अपने ऊँचे महलपर चढ़ गये । वहाँ लोककी वर्तमान अवस्थाओंका अवलोकन करते हुए वे व्याकुल हो इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट करने लगे—'हाय ! बड़े दुःखकी बात है कि जन्म, जरा, रोग और मरण आदिके कारण समस्त लोकोंकी जो अत्यन्त कष्टप्रद चञ्चल दशाएँ हैं, उन्हींमें मैं वशपूर्वक लोट-पोट रहा हूँ—आवागमनके चक्करमें पड़ा हुआ हूँ । जिस कालका कभी अन्त नहीं होना, उसका एक अत्यन्त अल्पतम अंश मेरा जीवन है । उस क्षणिक जीवनमें मैं आसक्त हो रहा हूँ, अपने मनको बाँधे रखता हूँ । केवल जीवन-कालतक रहनेवाला मेरा यह राज्य कितना है ? कुछ भी तो नहीं है ! परंतु इतनेसे ही संतुष्ट होकर मैं मूर्ख मनुष्यके समान क्यों निश्चिन्त बैठा हूँ ?—मुझे अपनी इस मूढ़तापर दुःख क्यों नहीं होता ? इस जगत्‌में ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, जो सत्य हो, रमणीय हो, उदार हो और किसीसे उत्पन्न न होकर नित्य निर्विकाररूपसे स्थित हो । फिर मेरी बुद्धि यहाँ किसमें लगे ?—कहाँ शान्ति प्राप्त करे ? जो वस्तु दूरस्थ कही जाती है, वह भी वास्तवमें दूर नहीं है; क्योंकि वह मेरे मनमें वर्तमान है । ऐसा निश्चय करके मैं बाह्य पदार्थोंकी भावना (चिन्तन) का त्याग कर रहा हूँ । प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन और प्रतिक्षण जो दुःखसे भरे हुए सांसारिक सुख बारबार उत्पन्न होते हैं, वे वास्तवमें दुःखरूप ही हैं । आज जो बड़े-बड़े लोगोंके सिरमौर बने हुए हैं वे ही कुछ दिनोंमें नीचे गिर जाते हैं । ऐ मेरे अभागे चित्त ! फिर इस जगत्‌की महत्तामें तुम्हारा यह कैसा विश्वास है ? यद्यपि मैं बुद्धिमान् हूँ, तो भी जैसे सूर्यदेवके समक्ष उनके प्रकाशको ढक लेनेवाला काला मेघ आ जाता है, उसी प्रकार मेरे सामने यह आत्माके प्रकाशको छिपा देनेवाला मोह सहसा कहाँसे आ गया ? ये महान् भोग मेरे कौन हैं ? ये भाई-बन्धु भी मेरे कौन हैं ? जैसे बालक मिथ्या ही भूतके भयसे व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार मैं इनमें ममतारूपी झूठे सम्बन्धकी कल्पना करके व्याकुल हो रहा हूँ ।

'मैं इन भोगों और सम्बन्धियोंमें स्वयं ही यह आस्था क्यों बाँध रहा हूँ ? यह आस्था तो जरा और मृत्युकी सहेली है—उनकी प्राप्ति करानेवाली है । साथ ही सदा उद्वेगमें डाले रखनेवाली है । यह भोगों और बन्धु-बान्धवोंकी सम्पत्ति चली जाय या भलीभाँति स्थिर होकर रहे, इसके प्रति मेरा क्या आग्रह है ! जलमें उठनेवाले बुद्बुदकी शोभा जैसे मिथ्या होता है, उसी तरह यह

२५८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भोग आदि सम्पत्ति, जो इस रूपमें उपस्थित हुई है, मिथ्या ही है। प्राचीन नरेशोंके वे महान् वैभव, वे भोग और वे अच्छे-अच्छे स्नेही बन्धु-बान्धव आज कहाँ हैं? वे सब इस समय स्मृतिपथको प्राप्त हो गये हैं—अब उनका केवल स्मरणमात्र यहाँ शेष रह गया है। वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं हैं। इस दृष्टान्तको सामने रखते हुए वर्तमान भोग आदि सम्पत्तिपर भी क्या आस्था हो सकती है ? पूर्ववर्ती भूमिपालोंके वे धन कहाँ हैं ? पूर्वकल्पोंमें ब्रह्माजीने जिनकी सृष्टि की थी, वे जगत् कहाँ चले गये ? जब पहलेका सब कुछ नष्ट हो गया, तब आजके इन वैभव-भोगोंपर मेरा यह कैसा विश्वास है ? जैसे जलमें अनन्त बुद्बुद उठते और विलीन होते हैं, उसी तरह लाखों इन्द्र कालके गालमें चले गये, तो भी मैं इस जीवनमें आस्था बाँधे बैठा हूँ! साधु पुरुष मेरी इस मूढ़ता-पर हँसेंगे। करोड़ों ब्रह्मा चले गये। कितनी ही सृष्टि-परम्पराएँ आयीं और चली गयीं। असंख्य भूपाल धूलके समान उड़ गये। फिर मेरे इस तुच्छ जीवनपर क्या आस्था हो सकती है ? यह, वह और मैं—यह तीन प्रकारकी कल्पना असत्यरूप ही है। अहंकाररूपी पिशाचसे ग्रस्त हुए मनुष्यकी भाँति मैं क्यों अबतक मूर्खके समान विचारशून्य होकर बैठा रहा ? मैं इस व्याप्त हुई कालकी सूक्ष्म रेखासे प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली अपनी आयुको देखता हुआ भी नहीं देखता ! यद्यपि दिन-पर-दिन निरन्तर अब भी आते-जाते रहते हैं; फिर भी आजतक एक दिन भी ऐसा नहीं देखा, जिसमें मुझे नित्य एक सत्य परमात्मवस्तुका साक्षात्कार हुआ हो। मैं कष्टसे भी अत्यन्त कष्टको प्राप्त हुआ, एक दुःखसे दूसरे महान् दुःखमें फँसता गया; परंतु आज भी इस जगत्के भोगोंसे विरक्त नहीं हुआ। जिन-जिन सुन्दर वस्तुओंमें मैंने दृढ़तापूर्वक स्नेह बाँधा, वे सब-की-सब नष्ट होती दिखायी दीं। फिर इस संसारमें उत्तम वस्तु क्या है ? मनुष्य जगत्के जिन-जिन पदार्थोंमें आस्था बाँधता है—विश्वास करता है, उन-उन पदार्थोंमें उस मनुष्यके दुःखका प्रादुर्भाव बारंबार देखा गया है। मूढ़ मनुष्य बाल्यावस्था में एकमात्र अज्ञानसे पीड़ित रहता है, युवावस्था में कामदेवके बाणोंसे घायल रहता है तथा अन्तिम अवस्था में स्त्री आदि कुटुम्बके पालन-पोषणकी चिन्तासे जलता रहता है। भला, अपने उद्धारका साधन वह कब करे ? दुर्बुद्धि पुरुष इस उत्पत्ति-विनाश-शील, रसहीन, विषम दुर्दशाओंसे दूषित तथा असार संसारमें क्या सार वस्तु देख रहा है ! कोई सामर्थ्यशाली पुरुष राजसूय और अश्वमेध आदि सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी अधिक-से-अधिक महाकल्पपर्यन्त उपभोगमें आनेवाले स्वर्गको ही पाता है, जो महाकालकी दृष्टिसे उसका एक अत्यन्त अल्पतम अंश है। स्वर्गसे अधिक जो अनन्त, नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म है, उसकी प्राप्ति उसे नहीं होती। कौन-सा वह स्वर्ग है और इस पृथ्वीपर या पातालमें कौन-सा ऐसा प्रदेश है, जहाँ दुष्ट अमरियोंकी भाँति ये आपत्तियाँ जीवको अभिभूत नहीं करतीं। ये आधियाँ (मानसी व्यथाएँ) अपने ही चित्तरूपी बिलमें रहनेवाले सर्प हैं और ये व्याधियाँ शरीररूपी स्थलके खुदे हुए क्षुद्र जलाशय हैं। इनका निवारण कैसे किया जा सकता है।

'सत् (वर्तमानकालिक दृश्य) के सिरपर असत्ता (विनाशशीलता) बैठी है। रमणीय पदार्थोंके मस्तक-पर अरम्यता विराज रही है और सुखोंके माथेपर दुःख चढ़े हुए हैं। भला, इनमें कौन-सी ऐसी एकमात्र सत्य वस्तु है, जिसका मैं आश्रय लूँ ? (तात्पर्य यह कि ये सभी वस्तुएँ मिथ्या हैं) अज्ञानसे मोहित क्षुद्र प्राणी जन्म लेते और मरते हैं। यह पृथ्वी उन्हीं लोगोंसे ठसा-ठस भरी है। जो साधुओंसे भी बढ़कर साधु हैं, ऐसे महापुरुष इस संसारमे दुर्लभ हैं। नील कमलके समान मनोहर और भ्रमरके समान चञ्चल नेत्रवाली जो उत्कृष्ट प्रेमसे विभूषित विलासिनी वनिताएँ हैं, वे भी क्षणभङ्गुर होनेके कारण उपहासके ही योग्य हैं। संसारमें रमणीयसे

उपशम-प्रकरण ] * राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना * २५९

भी रमणीय और सुस्थिरसे भी सुस्थिर पदार्थ हैं, किंतु यह सारी पदार्थ-सम्पत्ति अन्ततोगत्वा चिन्ता और दुःखका ही कारण होती है। फिर तुम उसकी इच्छा क्यों करते हो ? वे स्त्री, धन और गृह आदि विचित्र सम्पत्तियाँ यदि चित्तसे आदरणीय हों तो वे भी बहुत प्रयत्नोंसे प्राप्त करने योग्य, दुःखसे रक्षणीय तथा अवश्य विनाशशील होनेके कारण महाविपत्तिरूप ही हैं—ऐसा मेरा मत है। किंतु यदि धन, सम्पत्ति और बन्धुजनोंसे वियोगरूप आपत्तियाँ भी साधुसङ्ग, तपस्या और ज्ञान आदिकी प्राप्ति करा देनेके कारण विचित्र एव कल्याणकारिणी हैं—ऐसा मनमें विश्वास हो जाय तो वे भी विवेक-वैराग्य आदि महान् आरम्भोंसे युक्त सम्पत्तियाँ ही हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। समुद्रमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति क्षण-भङ्गुर, मिथ्यारूप, एकमात्र मनका परिणामस्वरूप जो यह जगत् है, इसमें 'यह मेरा है' यह अपूर्व पद-वाक्यरूप अक्षरमाला कहाँसे आयी ? अर्थात् इसमें ममता करना व्यर्थ है। अग्निकी शिखाओंमें आसक्त हुए फतिंगोंकी भाँति मैं देश, काल और वस्तुसे सीमित तथा त्रिविध तापोंसे संतप्त किन सुख-नामक दृष्टियोंमें अनुरक्त हो रहा हूँ ? निरन्तर दग्ध करनेवाली रौरव नरककी आगमें लोटना अच्छा है, परंतु सुख-दुःखके परिवर्तनसे युक्त विषयभोग-रूप संसारमें रहना अच्छा नहीं। संसार ही समस्त दुःखोंकी चरम सीमा कहलाता है। उसके भीतर पड़े हुए शरीरमें सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। जो बाह्य आकारमात्रसे रमणीय प्रतीत होनेवाली किंतु विनाशकी प्राप्ति करानेवाली हैं, मनरूपी बंदरकी उन चपलता रूप वृत्तियोंका अनुभव हो जानेपर मैं आजसे ही इनमें रमण नहीं करूँगा। जो सैकड़ों आशारूपी पाशोंसे ओतप्रोत तथा अधोगति, ऊर्ध्वगति एवं संतापको देनेवाली हैं, उन संसारकी वृत्तियोंको मैंने बहुत भोग लिया। अब मैं इनसे विश्राम लेता हूँ। मैं प्रबुद्ध (जगा हुआ) हूँ तथा हर्ष एवं उत्साहसे भरपूर हूँ। अपने पारमार्थिक धनको चुरानेवाले मन नामक चोरको मैंने देख लिया है। अतः अब इसे मैं मारे डालता हूँ; क्योंकि इस मनने चिरकालसे मुझे मारा है—मेरा पतन कराया है। जैसे सूर्यकी धूपसे ओस या पालेके कण गल जाते हैं, उसी तरह मेरा मन यथार्थ ज्ञानद्वारा ब्रह्मतत्त्वमें नित्य-निरन्तर स्थिति प्राप्त करनेके लिये बहुत शीघ्र लयको प्राप्त होगा। सिद्ध महापुरुषोंने नाना प्रकारके उपदेशोंद्वारा मुझे अच्छी तरह बोध करा दिया है। अब मैं परमानन्दरूप परमात्मामें प्रवेश कर रहा हूँ। परमात्मारूपी मणिको पाकर एकान्तमें उसीको देखता हुआ मैं अन्य सारी इच्छाओंको शान्त करके सुखपूर्वक स्थित होऊँगा। 'यह देह मैं हूँ, यह विस्तृत धन-राज्य आदि मेरा है' इस प्रकार अन्तःकरणमें स्फुरित हुए असत्यरूपका यथार्थज्ञानके द्वारा नाश करके अत्यन्त बलशाली मनरूपी शत्रुको ध्यानके अभ्याससे अच्छी तरह मारकर मैं अतिशय शान्तिको प्राप्त हो रहा हूँ।' (सर्ग ९)


राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! राजा जनक जब इस प्रकार चिन्तन कर रहे थे, उस समय प्रतिहारने उनके पास जाकर नैत्यिक कार्य करनेके निमित्त उठनेके लिये अनुरोध किया; परंतु राजा

२६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पूर्ववत् संसारकी विचित्र स्थितिपर ही विचार करते रहे।

राजा बोले—जो सुखदरूपसे स्थित है, यह राज्य कितने दिनका है ? मुझे यहाँ इस क्षणभङ्गुर राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। यह सभी मायाका मिथ्या आडम्बर है। मैं इसका त्याग करके प्रशान्त महासागरकी भाँति शान्त रहकर एकान्तमें ही स्थित रहूँगा। ऐ मेरे चित्त ! बारंबार भोगोंके आस्वादनमें जो वेगपूर्वक तेरी प्रवृत्ति हो रही है, यह बड़ी घृणित है। इससे तू दूर हो जा। तेरी जो भोग भोगनेकी चतुरता है, उसे जन्म, जरा एवं जडताके समूहरूपी कीचड़की शान्तिके लिये त्याग दे। चित्त ! तू जिन-जिन अवस्थाओंमें भ्रमवश सुख देखता है, उन्हींसे तुझे महान् दुःखकी प्राप्ति होगी । इसलिये इस तुच्छ भोग-चिन्तनसे कोई लाभ नहीं है।

ऐसा विचार करके राजा जनक मौन हो गये । उनके चित्तकी चपलता शान्त हो चुकी थी। इसलिये वे चित्रलिखित पुरुषकी भाँति अचलभावसे स्थित हो गये और पुनः इस प्रकार विचार करने लगे—'मुझे कोई भी क्रिया करनेसे क्या प्रयोजन है और कुछ न करके निष्क्रिय होकर बैठ रहनेसे भी क्या मतलब है ? इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो उत्पन्न होकर विनाशको न प्राप्त हो। मिथ्यारूपसे प्रकट हुआ यह शरीर कर्म करे या निष्क्रिय होकर बैठा रहे, सर्वत्र समान-भावसे स्थित हुए मुझ विशुद्ध चेतनकी इससे क्या क्षति होनेवाली है ? मैं न तो अप्राप्त वस्तुकी इच्छा करता हूँ और न प्राप्त वस्तुका त्याग ही । मेरा इस जगत्में न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न न करनेसे ही । करने या न करनेसे जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह सब असन्मय—विनाशशील ही है । इसलिये यह शरीर उठकर क्रमशः प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन करे। यह निश्चेष्ट होकर क्यों सूख रहा है ?'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा विचार करके वे राजा जनक अनासक्त भावसे न्यायतः प्राप्त हुए कर्तव्य कर्मका सम्पादन करनेके लिये उठे । उन्होंने श्रेष्ठ पुरुषोंके समादरपूर्वक उस दिनका सारा कार्य भलीभाँति पूर्ण करके उसी ध्यानरूप विनोदसे अकेले ही रात बितायी । जब रात बीतने लगी, तब विषय-भ्रमसे रहित मनको समरस ( एकाग्र ) करके उन्होंने अपने चित्तको इस प्रकार समझाना आरम्भ किया—'ऐ मेरे चञ्चल चित्त ! यह संसार आत्माके सुखका साधन नहीं है । तुम शमका आश्रय लो । शमसे शान्त ( विक्षेप-रहित ) सारभूत आत्मसुखकी प्राप्ति होती है । जैसे-जैसे तुम विचित्र विकल्पोंका संकल्प करते हो, वैसे-ही-वैसे तुम्हारे विषय-चिन्तनसे यह संसार अनायास ही वृद्धिको प्राप्त होता है । दुष्ट मन ! जैसे वृक्षको सींचनेसे उसमें सैकड़ों शाखाएँ निकल आती हैं, उसी प्रकार तुम भी विषयभोगकी इच्छा करनेसे अनन्त आन्तरिक व्यथाओंसे युक्त हो जाते हो। जन्म तथा संसारकी सृष्टियाँ विषय-चिन्ताओंके विलाससे ही प्रकट हुई हैं; इसलिये तुम नाना प्रकारकी चिन्ताओंका त्याग करके उपशमको प्राप्त होओ—संसारसे उपरत हो जाओ।

उपशम-प्रकरण ] * राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचारके माहात्म्यका वर्णन * २६१

सुन्दर चित्त ! इस चञ्चल संसारसृष्टिको और शान्तिके सुखको विचारकी तराजूमें रखकर तौलो। यदि तुम्हें संसारकी सृष्टिमें ही सार प्रतीत हो तो इसीका आश्रय लो; नहीं तो शान्तस्वरूप ब्रह्ममें स्थित हो जाओ। मेरे अच्छे मन ! पहिलेसे अविद्यमान यह दृश्य-प्रपञ्च उत्पन्न हो जाय अथवा यह वर्तमान दृश्य नष्ट हो जाय, तुम इसके गुणों और अवगुणोंसे—उदय और नाशसे हर्ष-विषादरूप विषमताको न प्राप्त होओ। इस दृश्य वस्तु संसारके साथ तुम्हारा थोड़ा-सा भी सम्बन्ध नहीं है। इसका रूप है ही नहीं। ऐसे मिथ्या दृश्य जगत्से तुम्हारा इस तरहका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता है। सुन्दर चित्त ! यदि यह दृश्य जगत् असत् है और तुम सत्य हो तो तुम्हीं बतलाओ, सत् और असत्‌में, जीवित और मृतमें कैसे सम्बन्ध स्थापित हो सकता है ? चित्त ! यदि तुम और दृश्य जगत् दोनों ही सत् और सदा साथ रहनेवाले हो, तब तुम्हारे लिये हर्ष और विषादका अवसर ही कहाँ है ? इसलिये इस विशाल आन्तरिक व्यथाका त्याग करो। आत्मानन्दको, जो मौन होकर सो रहा है, विवेक-वैराग्यसे जगाओ और इस अमङ्गलमयी स्थिति—चञ्चलताको छोड़ो। अरे शठ चित्त ! जड़ दृश्यरूप इस संसारमें ऐसी कोई उन्नत और उत्तम वस्तु नहीं है, जिसकी प्राप्ति होनेसे तुम्हें परम परिपूर्णता प्राप्त हो जाय। इसलिये अभ्यास और वैराग्यके बलसे अत्यन्त धीरताका आश्रय ले चञ्चलताको त्याग दो।' (सर्ग १०-११)


राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचार एवं प्रजाके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उस समय इस प्रकार विचार करके धीरबुद्धि राजा जनक अपने राज्यके सारे काम-काज सँभालने लगे। फिर उन्हें मोह नहीं हुआ (उनके मनमें ममता और आसक्ति नहीं जागी)। उनका मन कहीं हर्षके स्थानोंमें किञ्चिन्मात्र भी उल्लासको प्राप्त नहीं हुआ। जैसे केवल सुषुप्तिमें स्थिति हो, उस प्रकार सदा ही विक्षेपरहित एवं शान्तभावसे स्थिर रहा। तबसे लेकर उन्होंने न तो दृश्य जगत्‌को मनसे ग्रहण किया और न उसका त्याग ही किया। केवल वर्तमान संसारमें वे निःशङ्क होकर स्थित रहे। इस प्रकार आत्मविवेकके अनुसंधानसे राजा जनकका परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान अनन्त एवं अत्यन्त विशुद्ध हो गया। सम्पूर्ण भूतोंके आत्मस्वरूप परमात्माको जानने तथा आत्माकी अनन्तताका अनुभव करनेवाले राजाने चिन्मय परमात्मामें स्थित सारे पदार्थोंको आत्मभूत देखा—अपने आत्माके रूपमें अनुभव किया। वे न तो अनुकूल वस्तुको पाकर हर्षसे उल्लसित हुए और न कभी प्रतिकूल वस्तुको पाकर शोकसे आतुर ही हुए। सब कुछ प्रकृतिका व्यवहार होनेके कारण वे

२६२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उसमें सदा ही समचित्त एवं विकारशून्य होकर रहे। तभीसे लोकमें सगुण-निर्गुण परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेवाले और समस्त प्राणियोंको सम्मान देनेवाले वे राजा जनक परमात्माके यथार्थ ज्ञानमें निपुण हो जीवन्मुक्त हो गये। वे लोगोंको प्राणोंके समान प्रिय थे और विदेह देशका राज्य करते हुए कभी हर्ष और विषादके वशीभूत हो संतप्त नहीं होते थे। सुषुप्तावस्थामें स्थितकी भाँति राजा जनककी राग-द्वेष आदि समस्त वासनाएँ सम्पूर्ण पदार्थोंसे सर्वथा निवृत्त हो गयी थीं। वे न कभी भूतकी चिन्ता करते और न भविष्यका अनुसंधान। वर्तमान कालका ही वे प्रसन्नतापूर्वक अनुसरण करते थे। कमलनयन श्रीराम ! अपने परमात्मविषयक विवेकपूर्ण विचारधारा ही राजा जनकको पानेयोग्य परब्रह्म परमात्म-रूप वस्तुकी पूर्णतया प्राप्ति हो गयी।

अपने चित्तसे तबतक परमात्मतत्त्वका विचार करते रहना चाहिये, जबतक विचारोंकी सीमाका अन्त (परमात्माका यथार्थ ज्ञानरूप फल) प्राप्त न हो जाय। महापुरुषोंके सङ्गसे निर्मलतारूप अभ्युदयको प्राप्त हुए चित्तके विवेकपूर्वक शुद्ध विचारसे जो परमात्मरूप परमपद प्राप्त होता है, वह न तो गुरुके उपदेशसे, न शास्त्रार्थसे और न पुण्यसे ही प्राप्त होता है। श्रीराम ! अपने मित्रके तुल्य स्थिर, शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धिसे जो उत्तम पद प्राप्त होता है, वह दूसरी किसी क्रियासे नहीं होता। जिस पुरुषकी पूर्वापरका विचार करनेवाली कुशाग्र एवं तीक्ष्ण प्रज्ञारूपी दीपशिखा प्रज्वलित है, उसे कभी अज्ञानरूपी अन्धकार क्लेश नहीं पहुँचाता। महामते ! दुःखरूपी उत्ताल तरङ्गोंसे व्याप्त जो विपत्तिरूपिणी दुस्तर सरिताएँ हैं, उनको तीक्ष्ण और विशुद्ध बुद्धिरूपी नौकाद्वारा ही पार किया जाता है। जैसे वायुका हल्का-सा झोंका भी निस्सार तिनकेको उड़ा देता है, उसी प्रकार प्रज्ञाहीन मूढ़ पुरुषको थोड़ी-सी आपत्ति भी शोकाकुल कर देती है।

शत्रुमर्दन श्रीराम ! तीक्ष्ण और विशुद्ध प्रज्ञासे युक्त पुरुष दूसरोंकी सहायता तथा शास्त्राभ्यासके बिना भी संसार-समुद्रसे अनायास ही पार हो जाता है। जैसे फलकी प्राप्तिके लिये सींचने और संरक्षण आदिके द्वारा अंगूर आदिकी लताको बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार शास्त्रोंके अभ्यास और सत्पुरुषोंकी संगतिसे पहले प्रज्ञाको बढ़ाना चाहिये अर्थात् बुद्धिको पवित्र एवं तीक्ष्ण बनाना चाहिये। जैसे चन्द्रमण्डल संसारके अन्धकारको दूर करनेवाली चाँदनीको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार निष्काम कर्मरूपी वृक्ष, जिसका शुद्ध तीक्ष्ण प्रज्ञाबल ही महान् मूल है परम रसमय परमात्माकी प्राप्तिरूप फलको उत्पन्न करता है। लोग धन-सम्पत्ति आदि बाह्य पदार्थोंके उपार्जनके लिये जैसा प्रयत्न करते हैं, वही यत्न पहले विशुद्ध बुद्धिकी अभिवृद्धिके लिये करना चाहिये। बुद्धिकी मन्दता समस्त दुःखोंकी चरम सीमा है, विपत्तियोंका सबसे बड़ा भंडार है और संसाररूपी वृक्षोंका बीज है; अतः उसका यत्नपूर्वक विनाश करना चाहिये।

रघुनन्दन ! न दानोंसे, न तीर्थोंसे और न तपस्यासे ही भयंकर संसार-सागरको पार किया जा सकता है। केवल पवित्र एवं अविचल बुद्धिरूपी जहाजका आश्रय लेनेसे ही उसके पार पहुँचा जा सकता है। पृथ्वीपर विचरनेवाले मनुष्योंको भी जो दैवी सम्पत्ति प्राप्त होती है, वह शुद्ध एवं अविचल प्रज्ञामयी लतासे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट फल है। जिन सिंहोंने अपने पंजोंसे मत्त गजराजोंके कुम्भस्थल विदीर्ण कर डाले थे, वे भी सियारोंद्वारा बुद्धि-बलसे इस तरह पराजित हुए हैं, जैसे सिंहोंसे हरिन। विवेकी पुरुषके हृदयरूपी कोशागारमें स्थित यह पवित्र प्रज्ञा चिन्तामणिके समान है। यह कल्पलताकी भाँति मनोवाञ्छित फल देती है। श्रेष्ठ पुरुष पवित्र और अविचल प्रज्ञाके द्वारा संसार-सागरसे पार हो जाता है, किंतु अधम मानव उसमें डूब जाता है। क्यों न

उपशम-प्रकरण ] * चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन * २६३

नौका चलानेकी कलामें शिक्षित हुआ केवट ही नौकासे नदीके पार पहुँचता है, अशिक्षित केवट नहीं। जैसे समुद्रकी भँवरमें चक्कर काटती हुई नौका उसपर चढ़े हुए लोगोंको विपत्तिमें डाल देती है, उसी प्रकार राग, द्वेष, लोभ आदि असन्मार्गमें लगायी गयी अशुद्ध बुद्धि संसारमें भटककर मनुष्यको आपत्तिमें डाल देती है और वही बुद्धि यदि विवेक, वैराग्य आदि सन्मार्गमें लगायी जाय तो वह मनुष्यको भवसागरसे पार कर देती है। जैसे कवच बाँधकर युद्ध करनेवाले योद्धाको बाण पीड़ित नहीं करते, उसी प्रकार विवेकशील, मूढ़तारहित एवं पवित्र बुद्धिवाले पुरुषको तृष्णावर्गके काम, लोभ आदिसे उत्पन्न हुए क्रोध, द्वेष और मोह आदि दोष बाधा नहीं पहुँचाते। रघुवीर! इस लोकमें प्रज्ञारूपी नेत्रसे यह सारा जगत् ठीक-ठीक दिखायी देता है। उस यथार्थदर्शी पुरुषके पास न तो सम्पत्तियाँ आती हैं और न विपत्तियाँ ही। जैसे सूर्यको ढकनेवाला जलमय विस्तृत काला मेघ वायुसे छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार अहंकाररूपी मत्त मेघ जो परमात्मारूपी सूर्यपर आवरण डालनेवाला है, पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिरूपी वायुसे बाधित हो जाता है। परमात्माकी प्राप्तिरूप अनुपम उन्नत पदमें पहुँचनेवाले पुरुषको पहले सत्सङ्ग और विवेक-वैराग्यद्वारा इस बुद्धिका ही शोधन करना चाहिये—ठीक उसी तरह, जैसे धान्य आदिकी वृद्धि चाहनेवाला किसान सबसे पहले पृथ्वीको ही हलसे जोतकर शुद्ध बनाता है। (सर्ग १२)


चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! बिना जीती हुई मनसहित इन्द्रियाँ शत्रुके समान हैं। इन्हें तबतक बारंबार जीतकर परमात्मामें लगानेका प्रयत्न करे, जबतक अन्तःकरण स्वयं ही परमात्माके ध्यानमें एकाग्र होकर शुद्ध एवं प्रसन्न न हो जाय। इस प्रकारके साधनसे नित्य प्रसन्न, सर्वव्यापी, दिव्यस्वरूप, देवेश्वर परमात्माका स्वतः साक्षात्कार हो जाता है और ऐसा होनेपर सारी दुःख-दृष्टियाँ नष्ट हो जाती हैं। उस सगुण-निर्गुणरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार होनेपर हृदयग्रन्थिरूपी कुदृष्टियाँ जो मोहरूपी बीजकी मुट्ठियाँ और नाना प्रकारकी आपत्तियोंकी दृष्टियाँ हैं, नष्ट हो जाती हैं। नित्य आन्तरिक विचारवाले और जगत्‌को क्षणभङ्गुर देखनेवाले पुरुषका अन्तःकरण राजा जनकके अन्तःकरणकी तरह समय आनेपर अपने-आप ही शुद्ध हो जाता है। संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंके लिये सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानरूप परम पुरुषार्थको छोड़कर न दैव शरण देनेवाला है न कर्म, न धन आश्रय देनेवाला है न भाई-बन्धु (अपने उद्धारके लिये इनमेंसे कोई भी आश्रय लेने योग्य नहीं है, केवल एकमात्र परमात्मा ही शरण लेने योग्य है)।

तात! जो लोग विवेक, वैराग्य, विचार, उपासना और धर्मपालन आदि उत्तम कार्योंमें भाग्यके अधीन रहते हैं तथा मिथ्या विपरीत कल्पनाएँ करते रहते हैं, उनकी मन्दमति विनाशकी ओर ले जानेवाली है; अतः उसका अनुसरण नहीं करना चाहिये। उत्तम विवेकका आश्रय ले अपने आत्माका अपने ही द्वारा अनुभव करके परम वैराग्यसे पुष्ट हुई पवित्र एवं सूक्ष्म बुद्धिरूप नौकाद्वारा संसार-सागरको पार करे। श्रीराम! यह मैंने तुमसे आकाशसे गिरनेवाले फलके समान शीघ्रतापूर्वक होनेवाली ज्ञान-प्राप्तिका वर्णन किया है। यह ज्ञान अज्ञानरूपी वृक्षको काट डालनेवाला तथा निरतिशय सुख प्रदान करनेवाला है। वाञ्छित (मनके अनुकूल) और अवाञ्छित (मनके प्रतिकूल) वस्तुकी आशङ्कारूपिणी चञ्चल वानरियाँ जिस चित्तरूपी वृक्षपर कूद-फाँद मचाये रहती हैं, उसमें सौम्यता (शान्ति) कहाँसे आ सकती है।

निष्कामता, निर्भयता, स्थिरता, समता, ज्ञान, निरीहता, निष्क्रियता, सौम्यता, निर्विकल्पता, धैर्य, मैत्री,

सं० यो० व० अं० १०—

२६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


मननशीलता, संतोष, मृदुता और मधुरभाषिता—ये गुण हेय और उपादेयसे रहित ज्ञानी पुरुषमें बिना किसी वासनाके रहते हैं। जैसे बहते हुए जलको बाँधसे रोका जाता है, उसी प्रकार निकृष्ट विषयोंकी ओर दौड़ते हुए मनको विवेक-वैराग्यके बलसे विषयोंकी ओरसे लौटाये अर्थात् चित्तकी बहिर्मुख वृत्तिको विवेक वैराग्यद्वारा अन्तर्मुखी करे। श्रीराम ! मोह संसारको भूलकर फिर नहीं प्रस्फुटित होता और संसार चित्तको भुलाकर फिर नहीं अङ्कुरित होता। खड़े होते, चलते, सोते, जागते, कहीं निवास करते, उछलते और गिरते-पड़ते यह 'दृश्य-प्रपञ्च असत् ही है' ऐसा मनमें निश्चय करके इसके प्रति आस्थाका परित्याग कर देना चाहिये। रघुनन्दन ! समताका भलीभाँति आश्रय ले प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन करते हुए अप्राप्तका चिन्तन न करके निर्द्वन्द्व हो इस लोकमें विचरना चाहिये । श्रीराम ! तुम्हीं सर्वज्ञ, तुम्हीं अजन्मा, तुम्हीं सबके आत्मा और तुम्हीं महेश्वर हो। तुम अपने चैतन्यस्वभावसे कभी च्युत नहीं होते, तथापि तुमने इस प्रकार इस संसार-का विस्तार किया है । जिसने सद्रूप आत्मदृश्यमें परमार्थ सत्स्वरूपताकी भावना करके सब ओरसे दूसरी भावनाका परित्याग कर दिया, वह पुरुष हर्ष, क्रोध और विषाद आदिसे होनेवाले दोषोंसे नहीं बँधता । जो राग-द्वेषसे मुक्त है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा संसारकी वासनाओंका त्याग कर चुका है, ऐसा योगी युक्त कहलाता है । वह जो कुछ करता, खाता, देता और नष्ट करता है, उन सब क्रियाओंमें उसकी अहंभावना नहीं होती तथा वह सुख-दुःखमें भी समान भाव रखता है । जो इष्ट और अनिष्टकी भावनाका त्याग करके प्राप्त हुए कार्यको कर्तव्य समझकर ही उसमें प्रवृत्त होता है, उसका कहीं भी पतन नहीं होता । महामते ! यह जगत् चेतनमात्र ही है—इस प्रकारके निश्चयवाला मन जब भोगोंका चिन्तन त्याग देता है, तब वह शान्तिको प्राप्त हो जाता है ।

वास्तवमें तो न मन है, न बुद्धि है और न यह शरीर ही है; केवल एकमात्र आत्मा ही सदा विद्यमान है । आत्मा ही यह सम्पूर्ण जगत् है और आत्मा ही कालक्रम है । वह विशुद्ध आत्मा आकाशसे भी सूक्ष्म होनेके कारण प्रतीत न होनेपर भी ध्रुव सत्य है । सूक्ष्म होनेके कारण प्रत्यक्ष प्रतीत न होनेपर भी यह आत्मा नित्य सत्य चेतनरूप है, अतएव सब प्रकारके लक्षणोंसे अतीत शुद्ध आत्मा केवल अपने अनुभवसे ही जाना जाता है। जहाँ केवल परमात्माकी चेतनता है, वहाँ उसी तरह मनका क्षय हो जाता है, जैसे प्रकाशमें अन्धकारका नाश हो जाता है। अतः उस आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वैराग्यसे, प्राणायामके अभ्याससे, विवेक-विचारसे, दुर्व्यसनोंके विनाशसे तथा परमार्थ-तत्त्वके बोधसे प्राणवायुका निरोध करना चाहिये । जड़ तथा स्वरूप-हीन होनेके कारण मन सदा ही मरा हुआ है । किन्तु आश्चर्य है कि उस मरे हुए मनके द्वारा ही लोग मारे जा रहे हैं । चक्रके समान घूमती हुई यह मूर्खताकी परम्परा बड़ी विचित्र है। अहो ! महामायावी मयासुरका भी निर्माण करनेवाली यह माया अत्यन्त अद्भुत है, जिसके कारण अत्यन्त चञ्चल चित्तके द्वारा भी यह लोक अभिभूत हो रहा है । जब मूर्खता आती है, तब पुरुष सभी आपत्तियोंका भाजन हो जाता है । भला, अज्ञानीपर कौन-सी आपत्ति नहीं आती । देखो, अज्ञानने ही मूर्खता-से इस सृष्टिको उत्पन्न किया है । हाय ! बड़े क्लेशकी बात है कि यह सृष्टि दुर्बुद्धिके कारण मूर्खताके वशमें पड़ी हुई उसके द्वारा पीड़ित हो रही है, तथापि यह जीव असत्का अनुवर्तन करके उत्तरोत्तर दुःख उठानेके लिये ही इस सृष्टिको उपलब्ध करता है । मैं समझता हूँ, यह मूर्खतामयी सृष्टि अत्यन्त सुकुमार-अविचार-मात्रसे सिद्ध है। अतएव एकमात्र विचारसे ही इसका बाध किया जा सकता है । श्रीराम ! इस मूर्खलोकमयी सृष्टिके रूपमें असद्रूप मन ही प्रकट हुआ है अर्थात्

उपशम-प्रकरण ] * अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन * २६५


यह मनका ही विकार है । जो पुरुष उस मनको वशमें नहीं कर सकता, वह अध्यात्मशास्त्रके उपदेशका पात्र नहीं है। उस पुरुषकी बुद्धि चारों ओरसे विषयोंमें ही आरूढ़ है और उतनेसे ही वह अपनेको परिपूर्ण मानती है, इसीलिये परमात्माकी ओर अभिमुख नहीं होती, सूक्ष्म वस्तुके विचारमें भी समर्थ नहीं हो पाती। इसीलिये उसमें आध्यात्मिक शास्त्रका उपदेश पानेकी योग्यता नहीं होती। (सर्ग १३)


अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता, मनको जीतने या शान्त करनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वबोधसे ही मनके उपशमका कथन; तृष्णाके दोष, वासनाक्षय और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस भूतलपर जो मनुष्य पशु-पक्षियोंके समानधर्मा होकर आहार, निद्रा और मैथुन आदिमें ही लगे हुए हैं, उन्हें उपदेश देना उचित नहीं। भला, वनमें ठूंठे काठके निकट कथाका तात्पर्य कहनेसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? जिन्होंने अपने मनको विषयोंमें फैला रखा है, उन मनुष्योंमें और पशुओंमें क्या अन्तर है ? पशु रस्सीसे बाँधकर खींचे जाते हैं और मूढ़चेता मनुष्य आसक्तिके कारण मनके द्वारा विषयोंकी ओर घसीटे जाते हैं। जिन लोगोंने अपने मनको नहीं जीता है, उन्हें सब ओरसे दुःखदायिनी दशाएँ प्राप्त होती हैं। रघुनन्दन ! जिन्होंने अपने चित्तपर विजय प्राप्त कर ली है, उनके दुःख उत्तम विचारके द्वारा दूर किये जा सकते हैं। इसलिये जिसे ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो चुका है, वह ज्ञानी पुरुष उनके दुःखका मार्जन करनेमें प्रवृत्त हो। इस त्रिगुणात्मक मायामय प्रपञ्चका आश्रय लेना बन्धनमें ही डालनेवाला है। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो यह भव-बन्धनसे छुटकारा दिला सकता है। 'मैं' और 'यह' दोनों ही नहीं हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए तुम अनन्त आकाशके समान विशाल हृदयवाले आत्माके रूपमें प्रतिष्ठित हो पर्वतके समान अविचल-भावसे स्थित हो जाओ । यह सम्पूर्ण जगत् परमात्मा ही है, ऐसे ज्ञानका अन्त:करणमें उदय होनेपर कहाँ चित्त है, कहाँ चेत्य है और क्या चेतन है ? मैं चिन्मय ब्रह्म हूँ, जीव नहीं; क्योंकि वास्तवमें एकमात्र परब्रह्म परमात्माके सिवा जीव नामक कोई अलग पदार्थ नहीं है। यही चित्तकी शान्ति है और इसीको परम सुख कहते हैं। रघुनन्दन ! यह संसार परमात्माका ही स्वरूप है, ऐसा निश्चय हो जानेपर निस्सदेह चित्तकी कोई अलग सत्ता नहीं रह जाती। इस प्रकार परमार्थ-तत्त्वका बोध होनेसे यह जगत् परमात्मा ही है, ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है। उस दशामें जैसे सूर्यके प्रकाशसे अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी तरह मन भलीभाँति गल जाता है। जबतक मनरूपी सर्प इस शरीरमें विद्यमान है, तबतक महान् भय बना रहता है। योगसे उसको मार भगानेपर भयके लिये अवसर ही कहाँ रह जाता है ?

श्रीराम ! तृष्णा विष-लताके समान है। यह बढ़ते हुए महान् मोहको देनेवाली और भयंकर है। वह मनुष्यको केवल मूर्च्छा (अज्ञान) ही देती है (ज्ञान-जनित सुख नहीं)। वर्षा ऋतुकी अँधेरी रातके समान मनमें अनन्त विकार (भय आदि) उत्पन्न करनेवाली यह तृष्णा जब-जब प्रकट होती है, तब-तब महामोह प्रदान करती है। रघुनन्दन ! संसारमें जो दुरन्त, दुर्जर और महान् दुःख हैं, वे तृष्णारूपिणी विष-लताके ही फल हैं। तृष्णासे पीड़ित मनुष्यमें दीनता प्रत्यक्ष देखी गयी है। वह मन मारे रहता है, उसका तेज नष्ट हो जाता है, वह बहुत नीचे गिर जाता है। वह मोहग्रस्त होता, रोता और गिरता रहता है। निश्चय ही जहाँ तृष्णारूपिणी काली रात नष्ट हो गयी है, वहाँ शुद्ध

२६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पक्षके चन्द्रमाकी भाँति सत्कर्म ही बढ़ते हैं। जिस पुरुषरूपी वृक्षमें तृष्णारूपी घुन नहीं लगे हैं, उसमें सदा पुण्यरूपी फूल खिलते हैं, और वह विकासशील अवस्थाको प्राप्त होता है। तृष्णाद्वारा ये सब लोग सूतमें बँधे हुए पक्षीके समान देश-विदेशमें मटकाये जाते, शोकसे जर्जर किये जाते और अन्ततोगत्वा मारे जाते हैं। जैसे हिरन तिनकोंसे आच्छादित हुए गड्ढेके ऊपर रक्खी हुई हरी-हरी घासकी शाखाको चरनेके लिये जाकर उस गड्ढेमें गिर जाता है, उसी प्रकार तृष्णाका अनुसरण करनेवाला मूढ़ मनुष्य नरकमें गिरता है। बुढ़ापा कितना ही बढ़ा हुआ क्यों न हो, वह नेत्रोंको क्षणभरमें उतना जीर्ण (अंधा) नहीं बनाता, जितना हृदयमें रहनेवाली पिशाचीके समान तृष्णा बना देती है। जिसका आकार सम्पूर्ण दुःखोंसे भरा हुआ है और जो जगत्के लोगोंके जीवनका नाश करनेवाली है, उस तृष्णाको क्रूर सर्पिणीके समान दूरसे ही त्याग देना चाहिये।

दूसरोंको मान देनेवाले कमलनयन श्रीराम ! वासनाका त्याग ज्ञेय और ध्येयके भेदसे दो प्रकारका बताया जाता है। सबको ब्रह्मरूपसे समान समझकर मनुष्य ममतासे रहित हो जिस वासनाक्षयका सम्पादन करके शरीरका त्याग करता है, वह ज्ञेय नामक वासनाक्षय कहा गया है। जो अहङ्कारमयी वासनाका त्याग करके लोकसंग्रहोचित व्यवहारमें संलग्न रहता है, वह ध्येय नामक वासनाक्षयसे युक्त हुआ पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। रघुनन्दन ! मूल अज्ञानके सहित सङ्कल्परूप वासनाका त्याग करके जो शान्तिको प्राप्त हुआ है, उस जीवन्मुक्त पुरुषको ज्ञेय नामक वासनात्यागसे सम्पन्न समझ। जनक आदि महात्मा पुरुष ध्येय नामक वासनात्यागका सम्पादन करके जीवन्मुक्त हो लोकसंग्रहके लिये व्यवहारमें स्थित हुए हैं। ज्ञेय नामक वासनात्यागको सम्पन्न करके शान्तिको प्राप्त हुए विदेहमुक्त पुरुष परावरस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित होते हैं। रघुनन्दन ! पूर्वोक्त दोनों ही त्याग समान हैं। दोनों ही प्रकारके त्यागवाले पुरुष मुक्त-पदपर प्रतिष्ठित हैं। ये दोनों ही ब्रह्मभावको प्राप्त हैं और दोनों ही चिन्ता एवं तापसे छुटकारा पा चुके हैं। एक (ध्येय नामक वासनाक्षयसे युक्त) पुरुष इस देहके रहते हुए ही जीवन्मुक्त होकर शोक और चिन्तासे रहित हो जाता है। और (दूसरा ज्ञेय नामक वासनाक्षयसे युक्त) पुरुष देहत्यागके अनन्तर मुक्त (ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित) होता है (उसे विदेहमुक्त कहते हैं)। जो समयानुसार निरन्तर प्राप्त होनेवाले सुखों और दुःखोंमें हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता, वही इस लोकमें मुक्त कहा जाता है। जिस पुरुषका इष्ट वस्तुओंमें राग और अनिष्ट वस्तुओंमें द्वेष नहीं होता, वह मुक्त कहलाता है। जिस पुरुषका अहंता-ममताको लेकर ग्रहण और त्यागरूप संकल्प क्षीण हो गया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। हर्ष, अमर्ष, भय, क्रोध, काम और कायरताकी दृष्टियोंसे जो रहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महर्षि वसिष्ठ जब इतना उपदेश दे चुके, तब दिन बीत गया, सूर्य अस्ताचलको चले गये। उस सभाके सभी सदस्य मुनिको नमस्कार करके सायंकालिक उपासनाके निमित्त स्नान करने चले गये और रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभाभवनमें आ गये।

(सर्ग १४-१६)


जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले विभिन्न प्रकारके निश्चयों तथा सब कुछ ब्रह्म ही है, इस पारमार्थिक स्थितिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो विदेहमुक्त हैं, वे वाणीके विषय नहीं होते (शरीर त्यागकर साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हो जानेकेकारण उनकी महिमातकवाणीकी पहुँच नहीं हो पाती। इसलिये उनकी स्थितिका वर्णन नहीं

उपशम-प्रकरण] * महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त-भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश * २६७

किया जा सकता)। अतः तुम इस जीवन्मुक्तिका वर्णन सुनो। संसार सत्य है, यह समझते हुए जिसके कारण विषय-भोगोंके भोगनेमें दृढ भावना हो गयी है, ऐसी तृष्णाद्वारा जीवकी जो बाह्य पदार्थमें उसकी सत्ताको लेकर आसक्ति है, उसे आचार्यलोग सुदृढ़ संसार-बन्धन कहते हैं। जीवन्मुक्तोंके शरीरके अन्तःकरणमें 'भोग पदार्थ मिथ्या है' इस निश्चयसे हृदयमें भोग संकल्परहित और बाह्य संसारमें विहार करनेवाली स्फुरणा हुआ करती है। महामते श्रीराम ! 'यह मुझे प्राप्त हो' इस प्रकारकी जो हृदयमें भावना है, उसे तुम तृष्णा और सङ्कल्प नामक शृङ्खला समझो। उस तृष्णाका सत् और असत् सभी पदार्थोंमें सदा त्याग करके जो परम उदार हो गया है, वह महामनस्वी पुरुष जीवन्मुक्ति पदको प्राप्त करता है।

श्रीराम ! विचारवान् पुरुषके हृदयमें चार प्रकारका दृढ़ निश्चय होता है—पहला निश्चय यह है कि 'मैं सिरसे लेकर पैरतक माता-पिताके द्वारा रचा गया हूँ; यह असत् दृष्टि है। इसके कारण मनुष्यको बन्धन प्राप्त होता है। मैं देह-इन्द्रिय आदि सब पदार्थोंसे रहित तथा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर हूँ,—ऐसा जो दूसरा निश्चय है, वह साधुपुरुषोंको मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला होता है। रघुनन्दन ! 'जगत्के सब पदार्थ मुझ अविनाशी परमात्माके ही स्वरूप हैं' इस तरहका तीसरा निश्चय भी मोक्षकी ही प्राप्ति करानेवाला है। 'अहंकार अथवा यह सारा जगत् सदा आकाशके समान शून्य ही है' ऐसा जो चौथा निश्चय है, वह भी मोक्षकी ही सिद्धिका कारण होता है। इन चार निश्चयोंमें जो पहला है, उसे बन्धनकारक कहा गया है। शुद्ध भावनासे उत्पन्न हुए शेष तीन प्रकारके निश्चय मोक्षदायक बताये गये हैं।

महामते ! मैं आत्मा ही सब कुछ हूँ—इस प्रकारका जो निश्चय है, उसे पाकर ही मेरी बुद्धि फिर कभी विषादको नहीं प्राप्त होती। आत्माकी महिमा ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें—सर्वत्र व्यापक है। सब आत्मा ही है, ऐसे आन्तरिक निश्चयसे युक्त पुरुष कभी बन्धनमें नहीं पड़ता। जैसे अपार महासागर पातालतक जलसे भरा हुआ है, वैसे ही ब्रह्मासे लेकर कीट-पतङ्गतक सारा जगत् परमात्मासे परिपूर्ण है। इसलिये एकमात्र ब्रह्म ही नित्य और सत्य है। उससे अतिरिक्त जगत्की कोई सत्ता नहीं है—ठीक वैसे ही जैसे सारा समुद्र जल ही है, उससे भिन्न तरङ्ग आदि कुछ नहीं हैं। जैसे सोनेके कड़े, बाजूबंद और नूपुर आदि सुवर्णसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह वृक्ष, तृण आदि कोटि-कोटि पदार्थ आत्मासे भिन्न नहीं हैं। परमात्ममयी अद्वैतशक्ति ही द्वैत और अद्वैतके भेदसे जगन्निर्माणकी लीलाको करती हुई विस्तारको प्राप्त होती है। वास्तवमें न तो अहंकार है और न यह जगत् ही है। यह सब कुछ केवल निर्विकार शान्त विज्ञानानन्दघन ही प्रकाशित हो रहा है। यह संसार न तो असत् है और न सत् ही है—सदा यही समझना चाहिये। परम, अमृत, अनादि, सब ज्योतियोंको प्रकाशित करनेवाला, अजर, अजन्मा, अचिन्त्य, निष्कल, निर्विकार, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित, प्राणोंका भी प्राण, समस्त सङ्कल्पोंसे रहित, कारणोंका भी कारण, नित्य उदित, परमात्मा, व्यापक, चिन्मय प्रकाशस्वरूप आकाशमें परिपूर्ण, अनुभवका बीज (कारण), अपने आपमें ही अपने आपका अनुभव करने योग्य, आन्तरिक आनन्दानुभवस्वरूप ब्रह्म ही तुम, मैं और जगत् है। उससे भिन्न कुछ नहीं है। इस प्रकारका निश्चय तुम्हें करना चाहिये। (सर्ग १७)


महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त-भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! जिनका चित्त एकाग्र है तथा जो काम, लोभ आदि कुदृष्टियोंसे

आहत नहीं हुए हैं, इस संसारमें लीलापूर्वक विचरनेवाले उन महापुरुषोंका निम्नाङ्कित स्वभाव बताया जा रहा है।

२६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जीवन्मुक्त चित्तवाला मुनि इस संसारमें विचरण करता हुआ भी आदि, मध्य और अन्तमें—सदा ही रसहीन जो जगत्की अवस्थाएँ हैं, उनको उपहासके योग्य समझे। जो न तो प्राप्त हुई प्रिय वस्तुका अभिनन्दन करता है, न अप्रियसे द्वेष करता है, न नष्ट हुई वस्तुके लिये शोक करता है और न अप्राप्त वस्तुको पानेकी इच्छा ही करता है, सदा मननशील रहकर कर्तव्य कर्ममें आलस्य छोड़कर प्रवृत्त होता है, वह पुरुष संसारमें कभी दुखी नहीं होता। जो पूछनेपर प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन करता है, न पूछनेपर मौन हो सूखे काठकी भाँति अविचलभावसे स्थित रहता है तथा इच्छा और अनिच्छाके बन्धनसे मुक्त है, वह पुरुष संसारमें दुखी नहीं होता। जो सबके अनुकूल बोलता, किसीके पूछने या प्रेरणा करनेपर सुन्दर उक्तियोंद्वारा समाधान करता और प्राणियोंके मनोभावको समझ लेता है, वह पुरुष संसारमें दुखी नहीं होता। वह परम पदमें आरूढ़ हो जगत्की क्षणभङ्गुर अवस्थाको अपनी शान्तबुद्धिके द्वारा हँसता हुआ-सा देखता है। रघुनन्दन ! जिन्होंने अपने चित्तको जीत लिया है और परावरस्वरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात् करके जो महात्मा हो गये हैं, उन्हींका ऐसा स्वभाव मैंने तुम्हें बताया है।

अपने चित्तको न जीतनेवाले मूढ़ मनुष्योंके जो यज्ञ आदि कर्म हैं, वे फलकी कामनासे युक्त होते हैं, नाना प्रकारके दम्भ, मान, मद आदि दुर्गुणोंसे भरे होते हैं; अतएव पुनर्जन्म आदिके कारण होनेवाले सुख-दुःखोंसे परिपूर्ण हुआ करते हैं। इसलिये हम उन मूढ़ मनुष्योंके उद्धारका कोई उपाय नहीं बता सकते। रघुनन्दन ! तुम तो भीतरसे सब आशाओंका त्याग करके, वीतराग और वासनाशून्य हो बाहरसे समस्त सत्कर्मोंका एवं सदाचारोंका ठीक-ठीक पालन करते हुए संसारमें विचरो। श्रीराम ! तुम उदार, सदाचारी, समस्त शास्त्रीय कर्मोंका भलीभाँति आचरण करनेवाले तथा भीतर सम्पूर्ण कामनाओं और आसक्तियोंसे शून्य हो संसारमें विचरण करो। रघुनन्दन ! तुम सब पदार्थोंका यथार्थ रहस्य एवं अन्तर जान चुके हो; इसलिये जैसी अभीष्ट हो वैसी ही दृष्टिसे देखते हुए अनासक्तभावसे संसारमें विचरो। श्रीराम ! अहंकारसे रहित, अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित आकाशके समान निर्लेप एवं निर्मल तथा कलङ्कसे दूर रहकर संसारमें विचरण करो। राघव ! सैकड़ों आशारूपी पाशोंसे नित्य मुक्त, सब पदार्थोंमें सम तथा बाहर प्रजाओंके हितकर कार्योंमें तत्पर रहकर तुम लोकमें विचरो। वास्तवमें जीवात्माका न तो बन्धन है और न मोक्ष ही है। यह मिथ्या माया इन्द्रजालकी भाँति संसारमें मटकानेवाली है। आत्मा तो सर्वथा एकरूप, सर्वव्यापी और आसक्तिके बन्धनसे रहित है; फिर उसका बन्धन कैसे हो सकता है। और जब वह बँधा ही नहीं है, तब किसके लिये मोक्षका विधान होगा। यह भ्रान्तरूप विशाल संसार यथार्थ तत्त्वको न जाननेके कारण अज्ञानसे ही उत्पन्न हुआ है। यथार्थ तत्त्वका ज्ञान होनेसे यह उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे रस्सीका ज्ञान होनेसे उसमें सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है। तुम अनन्त, सत्स्वरूप एवं आकाशके समान व्यापक हो। ज्वालाओंके मध्य-भागकी भाँति प्रकाशमान एवं नित्य शुद्ध हो। तुम्हारा स्वरूप किसीकी दृष्टिमें नहीं आता। तुम सूक्ष्मस्वरूप होकर सम्पूर्ण जगत्के पदार्थोंके भीतर उसी प्रकार स्थित हो, जैसे मुक्ताहारके सभी मोतियोंमें एक ही सूत समाया हुआ है। महाबाहु श्रीराम ! यह शत्रु है, यह अपना है, यह दूसरा है, यह तुम हो, यह मैं हूँ—इत्यादि भावनाएँ यहाँ उसी प्रकार सत्य नहीं हैं, जैसे दृष्टिदोषके कारण होनेवाला दो चन्द्रमा आदिका दर्शन।

(सर्ग १८)

उपशम-प्रकरण ] * पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना * २६९

पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना—जगत् और उसके सम्बन्धकी असत्यताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी विषयमें विज्ञ पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। गङ्गाजीके तटपर दो मुनिकुमारोंमें, जो परस्पर भाई थे, उक्त विषयको लेकर ही जो संवाद हुआ था, वही यह पवित्र एवं अद्भुत इतिहास है; तुम इसे सुनो। इस जम्बूद्वीपकी किसी पर्वतमालामें एक महेन्द्र नामक पर्वत है। उसके एक देशमें जहाँ सुविस्तृत एवं मनोरम रत्नमय शिखर है, मुनियोंने स्नान और जलपानके लिये आकाश-गङ्गाको उतारा था। उसी गङ्गाजीके तट-प्रदेशमें, जहाँके वृक्ष फूलोंसे लदे हुए थे तथा जो पार्श्ववर्ती रत्नमय शिखरकी प्रभासे प्रकाशमान और दीप्तिमान् सुवर्णकी कान्तिसे सुनहरे रंगका दिखायी देता था, एक महर्षि निवास करते थे। उनका नाम था दीर्घतपा। उन्हें सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो चुका था। वे तपस्याकी राशि और उदार-बुद्धि थे तथा तपस्याके मूर्तिमान् रूप-से जान पड़ते थे। उन महर्षिके दो पुत्र थे, जो चन्द्रमाके समान सुन्दर थे,

उनके नाम थे पुण्य और पावन। उन दोनों पुत्रों और

एक पत्नीके साथ वे मुनि गङ्गाजीके उस तटपर रहते थे, जहाँके वृक्ष फलोंसे भरे हुए थे। कुछ समय बीतनेपर मुनिके उन दोनों पुत्रोंमें जो अवस्था और गुण दोनों ही दृष्टियोंसे ज्येष्ठ थे, वे पुण्यनामक मुनि सम्यक् ज्ञानसे सम्पन्न हो गये; परन्तु उनके दूसरे पुत्र पावनका ज्ञान अधूरा ही रह गया। वे मूर्खताकी सीमासे तो बाहर हो गये थे; परंतु उन्हें परमार्थ-तत्त्वका यथार्थज्ञान नहीं प्राप्त हुआ। इसलिये वे बीचमें ही झूल रहे थे।

तदनन्तर सौ वर्ष बीत जानेपर दीर्घतपा जरावस्थासे जर्जर हो गये। अतः उन्होंने अपने शरीरको त्याग दिया

और संकल्प तथा रागसे शून्य परम पदस्वरूप सच्चिदानन्द-घन ब्रह्मभावको प्राप्त कर लिया। तदनन्तर पतिके शरीरको प्राण और अपानसे रहित होकर पृथ्वीपर पड़ा देख मुनिकी पत्नीने भी पतिकी सिखायी हुई चिरकालसे अभ्यस्त यौगिक क्रियाद्वारा अपने शरीरको त्याग दिया और लोगोंकी दृष्टिसे अदृश्य हो अपने पतिकी उसी तरह