संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जीवन्मुक्त चित्तवाला मुनि इस संसारमें विचरण करता हुआ भी आदि, मध्य और अन्तमें—सदा ही रसहीन जो जगत्की अवस्थाएँ हैं, उनको उपहासके योग्य समझे। जो न तो प्राप्त हुई प्रिय वस्तुका अभिनन्दन करता है, न अप्रियसे द्वेष करता है, न नष्ट हुई वस्तुके लिये शोक करता है और न अप्राप्त वस्तुको पानेकी इच्छा ही करता है, सदा मननशील रहकर कर्तव्य कर्ममें आलस्य छोड़कर प्रवृत्त होता है, वह पुरुष संसारमें कभी दुखी नहीं होता। जो पूछनेपर प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन करता है, न पूछनेपर मौन हो सूखे काठकी भाँति अविचलभावसे स्थित रहता है तथा इच्छा और अनिच्छाके बन्धनसे मुक्त है, वह पुरुष संसारमें दुखी नहीं होता। जो सबके अनुकूल बोलता, किसीके पूछने या प्रेरणा करनेपर सुन्दर उक्तियोंद्वारा समाधान करता और प्राणियोंके मनोभावको समझ लेता है, वह पुरुष संसारमें दुखी नहीं होता। वह परम पदमें आरूढ़ हो जगत्की क्षणभङ्गुर अवस्थाको अपनी शान्तबुद्धिके द्वारा हँसता हुआ-सा देखता है। रघुनन्दन ! जिन्होंने अपने चित्तको जीत लिया है और परावरस्वरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात् करके जो महात्मा हो गये हैं, उन्हींका ऐसा स्वभाव मैंने तुम्हें बताया है।
अपने चित्तको न जीतनेवाले मूढ़ मनुष्योंके जो यज्ञ आदि कर्म हैं, वे फलकी कामनासे युक्त होते हैं, नाना प्रकारके दम्भ, मान, मद आदि दुर्गुणोंसे भरे होते हैं; अतएव पुनर्जन्म आदिके कारण होनेवाले सुख-दुःखोंसे परिपूर्ण हुआ करते हैं। इसलिये हम उन मूढ़ मनुष्योंके उद्धारका कोई उपाय नहीं बता सकते। रघुनन्दन ! तुम तो भीतरसे सब आशाओंका त्याग करके, वीतराग और वासनाशून्य हो बाहरसे समस्त सत्कर्मोंका एवं सदाचारोंका ठीक-ठीक पालन करते हुए संसारमें विचरो। श्रीराम ! तुम उदार, सदाचारी, समस्त शास्त्रीय कर्मोंका भलीभाँति आचरण करनेवाले तथा भीतर सम्पूर्ण कामनाओं और आसक्तियोंसे शून्य हो संसारमें विचरण करो। रघुनन्दन ! तुम सब पदार्थोंका यथार्थ रहस्य एवं अन्तर जान चुके हो; इसलिये जैसी अभीष्ट हो वैसी ही दृष्टिसे देखते हुए अनासक्तभावसे संसारमें विचरो। श्रीराम ! अहंकारसे रहित, अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित आकाशके समान निर्लेप एवं निर्मल तथा कलङ्कसे दूर रहकर संसारमें विचरण करो। राघव ! सैकड़ों आशारूपी पाशोंसे नित्य मुक्त, सब पदार्थोंमें सम तथा बाहर प्रजाओंके हितकर कार्योंमें तत्पर रहकर तुम लोकमें विचरो। वास्तवमें जीवात्माका न तो बन्धन है और न मोक्ष ही है। यह मिथ्या माया इन्द्रजालकी भाँति संसारमें मटकानेवाली है। आत्मा तो सर्वथा एकरूप, सर्वव्यापी और आसक्तिके बन्धनसे रहित है; फिर उसका बन्धन कैसे हो सकता है। और जब वह बँधा ही नहीं है, तब किसके लिये मोक्षका विधान होगा। यह भ्रान्तरूप विशाल संसार यथार्थ तत्त्वको न जाननेके कारण अज्ञानसे ही उत्पन्न हुआ है। यथार्थ तत्त्वका ज्ञान होनेसे यह उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे रस्सीका ज्ञान होनेसे उसमें सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है। तुम अनन्त, सत्स्वरूप एवं आकाशके समान व्यापक हो। ज्वालाओंके मध्य-भागकी भाँति प्रकाशमान एवं नित्य शुद्ध हो। तुम्हारा स्वरूप किसीकी दृष्टिमें नहीं आता। तुम सूक्ष्मस्वरूप होकर सम्पूर्ण जगत्के पदार्थोंके भीतर उसी प्रकार स्थित हो, जैसे मुक्ताहारके सभी मोतियोंमें एक ही सूत समाया हुआ है। महाबाहु श्रीराम ! यह शत्रु है, यह अपना है, यह दूसरा है, यह तुम हो, यह मैं हूँ—इत्यादि भावनाएँ यहाँ उसी प्रकार सत्य नहीं हैं, जैसे दृष्टिदोषके कारण होनेवाला दो चन्द्रमा आदिका दर्शन।
(सर्ग १८)