संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना * २६९
पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना—जगत् और उसके सम्बन्धकी असत्यताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी विषयमें विज्ञ पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। गङ्गाजीके तटपर दो मुनिकुमारोंमें, जो परस्पर भाई थे, उक्त विषयको लेकर ही जो संवाद हुआ था, वही यह पवित्र एवं अद्भुत इतिहास है; तुम इसे सुनो। इस जम्बूद्वीपकी किसी पर्वतमालामें एक महेन्द्र नामक पर्वत है। उसके एक देशमें जहाँ सुविस्तृत एवं मनोरम रत्नमय शिखर है, मुनियोंने स्नान और जलपानके लिये आकाश-गङ्गाको उतारा था। उसी गङ्गाजीके तट-प्रदेशमें, जहाँके वृक्ष फूलोंसे लदे हुए थे तथा जो पार्श्ववर्ती रत्नमय शिखरकी प्रभासे प्रकाशमान और दीप्तिमान् सुवर्णकी कान्तिसे सुनहरे रंगका दिखायी देता था, एक महर्षि निवास करते थे। उनका नाम था दीर्घतपा। उन्हें सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो चुका था। वे तपस्याकी राशि और उदार-बुद्धि थे तथा तपस्याके मूर्तिमान् रूप-से जान पड़ते थे। उन महर्षिके दो पुत्र थे, जो चन्द्रमाके समान सुन्दर थे,
उनके नाम थे पुण्य और पावन। उन दोनों पुत्रों और
एक पत्नीके साथ वे मुनि गङ्गाजीके उस तटपर रहते थे, जहाँके वृक्ष फलोंसे भरे हुए थे। कुछ समय बीतनेपर मुनिके उन दोनों पुत्रोंमें जो अवस्था और गुण दोनों ही दृष्टियोंसे ज्येष्ठ थे, वे पुण्यनामक मुनि सम्यक् ज्ञानसे सम्पन्न हो गये; परन्तु उनके दूसरे पुत्र पावनका ज्ञान अधूरा ही रह गया। वे मूर्खताकी सीमासे तो बाहर हो गये थे; परंतु उन्हें परमार्थ-तत्त्वका यथार्थज्ञान नहीं प्राप्त हुआ। इसलिये वे बीचमें ही झूल रहे थे।
तदनन्तर सौ वर्ष बीत जानेपर दीर्घतपा जरावस्थासे जर्जर हो गये। अतः उन्होंने अपने शरीरको त्याग दिया
और संकल्प तथा रागसे शून्य परम पदस्वरूप सच्चिदानन्द-घन ब्रह्मभावको प्राप्त कर लिया। तदनन्तर पतिके शरीरको प्राण और अपानसे रहित होकर पृथ्वीपर पड़ा देख मुनिकी पत्नीने भी पतिकी सिखायी हुई चिरकालसे अभ्यस्त यौगिक क्रियाद्वारा अपने शरीरको त्याग दिया और लोगोंकी दृष्टिसे अदृश्य हो अपने पतिकी उसी तरह