संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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अनुसरण किया, जैसे प्रभा गगनमण्डलमें अस्त होते हुए चन्द्रदेवका अनुसरण करती है । माता और पिताके परलोकवासी हो जानेपर ज्येष्ठ पुत्र पुण्य ही स्थिरचित्त हो उनके अन्त्येष्टि-कर्ममें प्रवृत्त हुए । पावनको माता-पितासे बिछुड़ जानेके कारण बड़ा दुःख हो रहा था । उनका चित्त शोकसे व्याकुल था । वे बड़े भाईकी ओर न देखकर वनकी गलियोंमें घूम-घूमकर विलाप करने लगे । माता-पिताका और्ध्वदेहिक कर्म समाप्त करके उदार-बुद्धि पुण्य वनमें अपने शोकाकुल बन्धु पावनके पास आये ।
पास आकर पुण्यने कहा—वत्स ! यह शोक अन्धता (मोह) का एकमात्र कारण है । तुम इसे घनीभूत क्यों बना रहे हो ? महाप्राज्ञ ! तुम्हारे पिता तुम्हारी माताजीके साथ उस मोक्षनामक सच्चिदानन्दघन परमात्मपदको प्राप्त हो गये हैं, जो सबका अपना ही स्वरूप है। वही सब प्राणियोंका अधिष्ठान है और वही जितात्मा ब्रह्म-वेत्ताओंका स्वरूप है । जब पिता अपने स्वरूपको ही प्राप्त हुए हैं, तब तुम उनके लिये बारंबार शोक क्यों करते हो ? तुमने इस संसारमें ऐसी मोहजनित ममता-मयी भावना बाँध रक्खी है, जिससे तुम अशोचनीय पिताके लिये भी शोक कर रहे हो ! न वे ही तुम्हारी माता थीं और न वे ही तुम्हारे पिता थे । वत्स ! जैसे प्रत्येक वनमें जलके बहनेके लिये बहुत-से नाले होते हैं, उसी तरह तुम्हारे सहस्रों माता-पिता हो चुके हैं। उन माता-पिताके भी असंख्य पुत्र हो चुके हैं, केवल तुम्हीं उनके पुत्र नहीं हो । जैसे नदीके जलमें बहुत-सी तरङ्गें उठती और विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार मनुष्य आदि प्राणियोंके जन्म-जन्ममें बहुतसे पुत्र हो-होकर कालके गालमें जा चुके हैं । वत्स ! यदि स्नेहके कारण माता-पिता और पुत्रोंके लिये शोक करना ही उचित हो तो पहलेके जन्मोंमें जो सहस्रों माता-पिता बीत चुके हैं, उनके लिये निरन्तर शोक क्यों नहीं किया जाता ! महाभाग ! जगत्की कल्पनाके निमित्तभूत भ्रम या अज्ञानके कारण ही यह प्रपञ्च दिखायी देता है । विद्वन् ! वास्तवमें तो तुम्हारे न कोई मित्र है और न बन्धु-बान्धव ही है । वत्स ! पारमार्थिक दृष्टिसे सत्य क्या है? इसका तुम विचार करो । विचार करनेसे तुम्हें ज्ञात होगा कि न तुम हो, न हम हैं । तुम्हारे अन्तःकरणमें जो भ्रम है, उसीके कारण इस जगत्की प्रतीति हो रही है । अतः तुम उसे त्याग दो । 'यह गया, यह मर गया' इत्यादि कुदृष्टियाँ अपने संकल्परूप अज्ञानसे उत्पन्न हो सामने दिखायी देती हैं, वास्तवमें इनकी सत्ता नहीं है।
( सर्ग १९ )
पुण्यका पावनको उपदेश—अनेक जन्मोंमें प्राप्त हुए असंख्य सम्बन्धियोंकी ओरसे ममता हटाकर उन्हें आत्मस्वरूप परमात्मासे ही संतोष प्राप्त करनेका आदेश, पुण्य और पावनको निर्वाण-पदकी प्राप्ति, तृष्णा और विषय-चिन्तनके त्यागसे मनके क्षीण हो जानेपर परमपदकी प्राप्तिका कथन
पुण्य कहते हैं—पावन ! बन्धु, मित्र, पुत्र, स्नेह, द्वेष तथा मोह-दशारूप रंगसे युक्त जो प्रपञ्च है, यह अपने नाममात्रसे विस्तारको प्राप्त हो रहा है (वस्तुदृष्ट्या इनकी सत्ता नहीं है) । जिसके प्रति बन्धुभावना कर