संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * पुण्यका पावनको उपदेश * २७१
ली गयी है, वह बन्धु हो गया और जिसके प्रति शत्रुको भावना कर ली गयी, वह शत्रु हो गया। परंतु सभी शरीरोंमें अभिन्नरूपसे विद्यमान जो सर्वव्यापी आत्मा है, उस एकमें ही 'यह बन्धु है, यह शत्रु है' ऐसी कल्पना कैसे हो सकती है? वत्स ! यह शरीर रक्त, मांस और हड्डियोंका समूह है, अस्थियोंका पञ्जर है; इससे भिन्न मैं कौन हूँ, इसका तुम स्वयं अपने चित्तसे विचार करो। पारमार्थिक दृष्टिसे देखनेपर न तुम कोई हो और न मैं कोई हूँ। 'यह पुण्य है, यह पावन है' इत्यादि कल्पनाओंके रूपमें मिथ्याज्ञान ही नृत्य कर रहा है। यदि तुम आत्मासे भिन्न कोई लिङ्गशरीर ही हो तो बताओ । बीते हुए दूसरे अनेक जन्मोंमें जो तुम्हारे बन्धु और धन-वैभव नष्ट हो गये हैं, उनके लिये भी शोक क्यों नहीं करते ? सुन्दर फूलोंसे सुशोभित वनस्थलियोँमें तुम्हारे बहुत-से बन्धु मृगयोनियोंमें मृग-शरीर धारण करके रहे हैं, उनके लिये तुम्हें शोक क्यों नहीं हो रहा है ? वत्स ! इसी जम्बूद्वीपमें तुम पहले अन्यान्य बहुत-सी योनियोंमें सैकड़ों-हजारों बार जन्म ले चुके हो। मैं तत्त्वज्ञानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म-बुद्धिके द्वारा तुम्हारे और अपने पूर्वजन्मके वासना-क्रमको देख रहा हूँ। मेरी भी बहुत-सी योनियों अनेक बार बीत चुकी हैं, उन मोह-मन्थर (अज्ञानसे जडीभूत) अतीत योनियोंको आज मैं तत्त्वज्ञानसे उदित हुई सूक्ष्मदृष्टिसे द्वारा देखता और स्मरण करता हूँ। ऐसी अवस्थामें जो जगत्में उत्पन्न हुए सैकड़ों माता-पिता, भाई-बन्धु और मित्र कालके गालमें जा चुके हैं, उनमेंसे किन-किनके लिये हम दोनों शोक करें और किनके लिये न करें। अथवा किनको-किनको छोड़कर यहाँ किन-किनके लिये हम शोकमें डूबे रहें; क्योंकि संसारकी तो ऐसी ही गति है। पावन ! तुम्हारा भला हो। मनमें अहम्भावके रूपमें स्थित इस प्रपञ्च-भावनाको त्यागकर तुम उस गतिको प्राप्त करो, जो आत्मज्ञानी पुरुषोंको उपलब्ध होती है। वत्स ! तुम शान्तचित्त होकर आत्माका—अपने आपका जो भाव और अभाव (उत्पत्ति और विनाश) से मुक्त तथा जरा और मृत्युसे रहित है, स्मरण करो। मनमें मूढ़ता न लाओ। उत्तम बुद्धिवाले पावन ! न तुम्हें दुःख है न तुम्हारा जन्म हुआ है, न तुम्हारी कोई माता है और न पिता ही है। तुम केवल शुद्ध-बुद्ध आत्मा हो, दूसरे कोई नहीं हो। जैसे रात होनेपर दीपक संनिधिमात्रसे प्रकाशके कर्ता होते हुए भी व्यापार-शून्य होनेके कारण अकर्ता ही हैं, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुष कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण लोक-व्यवहारकी स्थितिमें कर्ता होकर भी अकर्ता ही हैं। वत्स ! जो समस्त एषणाओंके कलङ्कसे रहित एवं मननशील है तथा जिसका हृदय-कमलमें खस्थ आत्मस्वरूपसे साक्षात्कार किया गया है, उस आत्माके द्वारा अपने भीतरके सम्पूर्ण संसारभ्रमको मिटाकर अवशिष्ट हुए उस भावरूप आत्मा (परब्रह्म परमात्मा) से ही संतोष प्राप्त करो।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! पुण्यके इस प्रकार समझाने-बुझानेपर पावनको उत्कृष्ट बोध (परमात्म-तत्त्वका दृढ़ निश्चय) प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् ज्ञान और विज्ञानमें पारंगत तथा सिद्ध और अनिन्द्य स्थितिको प्राप्त हुए वे दोनों बन्धु उस वनमें इच्छानुसार विचरने लगे। तदनन्तर