संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
समय आनेपर वे दोनों देहरहित हो परम निर्वाणपद (परमात्मा) को प्राप्त हो गये । निष्पाप श्रीराम ! इस प्रकार पूर्वजन्मोंमें जो असंख्य देह धारण कर चुके हैं, उन प्राणियोंके माता-पिता, बन्धु-बान्धव आदिका समुदाय अनन्त है । उनमेंसे कौन किनको ग्रहण करे और कौन किनका त्याग । रघुनन्दन ! इसलिये इन असंख्य तृष्णाओंकी निवृत्तिका एकमात्र उपाय त्याग ही है, उनको पोसना नहीं । जैसे लकड़ी डालनेसे आग प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार विषय-भोगोंके चिन्तनसे चिन्ता बढ़ती जाती है; और जैसे बिना ईंधनके आग बुझ जाती है, उसी प्रकार विषयोंका चिन्तन न करनेसे चिन्ता मिट जाती है । एकमात्र विवेकरूपी सखा और एकमात्र पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिरूपिणी प्रिय सखीको साथ ले संसारमें शास्त्रविहित आचरण करनेवाला पुरुष संकट पड़नेपर भी मोहग्रस्त नहीं होता । वैराग्यसे, शास्त्रोंके अभ्याससे तथा महत्तायुक्त क्षमा, दया, शान्ति, समता और संतोष आदि गुणोंसे यत्नपूर्वक आपत्तिका निवारण करनेके लिये मनुष्य स्वयं ही मनको उन्नत बनाये । जो परम पदकी प्राप्तिरूप फल पूर्वोक्त महत्तायुक्त गुणोंसे उत्कर्षको प्राप्त हुए मनके द्वारा उपलब्ध हो सकता है, वह तीनों लोकोंके ऐश्वर्य तथा रत्नोंसे भरे हुए कोशकी प्राप्तिसे भी नहीं हो सकता । मनके विशुद्ध अमृत-रससे पूर्ण होनेपर सारी वसुधा आनन्दकी सुधा-धारासे आप्लावित हो जाती है। मन वैराग्यसे ही पूर्णताको प्राप्त—विज्ञानानन्दघन रससे परिपूर्ण होता है। आशा (इच्छा, कामना आदि) के वशीभूत हुआ मन उपर्युक्त पूर्णताको नहीं प्राप्त होता । जिनके चित्तमें किसी लौकिक वस्तुकी स्पृहा नहीं है, उन लोगोंके लिये तीनों लोकोंका ऐश्वर्य कमलगट्टेके समान अत्यन्त तुच्छ है । श्रीराम ! चित्तके नष्ट हो जानेपर अविचल धैर्यसे युक्त पुरुष उस परमपदको प्राप्त कर लेता है, जहाँ फिर नाशका भय नहीं है। (सर्ग २०-२१)
राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय तथा उनका अपने पितासे पहलेके पूछे हुए प्रश्नोंका स्मरण करना
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अथवा हे रघुकुलरूपी आकाशके पूर्ण चन्द्रमा श्रीराम ! तुम राजा बलिकी भाँति विवेकके द्वारा परब्रह्म परमात्माका यथार्थ एवं विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करो ।
श्रीरामचन्द्रजी बोले—भगवन् ! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता गुरुदेव ! आपकी कृपासे मुझे प्राप्तव्य सच्चिदानन्दघन परमात्माके ज्ञानका यथार्थ अनुभव प्राप्त है और उसी निर्मल पदमें मैं परम शान्तिको प्राप्त होकर स्थित हूँ । प्रभो ! जैसे शरद्ऋतुमें आकाशसे बा दल हट जाते हैं उसी प्रकार मेरे चित्तसे तृष्णा नामक महान् तम (अज्ञानान्धकार) का अत्यन्त अभाव हो गया है। पूर्णिमाके सायंकालमें उदित हुए आकाशवर्ती शीतल अमृतमयी किरणोंसे सम्पन्न तथा महातेजस्वी पूर्ण चन्द्रमाके समान मैं विज्ञानानन्दघनमय अमृतसे परिपूर्ण, चिन्मय आकाशस्वरूप ब्रह्ममें विराजमान शान्तिमय महान् प्रकाशस्वरूप तथा अन्तःकरणमें परमानन्दसे परिपूर्ण होकर स्थित हूँ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मैं तुमसे बलिके उत्तम वृत्तान्तका वर्णन करता हूँ, सुनो ! इस ब्रह्माण्ड-कोशके भीतर किसी दिशारूपी निकुञ्जमें भूमिके नीचे विद्यमान पाताल नामसे विख्यात एक लोक है, जिसमें असुरोंके बाहुदण्डोंपर आधारित महान् साम्राज्य है ।