संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय *
उस साम्राज्यपर विरोचनकुमार बलि राजाके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। वे दैत्यराज बलि त्रिलोकीके रत्नोंके कोश, समस्त शरीरधारियोंके रक्षक तथा भुवनपालोंके भी पाळक हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु उनकी रक्षा करते हैं। उन्होंने अनायास ही वशमें किये हुए सम्पूर्ण लोकोंके विस्तारसे अपने आपको विभूषित करके दस करोड़ वर्षोंतक राज्य किया। तदनन्तर आने-जानेवाले बहुत-से युग बीत गये। देवताओं और असुरोंके महान् समूह कभी उन्नतिको प्राप्त हुए और कभी उनका पतन हुआ। तीनों लोकोंमें अत्यन्त उत्कृष्ट समझे जानेवाले बहुत-से भोगोंका निरन्तर उपभोग करते-करते एक समय दानवराज बलिको उन भोगोंसे अत्यन्त उद्वेग (वैराग्य) प्राप्त हुआ। एक दिन मेरुपर्वतके शिखरपर स्थित रत्नोंके बने हुए विशाल भवनमें खिड़कीके सामने बैठे हुए दैत्यराज बलि स्वयं ही संसारकी स्थितिपर विचार करने लगे— 'अहो ! अक्षुण्ण शक्तिवाले मुझ बलिको अब इस लोकमें कितने समयतक यह साम्राज्य चलाना और तीनों लोकोंमें विचरना होगा ? मेरा यह महान् राष्ट्र तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है। प्रचुर भोगोंसे सम्पन्न होनेके कारण यह अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है, किंतु इसके उपभोगसे मेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है ! आरम्भमें तभीतक मधुर प्रतीत होता है, जबतक नष्ट या विकृत नहीं हो जाता, और जिसका विनाश अवश्यम्भावी है, उस भोग-समुदायका उपभोगमात्र करना मेरे लिये क्या सुखदायक हो सकता है ? जिसके प्राप्त हो जानेपर दूसरा कुछ पाना या करना शेष न रह जाय, उस परम उदार अद्वितीय (परमात्मप्राप्तिरूप) फलको मैं यहाँ नहीं देख पाता । इन क्षणभङ्गुर भोगोंको छोड़कर दूसरा नित्य, उत्तम एवं यथार्थ सुख क्या है ? इसीका मैं विचार करता हूँ।' विवेक-वैराग्ययुक्त बुद्धिसे ऐसा सोच-समझकर राजा बलि तत्काल ध्यानमग्न हो गये।
तदनन्तर विचार किये हुए परम पुरुषार्थका मन-ही-मन चिन्तन करते हुए असुरराज बलिने क्षणभरमें भूतपूर्व स्मरणपूर्वक कहा—"अरे ! याद आ गया। पहलेकी बात है, जिन्होंने लोकके छोटे-बड़े सभी व्यवहारोंको देखा था तथा जो आत्मतत्त्वके ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन अपने ऐश्वर्यशाली पिता महाराज विरोचनसे मैंने पूछा—'महामते ! जहाँ समस्त दुःखों और सुखोंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग शान्त हो जाते हों, संसारकी वह सीमा कौन है ! तात !