भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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२७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मनका मोह कहाँ शान्त होता है ? समस्त एषणाओंका कहाँ अभाव होता है तथा चिरकालके लिये निरन्तर एवं पुनरावृत्तिरहित विश्राम कहाँ प्राप्त होता है ? पूज्य पिताजी ! अविनाशी आनन्दसे परम सुन्दर किसी ऐसे परमपदका मेरे लिये वर्णन कीजिये, जहाँ स्थित होकर मैं सदाके लिये परमशान्ति प्राप्त कर लूँ।' मेरे इस प्रश्नको सुनकर पिताने सम्मोहशान्ति (अज्ञान-निवारण) के लिये मुझसे यह बात कही।' (सर्ग २२-२३)


विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक परमात्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश

विरोचन बोले—महामते ! मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपदतक सम्पूर्ण पदोंका अतिक्रमण करनेवाला जो मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरका स्वामी शुद्ध आत्मा है, वह एक राजाके समान है। उसने बुद्धियुक्त मनको अपना मन्त्री बनाया है। उस मन्त्रीको जीत लेनेपर सबको जीत लिया जाता है और सब कुछ प्राप्त हो जाता है। परंतु उसे अत्यन्त दुर्जय समझना चाहिये। वह बलसे नहीं, युक्तिसे ही जीता जाता है।

बलिने कहा—भगवन् ! उस चित्तरूपी मन्त्रीपर आक्रमण करनेके लिये जो युक्ति या उपाय हो, उसे आप भलीभाँति बताइये, जिससे मैं उस भयंकर मनपर विजय पा सकूँ।

विरोचन बोले—बेटा ! सभी विषयोंके प्रति सब प्रकारसे जो अत्यन्त अनास्था (वैराग्य) है वही मनपर विजय पानेके लिये उत्तम युक्ति है। यह अनास्था ही वह उत्तम युक्ति है, जिससे महान् मदमत्त मनरूपी मातङ्ग (गजराज) का शीघ्र ही दमन किया जा सकता है। महामते ! यह युक्ति अत्यन्त दुर्लभ और परम सुलभ भी है। यदि इसके लिये अभ्यास न किया जाय तो यह अत्यन्त दुर्लभ है। परंतु यदि इसके लिये भलीभाँति अभ्यास किया जाय तो यह अनायास ही प्राप्त हो जाती है। बेटा ! यदि क्रमशः विषयोंसे विरक्त होनेका अभ्यास किया जाय तो जैसे सींचनेसे लता लहलहा उठती है, उसी प्रकार यह विरक्ति भी सब ओरसे सुस्पष्टतः प्रकट हो जाती है। पुत्र ! जैसे बोये बिना धान नहीं प्राप्त होता, वैसे ही यदि विरक्तिके लिये अभ्यास न किया जाय तो विषय लोलुप पुरुष कितना ही क्यों न चाहे, यह विरक्ति उसे नहीं मिलती; अतः तुम इसे अभ्यासके द्वारा दृढ़ करो। संसाररूपी गर्तमें निवास करनेवाले ये जीव तबतक नाना प्रकारके दुःखोंमें भटकते रहते हैं, जबतक उन्हें विषयोंसे वैराग्य नहीं हो जाता। जैसे कोई अत्यन्त बलवान् देहवाला मनुष्य भी यदि पैर उठाकर कहीं जाय नहीं तो वह देशान्तरमें नहीं पहुँच सकता, उसी तरह कोई शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न पुरुष भी यदि अभ्यास न करे तो वह विषयोंसे वैराग्य नहीं प्राप्त कर सकता। इसलिये देहधारी मनुष्यको चाहिये कि वह जीवन्मुक्तिके हेतुभूत पूर्वकथित ध्येय नामक वासना-